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संत चतुरदास जी महाराज

संत चतुरदास जी महाराज

लेखक: आनन्द हठीला
संत चतुरदास जी महाराज के जीवन का एक ऐसा प्रसंग है जो बेहद भावुक, लंबा और उनके तपोबल को पूरी तरह से दर्शाता है। यह कहानी है **"सेठ धनराज और उनके इकलौते बेटे के जीवनदान"** की। यह कहानी मारवाड़ के इतिहास में आज भी बुटाटी के बुजुर्ग सुनाते हैं, जो यह बताती है कि महाराज सिर्फ शारीरिक बीमारी ही नहीं, बल्कि इंसान के कर्मों के फेर को भी बदलने की शक्ति रखते थे।
## सेठ धनराज और उनके बेटे की लंबी कहानी
आज से करीब साढ़े चार सौ साल पहले, मारवाड़ (नागौर के पास) के एक समृद्ध नगर में **धनराज** नाम के एक बहुत बड़े सेठ रहते थे। उनके पास धन-दौलत, मान-सम्मान, हवेली और नौकर-चाकरों की कोई कमी नहीं थी। अगर कमी थी, तो बस एक बात की—उनकी कोई संतान नहीं थी। अधेड़ उम्र में जाकर, खूब मन्नतें मांगने के बाद, उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने **'मोहन'** रखा।
मोहन सेठ-सेठानी की आंखों का तारा था। लेकिन नियति का खेल कुछ और ही था। जब मोहन करीब 12 वर्ष का हुआ, तो अचानक एक दिन उसे बहुत तेज बुखार आया। उस दौर के बड़े-से-बड़े वैद्यों और हकीमों को बुलाया गया। कीमती जड़ी-बूटियाँ दी गईं, लेकिन मोहन की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गई।
एक रात ऐसा हुआ कि मोहन का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया, उसकी जुबान बंद हो गई और उसके दाहिने हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा—**"सेठ जी, लड़के पर असाध्य वात-रोग (लकवा/पैरालिसिस) का हमला हुआ है। अब यह जिंदगी भर न तो खड़ा हो पाएगा और न ही बोल पाएगा। आप भगवान का भजन कीजिए।"
 बुटाटी की तरफ प्रस्थान
सेठ-सेठानी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। हवेली में मातम छा गया। तभी उनके एक पुराने वफादार मुनीम ने कहा"सेठ जी, वैद्यों की दवा जहाँ खत्म होती है, वहाँ संतों की दुआ शुरू होती है। बुटाटी गाँव में एक सिद्ध संत रहते हैं—चतुरदास जी महाराज। वे साक्षात नारायण के अवतार हैं। आप बालक को उनके चरणों में ले जाइए।"**
धनराज ने तुरंत अपनी सबसे मजबूत बैलगाड़ी सजवाई। गाड़ी में मखमली गद्दे बिछाए गए ताकि उनके बीमार बेटे को झटका न लगे। सोने-चांदी के सिक्कों की थैलियां भी गाड़ी में रख ली गईं, क्योंकि सेठ को लगता था कि दुनिया में हर चीज पैसे से खरीदी जा सकती है।
आश्रम का पहला दृश्य
जब सेठ धनराज बुटाटी पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि महाराज चतुरदास जी एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठे हुए थे। उनके चारों तरफ गायें चर रही थीं, कुछ पक्षी उनके हाथों से दाना चुग रहे थे और महाराज बड़े शांत भाव से अपनी धूनी (पवित्र आग) के पास बैठे थे।
सेठ गाड़ी से उतरे और सीधे महाराज के चरणों में गिर पड़े। रोते हुए उन्होंने कहा—**"बाबा! मैं मारवाड़ का सबसे अमीर सेठ धनराज हूँ। मेरा इकलौता बेटा मरने की कगार पर है, उसे लकवा मार गया है। आप उसे ठीक कर दीजिए। मैं आपके इस आश्रम को सोने से मढ़वा दूँगा, आपकी सेवा में अपनी आधी संपत्ति दान कर दूँगा!"**
संत चतुरदास जी ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में कोई लालच नहीं, बल्कि एक असीम करुणा थी। वे धीमे से मुस्कुराए और बोले-"सेठ, अपनी संपत्ति की पोटली वापस गाड़ी में रख दे। यह चतुरदास गायों का चरवाहा है, इसे सोने के पत्थरों की जरूरत नहीं है। और रही बात तेरे बेटे की, तो जो बीमारी कर्मों के लेख से आती है, उसे धन नहीं, सिर्फ धर्म और विश्वास काट सकता है। जा, लड़के को यहाँ धूनी के पास सुला दे।"
परीक्षा के सात दिन
महाराज के कहने पर मोहन को वहीं एक साधारण चटाई पर सुला दिया गया। सेठ और सेठानी भी वहीं आश्रम की मिट्टी में बैठ गए।

पहला और दूसरा दिन:
 कोई चमत्कार नहीं हुआ। मोहन वैसे ही बेजान पड़ा रहा। सेठ का धैर्य डगमगाने लगा। उन्हें लगा कि शायद वे गलत जगह आ गए हैं।
तीसरा दिन:
महाराज चतुरदास जी ने अपनी धूनी से थोड़ी सी भस्म (पवित्र राख) उठाई और मोहन के माथे तथा उसके बेजान अंगों पर मली। महाराज ने सेठ से कहा-"बेटा, अगर इसे ठीक देखना चाहते हो, तो आश्रम की गायों की सेवा करो। अपने हाथों से इनका गोबर उठाओ और इन्हें चारा डालो।"*
अहंकार का टूटना जो सेठ कभी मखमल से नीचे पैर नहीं रखता था, उसने अपने बेटे की खातिर हाथ में टोकरी उठाई और गायों का गोबर साफ करने लगा। इस सेवा ने सेठ के भीतर के अमीर होने के अहंकार को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
चमत्कारी सातवीं रात
छह दिन बीत गए, लेकिन मोहन के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई। सातवीं रात को बहुत तेज आंधी-तूफान आया। आश्रम की कुटिया की छत हिलने लगी। सेठ-सेठानी डर गए, लेकिन महाराज चतुरदास जी वैसे ही समाधि में लीन बैठे रहे।
तभी आधी रात को महाराज अचानक अपनी समाधि से उठे। उन्होंने हाथ में अपना चिमटा लिया और धूनी की भस्म को हवा में उछाला। वे मोहन के पास गए और ज़ोर से कड़कती आवाज़ में बोले—**"मोहन! उठ, तेरी माँ बुला रही है। उठ और अपनी माँ के आँचल को थाम!"**
जैसे ही महाराज के ये शब्द हवा में गूंजे, एक अविश्वसनीय घटना घटी। 12 साल का वो लड़का, जो पिछले कई दिनों से हिल भी नहीं पा रहा था, उसके पूरे शरीर में एक तेज कंपन हुआ। उसकी बंद आँखें खुल गईं। उसने एक लंबी सांस ली और **"माँ!"** चिल्लाते हुए सीधे उठकर बैठ गया।
सेठ-सेठानी की आँखों से आंसुओं की बाढ़ आ गई। उन्होंने देखा कि मोहन का जो हाथ-पैर पूरी तरह टेढ़ा और बेजान हो चुका था, वह अब बिल्कुल सीधा था। वह लड़का अपने पैरों पर खड़ा हुआ और दौड़कर अपनी माँ के गले लग गया।
महाराज की सीख
सेठ धनराज महाराज के पैरों में साष्टांग दंडवत हो गए। वे सोने-चांदी की थैलियां महाराज के चरणों में रखने लगे। महाराज ने चिमटे से उन थैलियों को दूर हटा दिया और कहा "धनराज, मैंने पहले ही कहा था, चतुरदास को माया की भूख नहीं है। तेरा बेटा मेरे चमत्कार से ठीक नहीं हुआ है। यह तेरी सात दिनों की निस्वार्थ गौ-सेवा और तेरा अहंकार टूटने का इनाम है जो ईश्वर ने तुझे दिया है। अगर कुछ देना ही चाहते हो, तो अपने नगर में जाकर गरीबों के लिए अन्न क्षेत्र खोलो और जीवनभर किसी लाचार का मजाक मत उड़ाना।"
सेठ धनराज और उनका बेटा रोते हुए और महाराज के जयकारे लगाते हुए बुटाटी से विदा हुए।यह कहानी केवल एक चमत्कार की नहीं है, बल्कि यह सिखाती है कि संत चतुरदास जी महाराज के दरबार में अमीर और गरीब का कोई भेद नहीं था। आज भी बुटाटी धाम में इसी परंपरा का पालन किया जाता है—वहाँ राजा हो या रंक, सब जमीन पर एक साथ बैठकर ही बाबा की भस्म का इंतजार करते हैं।
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