"राम नाम का आधार"
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
नल-नील संग प्रभु राम न होते, तो मुझे भी डूब जाना था,
यूँ ज़मीं पर ही पड़े रहते, अपना क्या ठिकाना था।
अमर है वो पाषाण जिसे, मार्ग सुगम बनाना था,
हम पत्थर भी तैर गए, क्योंकि माँ सीता को पाना था।
अंतरा - १
श्री राम की महिमा ऐसी थी, पत्थर भी यहाँ तर जाता था,
बन गई नारी वो अहिल्या भी, जो सदा ठोकरें खाता था।
जीवन-सागर की लहरों में, सबका ही डूब जाना था,
हम सब तैरते रहे क्योंकि, माँ सीता को पाना था।
अंतरा - २
अहंकार के भारी पत्थर, पल में ही डूब जाया करते,
श्रद्धा का पावन स्पर्श मिले, भवसागर से पार उतरते।
कौन भला, कौन बड़ा यहाँ, किसको क्या समझाना था?
हम सब तैरते रहे क्योंकि, माँ सीता को पाना था।
अंतरा - ३
नल-नील बने प्रभु के सेवक, अपना यश कभी न माँगा था,
देकर सब श्रेय प्रभु को ही, विनय का मार्ग संभाला था।
सेवा ही सच्ची साधना है, जग को बस यही बताना था,
हम सब तैरते रहे क्योंकि, माँ सीता को पाना था।
अंतरा - ४
जीवन की हर डूबती नैया के, राम स्वयं पतवार बने,
सूखे मन के बंजर वन में, प्रेम-सुमन फिर खिल उठे।
नाम बिना इस भवसागर से, किसने पार लगाना था?
हम सब तैरते रहे क्योंकि, माँ सीता को पाना था।
अंतरा - ५
'राकेश' यही अनुभव कहता, राम-नाम ही जीवन-धन,
इसके आगे फीका पड़ता, इस जग का सारा मान-गगन।
जिसने मन पर राम लिखा हो, उसको क्या घबराना था?
हम सब तैरते रहे क्योंकि, माँ सीता को पाना था।
समापन (दोहराव)
नल-नील संग प्रभु राम न होते, तो मुझे भी डूब जाना था,यूँ ज़मीं पर ही पड़े रहते, अपना क्या ठिकाना था।
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