महागाथा गोरखपुर: पौराणिक मनावंतरों से आधुनिक युग
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय वांग्मय में उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल और बिहार का मगध क्षेत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से सदैव एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। जहाँ मगध ने चक्रवर्ती साम्राज्यों, दार्शनिक क्रांतियों और इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों का निर्माण किया, वहीं सरयूं और राप्ती के कछारों में बसे प्राचीन कोशल जनपद के इस क्षेत्र— जिसे आज हम गोरखपुर कहते हैं— ने देश को अध्यात्म, योग, सामाजिक समरसता और साहित्य का एक अभेद्य गढ़ दिया
सनातन धर्म संस्कृति एवं ज्योतिष शास्त्र के काल-गणना और ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) के अनुसार, सृष्टि की आयु को १४ मन्वंतरों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक मन्वंतर का अपना एक कालपुरुष और नियामक होता है। गोरखपुर और उसके आसपास का यह भू-भाग, जिसे प्राचीन काल में 'महावन' या 'विशाल अरण्य' कहा जाता था, इन सभी कालखंडों के सूक्ष्म परिवर्तनों का साक्षी रहा है: स्वायंभुव मन्वंतर में यह संपूर्ण क्षेत्र घने वनों और वैदिक ऋषियों की कंदराओं से आच्छादित था। ब्रह्मा के मानस पुत्रों ने इस क्षेत्र की पवित्र नदियों के तट पर प्रथम यज्ञीय वेदियों की स्थापना की थी। स्वरोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष मन्वंतर: इन कालखंडों के दौरान, यह क्षेत्र वैदिक ऋषियों (जैसे महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र और भृगु) की तपोभूमि के रूप में विकसित हुआ। पुराणों के अनुसार, इन मन्वंतरों में यह क्षेत्र देवताओं और गंधर्वों के विचरण का केंद्र था।
वर्तमान में गतिमान ७ वें वैवस्वत मन्वंतर में गोरखपुर क्षेत्र का राजनीतिक और भौगोलिक स्वरूप स्पष्ट रूप से निखर कर सामने आया। वैवस्वत मनु के पुत्र राजा इक्ष्वाकु ने अयोध्या को केंद्र बनाकर कोशल साम्राज्य की नींव डाली। गोरखपुर का क्षेत्र उत्तर-कोशल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक और आध्यात्मिक हिस्सा था।
त्रेतायुग में भगवान श्रीराम की लीलाओं से यह क्षेत्र सीधा जुड़ा। लोकमान्यता और वाल्मीकि रामायण के संकेतों के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जब भी आखेट या ऋषियों के दर्शन हेतु निकलते थे, तो राप्ती (अचिरवती) के तट पर विश्राम करते थे। विष्णु पुराण और मार्कंडेय पुराण में जिन भावी मन्वंतरों— सावर्णी, रौच्य, भौतय और मेरुसावन का उल्लेख आता है, उनके दार्शनिक विवेचन में इस क्षेत्र की भूमि को अक्षुण्ण आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना गया है, जो प्रलय काल में भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहेगी।
गोरखपुर का इतिहास केवल दंतकथाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पास पुरातात्विक और लिखित साक्ष्यों की एक सुदृढ़ श्रृंखला है, जो मौर्य काल से लेकर आधुनिक काल तक निर्बाध रूप से मिलती है।
गोरखपुर के इतिहास का सबसे प्रामाणिक लिखित दस्तावेज मौर्य काल से प्राप्त होता है। गोरखपुर जिले के बांसगाँव तहसील में स्थित सोहगौरा नामक स्थान से एक मौर्यकालीन ताम्रपत्र मिला है। सोहगौरा ताम्रपत्र का ऐतिहासिक महत्व: प्राकृत भाषा और ब्रह्मी लिपि में उत्कीर्ण यह ताम्रपत्र भारत का सबसे प्राचीन ताम्र-अभिलेख माना जाता है। इसमें मौर्य सम्राट (संभवतः चंद्रगुप्त मौर्य) के काल में पड़े भीषण अकाल के समय अनाज के तीन कोष्ठागारों (भंडारगृहों) से जनता में अन्न वितरण का आदेश दर्ज है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मौर्य काल में गोरखपुर एक प्रमुख प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र था।
सोहगौरा ताम्रपत्र की लिपि: ब्रम्ही लिपि , भाषा: प्राकृत में ऐतिहासिक साक्ष्य: भारत का प्रथम अकाल-प्रबंधन का अभिलेख (मौर्य काल) का उल्लेख है। गुप्त राजाओं के शासनकाल में, जिन्हें भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, गोरखपुर कला और वास्तुकला का गढ़ बना। सम्राट समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय यहाँ अनेक मंदिरों और बौद्ध विहारों का जीर्णोद्धार हुआ। कुशीनगर (जो तत्कालीन गोरखपुर का ही हिस्सा था) में गुप्तकालीन मूर्तिकला के उत्कृष्ट अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।।पाल और सेन राजवंश (आठवीं से बारहवीं शताब्दी) का पाल वंश: बंगाल और बिहार के पाल शासकों (जैसे धर्मपाल और देवपाल) के समय गोरखपुर के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय और तंत्र साधना का व्यापक प्रभाव बढ़ा। सेन वंश: ११वीं-१२वीं शताब्दी में जब सेन राजवंश का प्रभाव बढ़ा, तो इस क्षेत्र में पुनः सनातन धर्म, विशेषकर शैव और शाक्त संप्रदायों का पुनरुत्थान हुआ। इसी कालखंड के समानांतर नाथ संप्रदाय के अवतरण ने यहाँ की सामाजिक-धार्मिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया।
मुगल काल: 'सरकार ब मध्यकाल में गोरखपुर दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों और बाद में मुगलों के अधीन रहा।
आईन-ए-अकबरी में उल्लेख: सम्राट अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने 'आईन-ए-अकबरी' में इस क्षेत्र को अवध सूबे के अंतर्गत 'सरकार गोरखपुर' के रूप में प्रतिस्थापित किया। यह एक विशाल प्रशासनिक इकाई थी। मुअज्जमाबाद नामकरण: सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुगल बादशाह औरंगज़ेब के पुत्र शहजादा मुअज्जम (जो बाद में बहादुर शाह प्रथम के नाम से सिंहासन पर बैठा) ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उसकी इस यात्रा की स्मृति में कुछ समय के लिए गोरखपुर का आधिकारिक नाम बदलकर 'मुअज्जमाबाद' कर दिया गया था, जिसके साक्ष्य तत्कालीन सिक्कों और दस्तावेजों में मिलते हैं। वर्ष १८०१ में अवध के नवाब सादत अली खान ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ एक संधि के तहत गोरखपुर का प्रशासनिक नियंत्रण अंग्रेजों को सौंप दिया। अंग्रेज कलेक्टरों ने इसे एक जिला मुख्यालय के रूप में विकसित किया। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इस धरती ने कभी घुटने नहीं टेके:
१८५७ का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: कुसमी जंगल के समीपवर्ती क्षेत्र के जमींदार शहीद बंधू सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ा। वे अंग्रेजों को पकड़कर तरकुलहा देवी के चरणों में बलि चढ़ा देते थे। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें गोरखपुर शहर के अलीनगर चौराहे पर सरेआम फांसी दे दी। चौरी-चौरा की ऐतिहासिक घटना (४ फरवरी १९२२): बीसवीं सदी के स्वतंत्रता आंदोलन में गोरखपुर ने पूरे देश की दिशा बदल दी। चौरी-चौरा नामक स्थान पर प्रदर्शनकारी स्वतंत्रता सेनानियों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने के विरोध में उत्तेजित जनता ने थाने में आग लगा दी, जिसमें २२ पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा से क्षुब्ध होकर महात्मा गांधी ने अपना राष्ट्रव्यापी 'असहयोग आंदोलन' वापस ले लिया था।
आधुनिक युग में गोरखपुर एक साधारण कस्बाती प्रशासनिक केंद्र से उठकर पूर्वांचल और उत्तर-पूर्वी भारत का सबसे बड़ा महानगर बन चुका है। वर्तमान समय में यह रक्षा (वायुसेना केंद्र), शिक्षा, उद्योग, चिकित्सा (एम्स) और परिवहन का एक विशाल हब प्रशासनिक रूप से गोरखपुर उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख मंडलऔर जिला है। गोरखपुर नगर निगम का क्षेत्रफल हाल के वर्षों मेंहुए सीमा विस्तार के बाद लगभग २२६ वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैल चुका है। वर्ष २०२६ के जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार, गोरखपुर की आबादी में तीव्र वृद्धि देखी गई है: गोरखपुर महानगरीय क्षेत्र : लगभग १०.४ लाख से १३ लाख के बीच है। गोरखपुर संपूर्ण जिला आबादी: लगभग ५३ लाख से अधिक है।
भौगोलिक सत्य: कुछ विमर्शों में अनजाने में ताप्ती नदी का नाम गोरखपुर से जोड़ दिया जाता है, जो पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण है। ताप्ती नदी मध्य भारत की नदी है। गोरखपुर की जीवनरेखा राप्ती नदी (Rapti River) है। : राप्ती नदी का उद्गम पड़ोसी देश नेपाल की लघु हिमालय श्रेणियों (महाभारत पर्वत श्रृंखला) के अंतर्गत धौलागिरी के दक्षिण में स्थित 'प्यूठान' क्षेत्र से होता है। वहाँ इसे 'पश्चिमी राप्ती' भी कहा जाता है। : गोरखपुर शहर राप्ती नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। इस नदी ने सदियों से हिमालयी पोषक तत्वों से भरपूर जलोढ़ (Alluvial) मिट्टी लाकर इस क्षेत्र को अत्यधिक उपजाऊ बनाया। यहाँ की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था इसी नदी की देन है। राप्ती आगे चलकर बरहज (देवरिया) के पास सरयूं (घाघरा) नदी में विलीन हो जाती है। रामगढ़ ताल गोरखपुर के दक्षिण-पूर्व में स्थित लगभग १७०० एकड़ में फैली एक विशाल प्राकृतिक झील है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ 'रामग्राम' के कोलिय गणराज्य की राजधानी थी। राप्ती नदी के मार्ग बदलने से इस विशाल ताल का निर्माण हुआ। आज यह उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख पर्यटन और जल-क्रीड़ा केंद्र है। चिलुआताल शहर के उत्तरी छोर पर स्थित यह ताल भी एक महत्वपूर्ण जल निकाय है, जो स्थानीय पारिस्थितिकी और मत्स्य पालन का मुख्य आधार रहा है।
गोरखपुर की धरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने विश्व के सभी प्रमुख विचारों और धर्मों को अपने भीतर समाहित किया है। वैदिक काल में यह क्षेत्र महर्षि वशिष्ठ के प्रभाव में था। ऋग्वेद में इस क्षेत्र की पवित्र नदियों का परोक्ष उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण के 'गोरक्ष महात्म्य' खंड में स्पष्ट रूप से इस भूमि को 'सिद्धिक्षेत्र' और 'मोक्षदायिनी भूमि' के रूप में महिमामंडित किया गया है।
बाइबल (ईसाई संस्कृति): ब्रिटिश काल में यहाँ १८वीं-१९वीं सदी में मिशनरियों का आगमन हुआ। शहर के मध्य स्थित सेंट एंड्रयूज चर् अपनी गॉथिक स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का ईसाई समाज शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में निरंतर योगदान दे रहा है। गोरखपुर सूफी संतों की भी कर्मभूमि रहा है। १८वीं सदी के महान सूफी संत हजरत बाबा रोशन अली शाह की याद में बना इमामबाड़ा इसका जीवंत उदाहरण है। यहाँ की पवित्र 'धुनी' (अखंड अग्नि) पिछले ढाई सौ वर्षों से सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रही है। औरंगजेब कालीन उर्दू बाजार की मस्जिदें इस्लामिक स्थापत्य और पठन-पाठन का केंद्र रही हैं। गुरु ग्रंथ साहिब (सिख संस्कृति): सिख धर्म के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी और नवम गुरु, गुरु तेग बहादुर जी ने अपनी पूरब यात्रा के दौरान इस क्षेत्र का भ्रमण किया था। उनकी स्मृति में बने जटाशंकर गुरुद्वारा और अन्य सिख समाज के केंद्र यहाँ गुरुग्रंथ साहिब के मानवतावादी संदेशों का प्रसार कर रहे हैं।
बौद्ध धर्म: महाभिनिष्क्रमण (गृहत्याग) के पश्चात सिद्धार्थ गौतम ने गोरखपुर के समीप ही अपनी राजसी पोशाक त्यागकर सन्यास लिया था। इसके समीप स्थित कुशीनगर बुद्ध का महापरिनिर्वाण स्थल है। जैन धर्म: चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की चरण धूलि से यह क्षेत्र पवित्र हुआ है। गोरखपुर के जैन मंदिर अपनी अहिंसा परक संस्कृति के केंद्र हैं। पारसी धर्म: ब्रिटिश और स्वतंत्रता के शुरुआती काल में पारसी व्यापारियों और समाजसेवियों का एक छोटा समूह यहाँ सक्रिय था, जिन्होंने यहाँ के व्यापारिक विकास में योगदान दिया।
गोरखपुर हिंदू धर्म के पांचों प्रमुख संप्रदायों का एक महा-संगम है: शैव संस्कृति में गोरखनाथ मंदिर / प्राचीन शिव मंदिर शिव को 'आदिनाथ' मानकर योग साधना का प्रसार। वैष्णव संस्कृति का ऐतिहासिक विष्णु मंदिर (असुरन) १२वीं सदी की कसौटी पत्थर की चतुर्भुजी विष्णु प्रतिमा; भक्ति मार्ग का पोषण।।शाक्त संस्कृति का तरकुलहा देवी, बुढ़िया माई मंदिर प्रकृति और शक्ति की उपासना; स्वतंत्रता संग्राम के वीरों की प्रेरणा स्रोत। सौर संस्कृति का सूर्यकुंड मंदिर आरोग्य और तेज के लिए भगवान सूर्य की प्राचीन उपासना परंपरा। ब्रह्म संस्कृति का वैदिक यज्ञशालाएं / दार्शनिक पीठ अद्वैत वेदांत और ब्रह्मतत्व की दार्शनिक भूमि है।
गोरखपुर को जिन विभूतियों ने अपनी तपोभूमि बनाया है ।
महायोगी मत्स्येंद्रनाथ (मच्छेंद्रनाथ) का नाथ संप्रदाय के प्रणेता और भगवान शिव के साक्षात शिष्य माने जाने वाले गुरु मत्स्येंद्रनाथ का अवदान भारतीय योग परंपरा में क्रांतिकारी है । : उन्होंने योग को केवल कंदराओं और संन्यासियों तक सीमित न रखकर उसे जनसुलभ बनाने की शुरुआत की। उनके द्वारा रचित 'कौल ज्ञान निर्णय' तंत्र और योग का एक अनूठा समन्वय है, जिसने मध्यकालीन भारतीय दर्शन को गहरे तक प्रभावित किया।
गोरखनाथ का निर्माण: उनका सबसे बड़ा अवदान समाज को गुरु गोरखनाथ जैसा शिष्य देना था, जिसने आगे चलकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की आध्यात्मिक चेतना को झकझोर दिया। युगपुरुष गुरु गोरखनाथ का अवदान।१०वीं-११वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक और दार्शनिक गुरु गोरखनाथ ने भारत की धार्मिक दिशा बदल दी: हठयोग की वैज्ञानिक स्थापना: उन्होंने गोरक्ष शतक और सिद्ध सिद्धांत पद्धति के माध्यम से शरीर के भीतर स्थित षटचक्रों के भेदन, प्राणायाम और नाद-साधना को एक सुव्यवस्थित पद्धति (Hatha Yoga) के रूप में स्थापित किया। सामाजिक समरसता का शंखनाद: उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत, जातिवाद और बाह्य आडंबरों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने नारा दिया कि भगवान की भक्ति और योग पर हर जाति और वर्ग का समान अधिकार है। यही कारण है कि नाथ संप्रदाय में समाज के सबसे निचले पायदान के लोगों को भी सर्वोच्च स्थान मिला।।उन्होंने अपने उपदेश संस्कृत के बजाय लोकभाषा (सधुक्कड़ी) में 'सबदी' के माध्यम से दिए, जिससे भटके हुए समाज को एक संबल मिला।
श्री राधाबाबा और 'गीता वाटिका' का बीसवीं शताब्दी में जहाँ एक ओर गोरखनाथ मंदिर योग का केंद्र था, वहीं दूसरी ओर गीता वाटिका अगाध कृष्ण-भक्ति का महातीर्थ बनी। इसके केंद्र में थे श्री राधाबाबा (पूर्वाश्रम नाम: चक्रधर मिश्र)। श्री राधाबाबा का आध्यात्मिक दर्शन: बाबा गोपी-भाव और मधुर भक्ति के साक्षात विग्रह थे। वे परम संत भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार (गीता प्रेस के आदि संपादक) के आध्यात्मिक सहयात्री थे। इन दोनों महापुरुषों की युगल ऊर्जा ने देश में सनातन धर्म की वैचारिक रक्षा की । राधाबाबा की ही दिव्य प्रेरणा से गीता वाटिका में वर्ष १९६८ से 'हरे राम हरे कृष्ण' का अखंड कीर्तन शुरू हुआ, जो आज वर्ष २०२६ में भी, पिछले ५८ वर्षों से बिना एक सेकंड रुके अनवरत चल रहा है। यह विश्व के सबसे लंबे समय से चल रहे अखंड कीर्तनों में से एक है। बाबा ने छद्म और गुमनाम नामों से (जैसे 'एक साधु') ब्रज रस और कृष्ण लीला पर अत्यंत भावपूर्ण ग्रंथों की रचना की, जो गीता प्रेस के माध्यम से लाखों घरों तक पहुंचे। उन्होंने कभी यश, धन या प्रतिष्ठा को स्पर्श नहीं किया है।
गोरखनाथ पीठ के पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ ने नाथ पंथ की 'लोकाभिमुख' (जनसेवा ही ईश्वर सेवा है) की परंपरा को एक नया राजनैतिक और प्रशासनिक आयाम दिया है:
गोरखपुर का ढांचागत व औद्योगिक कायाकल्प: उनके प्रयासों से गोरखपुर जो कभी उपेक्षा का शिकार था, आज चमचमाता महानगर बन चुका है। गोरखपुर एम्स (AIIMS), वर्षों से बंद पड़े खाद कारखाने (Fertilizer Plant) का पुनरुद्धार, गोरखपुर एयरपोर्ट का विस्तार, और रामगढ़ ताल का एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन स्थल के रूप में विकास उनके विजन का परिणाम है। शिक्षा और चिकित्सा का प्रसार: उन्होंने महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो चिकित्सा, नर्सिंग, और आधुनिक तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में पूर्वांचल के छात्रों के लिए एक वरदान साबित हो रहा है। स्वास्थ्य क्रांति (इंसेफेलाइटिस का अंत): पूर्वांचल के हजारों मासूम बच्चों को हर साल निगल जाने वाली महामारी 'जापानी इंसेफेलाइटिस' (मस्तिष्क ज्वर) के खिलाफ उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ी और मुख्यमंत्री के रूप में कड़े प्रशासनिक एवं स्वास्थ्य अभियानों के जरिए इस जानलेवा बीमारी को ९५% से अधिक समाप्त कर दिया। उन्होंने नाथ पीठ की समरसता की नीति को आगे बढ़ाते हुए लोक कलाओं, देश की सांस्कृतिक विरासत ( अयोध्या, काशी और स्वयं गोरखपुर के ऐतिहासिक स्थलों) के संरक्षण और जीर्णोद्धार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
गोरखपुर के ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थल - गोरखपुर महानगर और उसके परिवेश में स्थित प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों की सूची, उनके स्थान और महत्व के साथ है: गोरखनाथ मंदिर गोरखनाथ रोड, उत्तरी गोरखपुर नाथ संप्रदाय का वैश्विक मुख्यालय; गुरु गोरखनाथ की मुख्य तपोभूमि और अखंड ज्योति। गीता प्रेस रेती चौक के पास, पुराना शहर १९२३ में स्थापित; विश्व में सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथों (गीता, रामायण) का सबसे बड़ा मुद्रक। गीता वाटिका शाहपुर, असुरन के पास श्री राधाबाबा की समाधि; १९६८ से निरंतर गतिमान वैश्विक अखंड कीर्तन का केंद्र। विष्णु मंदिर बिछिया-असुरन मार्ग पाल राजाओं के काल (१२वीं सदी) की दुर्लभ कसौटी पत्थर की भगवान विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति।सूर्यकुंड मंदिर सूर्यकुंड कॉलोनी, पुराना गोरखपुर प्राचीन तालाब और सूर्य मंदिर, जहाँ पौराणिक काल में भगवान राम के विश्राम की मान्यता है। हजरत बाबा रोशन अली शाह इमामबाड़ा जाफ़रा बाज़ार सूफी संस्कृति का प्रतीक; १८वीं सदी की ऐतिहासिक धरोहर, जहाँ सांप्रदायिक सौहार्द की धुनी जलती है। चौरी-चौरा शहीद स्मारक चौरी-चौरा कस्बा (शहर से २५ किमी पूर्व) १९२२ की ऐतिहासिक घटना के शहीदों की स्मृति में निर्मित राष्ट्रीय स्मारक। तरकुलहा देवी मंदिर चौरी-चौरा के समीप, वन क्षेत्र स्वतंत्रता सेनानी शहीद बंधू सिंह की इष्टदेवी; १८५७ की क्रांति का प्रमुख गुप्त केंद्र। बुढ़िया माई मंदिर एवं कुसमी जंगल कुसमी (एयरपोर्ट रोड के पास) साल के घने वृक्षों का प्राकृतिक वन और प्राचीन शाक्त उपासना केंद्र।राजकीय बौद्ध संग्रहालय रामगढ़ ताल परियोजना क्षेत्र मौर्य, कुषाण और गुप्त काल की प्राचीन बौद्ध और जैन मूर्तियों तथा सोहगौरा के अवशेषों का अनूठा संग्रह है।
वेदों की ऋचाओं से परिष्कृत, मौर्यों के अभिलेखों से प्रमाणित, मुगलों और अंग्रेजों के प्रशासनिक संघर्षों से गुजरी तथा नाथ संप्रदाय की समरसता से सिंचित गोरखपुर की यह भूमि भारत की सांस्कृतिक रीढ़ है। जहाँ एक ओर श्री राधाबाबा की भक्ति की तान 'हरे राम हरे कृष्ण' के रूप में गूंज रही है, वहीं गुरु गोरखनाथ का योग विज्ञान आज के तनावग्रस्त समाज को जीने की राह दिखा रहा है। समकालीन युग में, आध्यात्मिक पीठ के नेतृत्व में हो रहा आधुनिक विकास इस बात का द्योतक है कि यह क्षेत्र अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तत्पर है। मगध और कोशल की यह वैचारिक सांझ भारत को सदैव आलोकित करती रहेगी।संदर्भ - विष्णु पुराण एवं स्कंद पुराण (गोरक्ष महात्म्य खंड) - गीता प्रेस, गोरखपुर। सिद्ध सिद्धांत पद्धति एवं गोरक्ष संहिता - महायोगी गुरु गोरखनाथ, गोरखनाथ मंदिर प्रकाशन। आईन-ए-अकबरी - अबुल फजल (अनुवाद)। सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेखीय अध्ययन - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)। कल्याण (विशेषांक) - भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार, गीता प्रेस।।उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गैजेटियर्स: गोरखपुर - राजकीय प्रकाशन।
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