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क्या गुर्जर एक घुमंतू जाति है ?

क्या गुर्जर एक घुमंतू जाति है ?

गुर्जर जाति को एक घुमंतू जाति कहने का एक प्रचलन सा हो गया है। जब कोई व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुंचता है तो इस शब्द को गुर्जर समाज के साथ ऐसे जोड़कर दिखाया जाता है कि जैसे हमने सभ्यता के कई दौर पार किए हैं और तब जाकर हम वर्तमान की स्थिति में आए हैं। इसलिए घुमंतू शब्द जोड़ना ऐसे माना जाता है जैसे वास्तव में यह शब्द बहुत गहरे अनुसंधान के बाद निकलकर सामने आया है और इसे बोलने में हमको गर्व की अनुभूति होनी चाहिए।
ऐसे में इस शब्द पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वास्तव में ही गुर्जर जाति घुमंतू जाति है या फिर यह तथाकथित विद्वानों की तथ्यों के साथ की जाने वाली व्यर्थ की खींचतान है ?
   विकिपीडिया के अनुसार घुमंतू वे समुदाय होते हैं जिनका कोई स्थायी निवास स्थान नहीं होता और जो नियमित रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते रहते हैं। इनमें शिकार-संग्रह करने वाले समूह, पशुपालक घुमंतू (जिनके पास पशुधन होता है), कारीगर तथा व्यापारी घुमंतू समुदाय सम्मिलित होते हैं। 20 वीं शताब्दी में घुमंतू पशुपालक जनजातियों की संख्या धीरे-धीरे कम होती गई और 1995 तक विश्व में इनकी जनसंख्या का अनुमान 3–4 करोड़ के बीच रहा।
विन्सेन्ट वान गॉग द्वारा बनाई गई एक पेंटिंग जिसमें खानाबदोश रोमा के कारवां को दर्शाया गया है
मानव जीवनयापन के लिए सबसे प्राचीन विधि शिकार और संग्रहण रही है, जिसमें लोग मौसमी रूप से उपलब्ध जंगली पौधों और जानवरों पर निर्भर रहते थे। पशुपालक घुमंतू पालतू पशुओं के झुंड पालते हैं और उन्हें चरागाहों में इस प्रकार ले जाते हैं कि जमीन की प्राकृतिक पुनरुत्पत्ति क्षमता नष्ट न हो। घुमंतू जीवनशैली विशेष रूप से उन क्षेत्रों में विकसित हुई है जहाँ भूमि उपजाऊ नहीं होती, जैसे – स्तेपी, टुंड्रा, रेगिस्तान या बर्फीले क्षेत्र। यहाँ गतिशीलता सीमित संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग की रणनीति बन जाती है। उदाहरण के लिए, टुंड्रा क्षेत्रों में रहने वाले कई समुदाय बारहसिंगा पालते हैं और अपने पशुओं के लिए चारा खोजने हेतु अर्ध-घुमंतू जीवन जीते हैं।'
    विकिपीडिया की घुमंतू शब्द की इस परिभाषा पर यदि हम गुर्जर शब्द को कसकर देखें तो कुछ नए निष्कर्ष निकल कर सामने आते हैं। इस परिभाषा को मस्तिष्क में रखकर हमें सर्वप्रथम यह सोचना चाहिए कि यदि गुर्जर शब्द भारत के क्षत्रिय शब्द के सर्वाधिक निकट है तो ऐसा क्यों है ?प्राचीन काल से ही भारत की वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय वर्ण बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस वर्ण का कार्य है समाज की किसी भी प्रकार से क्षति या क्षरण न हो सके, और यदि हो रहा है तो उसे रोका जाए। क्षत्रिय वर्ण का काम है- समाज विरोधी, राष्ट्र विरोधी और जनविरोधी शक्तियों का दमन करना। समाज में शांति व्यवस्था को बनाए रखना और मुख्य धारा में विघ्न डालने वाले लोगों को दंडित करना।
  यदि क्षत्रिय शब्द की यह परिभाषा है और क्षत्रिय वर्ण के लोगों का यह कार्य है तो फिर गुर्जर शब्द क्या है ? इसका अर्थ क्या है ? इस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। गुर्जर शब्द गु: + जर से बना है। गु: का अर्थ है अंधकार या शत्रु। जैसे गुरु में गु का अर्थ अंधकार से होता है और रु का अर्थ मिटाने वाले से होता है अर्थात गुरु वह है जो अंधकार को मिटाने वाला हो। वैसे ही गुर्जर शब्द में गु: को इन दोनों अर्थों में लेना चाहिए। जर का अभिप्राय उसको क्षीण करना अर्थात मिटा देना होता है। अंधकार अर्थात् अज्ञान प्रत्येक मनुष्य का जन्मजात शत्रु है। इसलिए भोजन, वस्त्र और आवास से भी पहली आवश्यकता मनुष्य की अज्ञान को मिटाना है। जब मनुष्य ज्ञानवान हो जाएगा तो भोजन, वस्त्र और आवास की समस्या तो अपने आप सुलझ जाएगी। जब तक उसके पास अज्ञान है तब तक उसे ज्ञानी बनाने के लिए उसके माता-पिता, गुरु ,आचार्य और समाज उसकी सहायता करता है अर्थात उसके भोजन ,वस्त्र, आवास की व्यवस्था करता है। यह अज्ञान जब काम, क्रोध , मद, मोह और लोभ के रूप में दिखाई देता है तो समाज में अनेक प्रकार के आतंकवाद और विसंगतियों को जन्म देता है। कामी लोग समाज में नारियों का अपमान करते हैं, उनका शील भंग करते हैं। क्रोधी लोग दूसरों को अपमानित करते हैं। मद के वशीभूत होकर भी लोग दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। मोह के वशीभूत होकर दूसरों के साथ धोखा, छल, फ़रेब करते हैं। लोभ के वशीभूत होकर दूसरों की संपत्ति पर अनाधिकार कब्जा करते हैं। इन लोगों के कारण समाज में आतंकवाद और अराजकता फैलती है। इतिहास में ऐसे लोगों ने अपने-अपने साम्राज्य खड़े कर दूसरों के राष्ट्रों का विनाश करने का काम किया है। इन्हीं बुराइयों के कारण समाज में अनेक प्रकार के मत अर्थात मजहब फैले हैं। जिन्होंने लोगों को खून के आंसू रोने के लिए विवश किया है।
   मनु महाराज ने प्राचीन काल में ऐसे समाज विरोधी लोगों का विनाश करने के लिए ही क्षत्रिय वर्ग थी व्यवस्था की थी। इसी क्षत्रिय वर्ग का स्थानापन्न गुर्जर शब्द बना। जिसने ऐसे शत्रुओं का विनाश करना अपना जीवन आदर्श बनाया। इसका अभिप्राय हुआ कि गुर्जर समाज के क्षत्रिय लोग अपने जीवन को शत्रुओं का विनाश करने में और समाज की मुख्यधारा को निर्मल बनाए रखने में व्यतीत करता था। निश्चय ही ऐसा कार्य कोई जंगली जाति अथवा घुमंतू लोग नहीं कर सकते थे। इसलिए गुर्जर समाज के वीरपूर्वजों के द्वारा विशाल विशाल साम्राज्यों का निर्माण किया गया। गुर्जर ने अपने इस गुरुतर उत्तरदायित्व का निर्वाह किया , इसलिए इतिहास इसे एक वीर जाति के रूप में देखता है। 
   सम्राट मिहिर भोज जब मुसलमानों का सामना कर रहे थे और वैदिक संस्कृति और वैदिक धर्म की रक्षा के लिए संकल्प लेकर यहां से लेकर अरब तक अपने आप को समर्पित कर रहे थे, तब वह अपने इसी गुरुतर उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे थे। इसी प्रकार राजा भोज जब बहराइच के राजा सुहेलदेव के साथ मिलकर अपनी विशाल सेना के माध्यम से महमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद की 11 लाख की विशाल सेना का विनाश कर अपनी वीरता और शौर्य का परिचय देकर मां भारती की अनुपम सेवा कर रहे थे तब वह भी अपने इसी गुरुतर उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रहे थे। गुर्जर राजा पृथ्वीराज चौहान, आज के अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर शासन करने वाले राजा जयपाल, आनंदपाल आदि भी अपने इसी प्रकार के गुरुतर उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। गुर्जर राजाओं के इसी प्रकार के अन्य अनेक उदाहरण हैं। इस प्रकार इतिहास में अपने धर्म अर्थात राष्ट्रभक्ति का ईमानदारी से निर्वाह करने वाली इस वीर गुर्जर जाति को यदि घुमंतू जाति कहा जाता है तो यह इसका अपमान है ? इसके शौर्य और इसकी वीरता का अपमान है। गुर्जरों के स्थाई निवास रहे हैं, स्थाई राजधानियां रही हैं, इन्होंने स्थाई रहकर देश धर्म की सेवा की है। इसके उपरांत भी इन्हें घुमंतू दिखाना और ऐसे दिखाना जैसे ये अशिक्षित, गँवार, पशुपालक, ग्वाले रहे हैं , जिनका सभ्यता से दूर-दूर का संबंध नहीं था, बहुत ही पीड़ादायक विषय है।
  अब प्रश्न यह है कि गुर्जरों को घुमंतू किसने कहना आरम्भ किया ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए थोड़ा इतिहास की ओर जाना पड़ेगा। गुर्जरों के विशाल- विशाल साम्राज्यों को छीनने वाले लोगों ने अर्थात मुसलमानों ने इन्हें बहुत अधिक अपमानित करने का प्रयास किया। जिन मुसलमानों का सामना राजा मिहिर भोज जैसे महाप्रतापी शासक ने अपनी 36 लाख की सेना के माध्यम से किया हो, वे मुस्लिम लोग हमारे इस महान शासक को कभी भी महाप्रतापी नहीं मान सकते थे। इसीलिए इतिहास में मिहिर भोज जैसे संस्कृति रक्षक सम्राट का गुणगान नहीं मिलता, जबकि संस्कृति भक्षकों का सम्मान होता हुआ देखा जाता है। यही बात अन्य गुर्जर शासकों के बारे में माननी चाहिए। कितने दुर्भाग्य की बात है कि जिन लोगों के स्थाई दीर्घकालिक साम्राज्य रहे,वे हमारी नजरों में घुमंतू हो गए और जो दूर देश से चलकर दूसरों के राज्य छीनने की बदमाशी करते हुए यहां आए वे सभ्यता के प्रतीक हो गए।
असभ्य और बर्बर लोग अराजकता और अव्यवस्था फैलाते हैं। उन्हें कभी भी सभ्यता का संवाहक नहीं माना जा सकता। जो लोग असभ्यता और बर्बरता का विरोध करते हैं, वे संस्कृति रक्षक, धर्म रक्षक सभ्यता के संवाहक और राष्ट्रभक्त होते हैं। दोनों का अंतर समझकर गुर्जर और विदेशी आक्रामक लोगों के बारे में हमें अपनी धारणा बनानी चाहिए।
भारत में इन विदेशी आक्रामक लोगों का बचाव करने वाले जिन लोगों ने इनकी शब्दावली को पकड़कर गुर्जर जाति को एक घुमंतू जाति कहना आरंभ किया है, वे वही लोग हैं जो भारत वर्ष में धर्मनिरपेक्षता नाम के तुषारापात से ग्रस्त हैं। इन्हें सत्य और तथ्य को छुपाने के लिए यदि अपनी किसी जाति, वर्ग या संप्रदाय ( विशेष रूप से हिंदू समाज ) से पक्षपात करना हो तो ऐसा करने के लिए ये तुरंत तैयार हो जाते हैं। 
  जब हम अपने आप को घुमंतू मानने लगते हैं तो हम सोचते हैं कि प्राचीन काल से ही हम इधर-उधर भटकते रहे हैं, जबकि सच यह है कि हम भटकने वाले नहीं थे बल्कि हमने भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाने का काम किया है। भटके हुए लोगों की बुद्धि को ठिकाने किया है। आज भी उत्तर भारत में जितने भर भी गांव गुर्जरों के हैं, उन सब के पूर्वज किसी न किसी समय किसी न किसी क्षेत्र में राज्य करते रहे हैं। उनके दीर्घकालिक शासन रहे हैं। भाट की पोथियों से आज भी पता चल जाएगा कि अमुक गोत्र के लोग अमुक कालखंड में अमुक क्षेत्र में शासन कर रहे थे। इन सबका पलायन इस्लाम काल में हुआ है , जब इनके राज्य छीने गए और इन्हें वहां से भगाया गया। राज्य छीनने की इस कार्रवाई से उपजे पलायन को घुमंतू कहना गुर्जर समाज के साथ होने वाले अन्याय को हल्का करके दिखाने की धर्मनिरपेक्ष कोशिश है। उनके भागने की अथवा घुमंतू होने की यह कहानी पिछले 500- 700 वर्षों में ही सिमटी हुई है। इतने कालखंड के आधार पर आप किसी जाति के लिए यह नहीं कह सकते कि यह घुमंतू है। होना यह चाहिए कि गुर्जर समाज के लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि आपके पूर्वज अमुक समय में अमुक क्षेत्र पर राज्य कर रहे थे और वहां से मुसलमानों ने आपका शासन छीन कर आपको वहां से भागने के लिए मजबूर किया था। भाट की पोथियों से तो यही निष्कर्ष निकलता है, परंतु गुर्जरों को घुमंतू जाति सिद्ध करने वाले कथित इतिहासकारों की अपनी-अपनी धारणाएं हैं, जो गुर्जरों को जबरदस्ती घुमंतू सिद्ध करने के लिए काम करते हुए दिखाई देते हैं।
  आप जानते हैं कि जब आपको एक घुमंतू जाति कह दिया जाता है तो उससे हानि क्या होती है ? इससे सबसे पहली हानि तो यही होती है कि आपको यह बता दिया जाता है कि आपका कोई इतिहास नहीं है। आपके पूर्वज बहुत अधिक ज्ञानी ध्यानी लोग नहीं थे। वह निरे असभ्य और बर्बर लोग थे। उनका देश की राजनीति से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं था, असभ्य होने के कारण वे प्राचीन काल से ही चोरी आदि का कार्य करते चले आ रहे थे। आज बहुत लोग हैं जो अपने ही बारे में इसी प्रकार की भ्रांत धारणाओं का शिकार हैं। इसमें अपने उन लोगों का विशेष योगदान है जो गुर्जर को एक घुमंतू जाति के रूप में स्वयं भी लिखते हैं। जबकि यह एक मतिभ्रम है, जिससे बाहर निकलने की आवश्यकता है।
जब हम विदेशी विद्वानों और यात्रियों के कथनों के माध्यम से अपने प्राचीन भारत के समाज का महिमामंडन करते हैं तो अक्सर हमको यह सुनने और पढ़ने को मिलता है कि अमुक विदेशी यात्री ने लिखा है कि भारत के लोग झूठ बोलना तक नहीं जानते थे। चोरी करना उनके स्वभाव में सम्मिलित नहीं था। ये बहुत ही दयालु और विनम्र स्वभाव वाले होते हैं। तब हम यह भूल जाते हैं कि जब वह व्यक्ति भारत की यात्रा पर था और वह भारत के लोगों के बारे में यह लिख रहा था कि उस समय भारत में लोग झूठ बोलना तक नहीं जानते थे और चोरी करना उनके स्वभाव में सम्मिलित नहीं था तो क्या उनमें गुर्जर लोग सम्मिलित नहीं थे जो चोरी करना और झूठ बोलना नहीं जानते थे ? बिना सोचे समझे ही अपने बारे में भ्रांत धारणा बना लेना अज्ञानता नहीं तो क्या है ?
  कुल मिलाकर हमें उन इतिहासकारों से बचने की आवश्यकता है जो भारतीय वैदिक संस्कृति के सत्य को नहीं जानते। जिन्हें भारत और भारतीयता की गहरी जड़ों का ज्ञान नहीं है और जो विदेशी इतिहासकारों की जूठन को खाकर हमें हमारे ही बारे में गलत सूचना देते रहते हैं ? निष्कर्ष रूप में मैं आपसे यही निवेदन करना चाहूंगा कि अपने आप को घुमंतू जाति मत मानिए। इसके स्थान पर अपने आप को वीर गुर्जर सम्राटों की संतान मानिए। उन ज्ञानी महान ऋषियों की संतान मानिए जिन्होंने हमारे शिक्षित महान पूर्वजों को ज्ञान संपन्न बनाकर वैदिक धर्म की सेवा के लिए उन्हें काम करने की प्रेरणा दी। अपने बारे में मानिए कि हमारा एक गौरवशाली इतिहास रहा है। जिसने देशभक्त गुर्जर वीरों का निर्माण कर हमें उन पर गर्व करने का सुअवसर प्रदान किया है। ऐसा कहने से यदि किसी की धर्मनिरपेक्षता को खतरा होता है या किसी की तुष्टिकरण की नीति का भंडाफोड़ होता है तो होने दीजिए, परन्तु अपने सत्य को मत दबने दीजिए।
अपने बारे में यह भी स्पष्ट रूप से मानिये कि हम जातिवादी नहीं रहे हैं बल्कि हमने विभिन्न जातियों की राष्ट्रीय सेना बनाकर सर्व समाज और सारे राष्ट्र की सेवा करने को अपने जीवन का महानतम संकल्प बनाया है । इसी महानतम संकल्प को लेकर आज भी हम सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। हमने मनुष्य के लिए एक धर्म अर्थात मानवता को मानना आवश्यक समझा है। यदि हमारे मानवतावादी धर्म को कोई भंग करता है तो हम उसे अराजक, असामाजिक और आतंकवादी घोषित करते हैं और उसका विनाश करना आवश्यक मानते हैं।

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