ज्ञान की शाश्वत जननी मगध
सत्येन्द्र कुमार पाठक
महर्षि च्यवन और देवकुंड: आयुर्वेद का वैश्विक उद्गम
मगध की समृद्ध ऋषि-परंपरा में महर्षि च्यवन का नाम सबसे अग्रणी और जाज्वल्यमान माना जाता है। उन्होंने न केवल इस क्षेत्र को आध्यात्मिक रूप से सींचा, बल्कि मानव जाति को स्वास्थ्य का एक ऐसा अनुपम उपहार दिया जो आज भी प्रासंगिक है। आश्रम और सुकन्या की कथा: पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, महर्षि च्यवन का अत्यंत पवित्र आश्रम प्राचीन हिरण्य प्रदेश के अंतर्गत आने वाले वर्तमान बिहार के औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के देवकुंड में स्थित था। यह स्थल उस काल की पवित्र वैदिक नदी हिरण्यबाहु (जिसे आधुनिक युग में सोन नदी या उसकी सहायक धारा माना जाता है) के शांत किनारे पर बसा था। वैवस्वत मन्वंतर काल में, एक अनजानी भूल के कारण जब वैवस्वत मनु के पुत्र राजा शरयाती की पुत्री राजकुमारी सुकन्या ने तपस्या में लीन वृद्ध ऋषि च्यवन की आँखों को बींध दिया, तो प्रायश्चित स्वरूप उनका विवाह ऋषि से कर दिया गया। सुकन्या के पातिव्रत्य और सेवा भाव ने इस आश्रम को लोक-कल्याण का केंद्र बना दिया। ऋषि च्यवन ने इसी देवकुंड की धरती पर अपनी वृद्धावस्था को पुनः यौवन और असीम ऊर्जा में बदलने के लिए कड़े वैज्ञानिक अनुसंधान किए। उन्होंने अश्विनी कुमारों के सहयोग से दुर्लभ वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों और रसायनों का एक अनूठा योग तैयार किया, जिसे आज पूरी दुनिया "च्यवनप्राश" के नाम से जानती है। आयुर्वेद का यह महान आविष्कार अकाट्य प्रमाण है कि प्राचीन गुरुकुल केवल धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे विज्ञान, चिकित्सा और मानव स्वास्थ्य के शीर्ष अनुसंधान केंद्र भी थे।
ऋषिकुंड और शृंगी ऋषि: तपोबल, यज्ञ और विज्ञान का संगम में मगध और उसके समीपवर्ती अंग क्षेत्र की सीमाओं को अपने तप से पवित्र करने वाले महर्षि शृंगी (या शृंग) का इतिहास भी अद्वितीय है। मुंगेर क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध ऋषिकुंड आज भी उनकी तपोगाथा को जीवंत रूप में प्रदर्शित करता है। पौराणिक इतिहास के अनुसार, जब अंग देश में लगातार १२ वर्षों तक भीषण अकाल पड़ा, तब वहां के राजा रोमपाद ने महर्षि शृंगी को आमंत्रित किया। इस महान तपस्वी के चरण जैसे ही इस भूमि पर पड़े, प्रकृति निहाल हो उठी और घनघोर वर्षा हुई, जिसने संपूर्ण क्षेत्र को जीवनदान दिया। महर्षि शृंगी का संबंध सीधे त्रेतायुग के अयोध्या राजघराने से था। वे राजा दशरथ और माता कौशल्या की ज्येष्ठ पुत्री माता शांता के पति (दामाद) थे। जब राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति की कामना से व्याकुल थे, तब महर्षि शृंगी के ही आचार्यत्व में अयोध्या में सुप्रसिद्ध पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ था, जिसके फलस्वरूप प्रभु श्री राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का अवतरण हुआ आज भी मुंगेर के ऋषिकुंड में प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार देखा जा सकता है, जहाँ एक प्राकृतिक गर्म पानी का सोता विद्यमान है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस कुंड के पानी में गंधक (सल्फर) और कई प्रकार के खनिज पाए जाते हैं, जिसके कारण इसमें अद्वितीय औषधीय गुण हैं, जो आज भी चर्म रोगों से मुक्ति दिलाते है।
विभिन्न कालखंडों में कई अन्य ऋषियों और विचारकों ने मगध की बौद्धिक और आध्यात्मिक रीढ़ को सुदृढ़ किया: महर्षि याज्ञवल्क्य (उपनिषद काल): ८वीं-७वीं शताब्दी ईसा पूर्व में मगध-मिथिला के सीमावर्ती क्षेत्र में सक्रिय महर्षि याज्ञवल्क्य भारतीय दर्शन के सूर्य हैं। वे 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, वह भी नहीं) के माध्यम से निराकार ब्रह्म को समझाने वाले परम ज्ञानी थे। राजा जनक की सभा में होने वाले महान शास्त्रार्थों में उनकी केंद्रीय भूमिका थी और उनके विचार 'बृहदारण्यक उपनिषद' में संकलित हैं। ऋषि मुद्गल (वैदिक काल): ऋग्वेद में ऋषि मुद्गल और उनके वंशज मुद्गलों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उन्होंने कई वैदिक सूक्तों और ऋचाओं की रचना की। मगध के मैदानी भूभाग में शिक्षा की जो सबसे प्रारंभिक और बुनियादी संरचना खड़ी हुई, उसमें इनके गुरुकुलों का योगदान अप्रतिम था, जो शस्त्र और शास्त्र के समन्वय के प्रतीक थे।
दीर्घतमा और मतंग ऋषि: इन्होंने मगध के वनों को ज्ञान के आश्रमों में बदल दिया। मतंग ऋषि (जिनका संबंध रामायण काल में शबरी की कथा से भी जुड़ता है) और दीर्घतमा ने समाज के हर वर्ग को शिक्षा से जोड़ा। इनके गुरुकुलों में केवल वेदों का पाठ नहीं होता था, बल्कि प्रकृति, भूगोल, खगोल और समाजशास्त्र पर भी गहन चिंतन होता था। उर्वेला ऋषि (बोधगया/गया): गया के उरुवेला क्षेत्र में उर्वेला काश्यप और उनके भाइयों का विशाल आश्रम था, जो अपनी जटिल साधनाओं और अग्नि-पूजा के लिए विख्यात थे। इसी क्षेत्र की आध्यात्मिक ऊर्जा ने बाद में महात्मा बुद्ध को अपनी ओर आकर्षित किया था।
ईसा पूर्व छठी शताब्दी आते-आते मगध की वैदिक ज्ञान-गंगा में बौद्ध चिंतन की एक नई क्रांतिकारी धारा समाहित हो गई, जिसने वैश्विक स्तर पर करुणा और प्रज्ञा का मार्ग दिखाया। भगवान बुद्ध के शीर्ष शिष्य सारिपुत्र को बौद्ध संघ में 'धर्म सेनापति' और बुद्धि का साक्षात प्रतीक माना जाता था। उनका जन्म और महापरिनिर्वाण दोनों नालंदा के समीप नालकग्राम में हुआ था। उनकी स्मृति में सम्राट अशोक ने जो विशाल स्तूप बनवाया, वही स्तूप आगे चलकर नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना का मुख्य केंद्र बिंदु बना।
महाप्रजापती गौतमी (स्त्री शिक्षा की प्रणेता): भगवान बुद्ध की विमाता और मौसी महाप्रजापती गौतमी का मगध के सामाजिक इतिहास में क्रांतिकारी योगदान है। उन्होंने बुद्ध से हठपूर्वक आग्रह करके महिलाओं के लिए 'भिक्षुणी संघ' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इसके माध्यम से प्राचीन मगध में महिलाओं को न केवल आध्यात्मिक साधना का अधिकार मिला, बल्कि उन्हें शिक्षा, शास्त्रार्थ और सामाजिक विमर्श में पुरुषों के समकक्ष खड़ा होने का ऐतिहासिक अवसर प्राप्त है।
ईसा की प्रारंभिक सदियों से लेकर मध्यकाल तक मगध ज्ञान के मामले में पूरी दुनिया का सिरमौर बना रहा। प्राचीन ऋषियों की गुरुकुल परंपरा ने अब सुसंगठित और विशाल विश्वविद्यालयों (महाविहारों) का रूप ले लिया था।।आचार्य नागार्जुन (शून्यवाद और आधुनिक विज्ञान): दूसरी शताब्दी ईस्वी में नालंदा महाविहार के कुलपति रहे आचार्य नागार्जुन को बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के अंतर्गत 'माध्यमिक' या 'शून्यवाद' दर्शन का जनक माना जाता है। नागार्जुन केवल एक दार्शनिक ही नहीं थे, बल्कि वे अपने समय के सबसे महान रसायनशास्त्री और चिकित्सक भी थे। उन्होंने 'रस-चिकित्सा' (पारद या पारे का औषधीय उपयोग) का आविष्कार किया।
आचार्य गुणमति (तर्कशास्त्र के महारथी): ५वीं-६ठी शताब्दी ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय के प्रकांड बौद्ध न्यायविद और तर्कशास्त्री आचार्य गुणमति ने विज्ञानवाद (योगाचार) दर्शन को समृद्ध किया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में गुणमति की विद्वता और उनके द्वारा जीते गए कठिन शास्त्रार्थों का बहुत ही गौरवपूर्ण वर्णन किया है।
१३वीं शताब्दी आते-आते जब भारत में सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण का दौर चल रहा था, तब मगध ने पुनः सुदूर दक्षिण की प्रतिभाओं को अपनी ओर आकर्षित किया। दक्षिण भारत के उडुपी में जन्मे और 'द्वैतवाद' दर्शन के महान प्रवर्तक जगद्गुरु माध्वाचार्य अपनी संपूर्ण भारत की दिग्विजय यात्रा के दौरान गया पहुंचे। वहां उन्होंने पारंपरिक गयापाल ब्राह्मणों और विद्वानों के साथ गहन शास्त्रार्थ किया। उनके अकाट्य तर्कों और भक्ति मार्ग से प्रभावित होकर गया के विद्वानों ने द्वैत संप्रदाय को अपनाया, जिससे मगध क्षेत्र में वैष्णव दर्शन और भक्ति आंदोलन को एक नई और सुदृढ़ दिशा मिली।. गुरुकुल से वैश्विक विश्वविद्यालयों का महासफर में यदि हम मगध की इस ज्ञान यात्रा के कालक्रम का बारीकी से अध्ययन करें, तो एक स्पष्ट वैचारिक निरंतरता दिखाई देती है। वैदिक/पौराणिक काल ऋषि च्यवन, मुद्गल, दीर्घतमा देवकुंड, हिरण्यबाहु नदी तट आयुर्वेद (च्यवनप्राश), वैदिक ऋचाएं, प्रारंभिक गुरुकुल रामायण/उपनिषद काल शृंगी ऋषि, महर्षि याज्ञवल्क्य, गार्गी, लोमश ऋषि ऋषिकुंड (मुंगेर), मगध-मिथिला सीमा पुत्रकामेष्टि यज्ञ, ब्रह्म दर्शन ('नेति-नेति'), उन्नत तर्कशास्त्र
बौद्ध काल (६ठी सदी ई.पू.) सारिपुत्र, महाप्रजापती गौतमी, उर्वेला ऋषि नालकग्राम (नालंदा), राजगृह, गया बौद्ध संघ का विस्तार, भिक्षुणी संघ (स्त्री शिक्षा), प्रज्ञा और करुणा दर्शन ,महाविहार काल (२-६वीं सदी ईस्वी) आचार्य नागार्जुन, आचार्य गुणमति नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला शून्यवाद, रस-चिकित्सा (रसायन विज्ञान), विज्ञानवाद और न्यायशास्त्र , भक्ति काल (१३वीं सदी ईस्वी) जगद्गुरु माध्वाचार्य गया (मगध) द्वैतवाद दर्शन का प्रसार, वैष्णव भक्ति आंदोलन का सुदृढ़ीकरण है ।उपर्युक्त ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि नालंदा या विक्रमशिला विश्वविद्यालय किसी एक शासक के दान से अचानक खड़े नहीं हो गए थे। इसके पीछे च्यवन, शृंगी, याज्ञवल्क्य और मतंग जैसे ऋषियों की वह महान गुरुकुल परंपरा थी, जिसने सदियों तक ज्ञान को सहेजा, परिष्कृत किया और उसे लोक-कल्याण का माध्यम बनाया। बौद्ध काल में इन्हीं गुरुकुलों ने सुसंगठित महाविहारों का रूप ले लिया । महर्षि च्यवन के आयुर्वेद-विज्ञान से शुरू हुई यह यात्रा, शृंगी ऋषि के तपोबल, याज्ञवल्क्य के उपनिषदिक चिंतन, लोमश और काकभुसुंडि ऋषि के आख्यानों, गार्गी के शास्त्रार्थ, सारिपुत्र की प्रज्ञा, नागार्जुन के शून्यवाद और माध्वाचार्य के भक्ति दर्शन से होते हुए निरंतर आगे बढ़ती रही। मगध का इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल अपना स्वरूप बदलता है। आज भी इस भूमि का हर कण, हर विलुप्त नदी का किनारा और हर प्राचीन कुंड हमें याद दिलाता है कि भारत की आत्मा ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म के इसी सुदृढ़ स्तंभ पर टिकी हुई है, जिसने इसे अनादि काल से "विश्वगुरु" के पद पर आसीन कर रखा है।
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