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सत्ता और शासन की क्रिया की प्रतिक्रिया है जेन-जी का आंदोलन

सत्ता और शासन की क्रिया की प्रतिक्रिया है जेन-जी का आंदोलन

  • क्या यह केवल युवा असंतोष है या भारतीय लोकतंत्र के लिए एक वैचारिक चेतावनी?

पंडित हृदय नारायण झा

इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ता समाज की धड़कनों को सुनना बंद कर देती है, तब समाज स्वयं अपनी भाषा गढ़ लेता है। कभी वह क्रांति कहलाती है, कभी जनांदोलन और कभी नई पीढ़ी का असंतोष। आज उसी क्रम में उभरती दिखाई दे रही है जेन-जी (Gen Z)—एक ऐसी पीढ़ी, जो केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था, नेतृत्व और राजनीति के चरित्र पर प्रश्न उठा रही है।

यह आंदोलन केवल रोजगार, शिक्षा या अवसरों की मांग भर नहीं रह गया है। इसके पीछे एक व्यापक वैचारिक बेचैनी दिखाई देती है। यह उस राजनीति के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है, जिसे अनेक लोग समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण, दलगत आग्रह और सार्वजनिक संवाद के क्षरण से जोड़कर देखते हैं।

भारतीय सभ्यता का मूल स्वभाव समावेशी, समरस और संवादप्रधान रहा है। जब समाज को यह अनुभव होता है कि उसके मूल्यों से विचलन हो रहा है, तब स्वाभाविक रूप से नई पीढ़ियाँ प्रश्न पूछती हैं। यही लोकतंत्र की शक्ति भी है।

ऋग्वेद का मंत्र—

"संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्"

—साथ चलने, साथ विचार करने और एक मन होने का संदेश देता है। यदि समाज का कोई वर्ग यह अनुभव करता है कि संवाद की जगह विभाजन, सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धी वैमनस्य और समदृष्टि की जगह पक्षधरता बढ़ रही है, तो उसकी प्रतिक्रिया लोकतांत्रिक आंदोलनों के रूप में सामने आ सकती है।

भारतीय राजनीतिक परंपरा में नेतृत्व केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं माना गया। आचार्य बृहस्पति, भगवान श्रीराम, आचार्य चाणक्य और महात्मा गांधी—सभी ने नेतृत्व को लोकमंगल, संयम और उत्तरदायित्व से जोड़ा।

योगदर्शन के यम—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—तथा नियम—शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—सिर्फ आध्यात्मिक अनुशासन नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के नैतिक मानदंड भी माने गए हैं। महात्मा गांधी ने इन्हें अपने एकादश व्रतों के माध्यम से आधुनिक सार्वजनिक जीवन में भी प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया।

यदि राजनीति में सेवा का स्थान सत्ता-सुख ले ले, त्याग का स्थान स्वार्थ और समदृष्टि का स्थान दलगत आग्रह, तो लोकतंत्र के भीतर असंतोष का जन्म होना स्वाभाविक है। ऐसे समय में नई पीढ़ी प्रश्न पूछती है कि क्या नेतृत्व केवल चुनाव जीतने का नाम है, या समाज को साथ लेकर चलने की नैतिक जिम्मेदारी भी है?

वैदिक वाक्य-

"वयं राष्ट्रे जागृयामः पुरोहिताः"

-नेतृत्व को राष्ट्र को जागृत रखने वाले अग्रदूत के रूप में देखता है। लोकतंत्र में यह आदर्श किसी एक दल या व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि सभी सार्वजनिक प्रतिनिधियों के लिए समान रूप से लागू होता है।

भारतीय शास्त्रों में मूर्खता के जिन लक्षणों का वर्णन मिलता है-अहंकार, हठ, कटु वचन, दूसरों की बात न सुनना, आचरण और वचन में अंतर-वे आज भी आत्ममंथन का विषय हैं। यह आत्ममंथन केवल सत्ता पक्ष के लिए ही नहीं, बल्कि विपक्ष, सामाजिक संगठनों और स्वयं नागरिक समाज के लिए भी उतना ही आवश्यक है।

जेन-जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह पारंपरिक सामाजिक सीमाओं से परे संवाद करती है। डिजिटल माध्यमों ने उसे जाति, क्षेत्र और भाषा की अनेक दीवारों से आगे सोचने का अवसर दिया है। इसके बावजूद यह कहना कि पूरी जेन-जी एक ही विचारधारा या लक्ष्य के साथ खड़ी है, वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा। यह पीढ़ी विविध विचारों, आकांक्षाओं और दृष्टिकोणों का समूह है।

लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके आक्रोश से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक अनुशासन, संवैधानिक प्रतिबद्धता और रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करने की क्षमता से तय होती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता असहमति को केवल विरोध न समझे और युवा असंतोष को केवल राजनीतिक चुनौती न माने। उसी प्रकार आंदोलनों को भी यह ध्यान रखना होगा कि परिवर्तन का सबसे स्थायी मार्ग लोकतांत्रिक संवाद, संवैधानिक मर्यादा और शांतिपूर्ण भागीदारी से होकर गुजरता है।

यदि युवा पीढ़ी वास्तव में अधिक न्यायपूर्ण, समरस और उत्तरदायी भारत का निर्माण करना चाहती है, तो उसे केवल विरोध का नहीं, बल्कि वैकल्पिक नेतृत्व, नैतिक राजनीति और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।

लोकतंत्र का भविष्य न तो केवल सत्ता के हाथों सुरक्षित रह सकता है और न केवल आंदोलनों के भरोसे। उसका भविष्य तब सुरक्षित होता है, जब सत्ता आत्मसमीक्षा करे, विपक्ष रचनात्मक बने और युवा पीढ़ी अपने उत्साह को विवेक, संवैधानिकता और लोकमंगल के साथ जोड़े।

तभी भारतीय परंपरा का यह मंगल उद्घोष सार्थक होगा—

"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।"

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