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मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग

मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग

कुमार महेन्द्र
अंतरमन के शांत सरोवर में,
प्रीति-तरंगें उठने लगीं।
मृदुल मधुर अनुभूतियों में,
चाहत-कलियाँ खिलने लगीं।
निहार तुम्हारी छवि अनुपम,
भाव-विभोर हुआ अंतरंग।
मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग।।


जनमानस के व्यवहारों में,
तेरे स्नेह की हुई भनक।
परिवारों और संबंधों तक,
गूँज उठी अनुराग-खनक।
हर घड़ी, हर एक पहर में,
मिलन के खिल उठे स्वप्निल रंग।
मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग।।


दृष्टि, सृष्टि, दिशा, क्षितिज में,
हर ओर तुम्हारा ही रूप।
राग, रंग, श्रृंगार, परिधान,
सब लगते तेरे अनुरूप।
अधरों की प्रथम प्रार्थना,
नाम तुम्हारा हर श्वास-संग।
मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग।।


अंतर्मन के मृदुल घुँघरू,
मिलन-विरह के स्वर छेड़ रहे।
तेरे दर्शन की रमणीयता,
नव स्वप्नों को जोड़ रहे।
तुम्हारी तरुण सौरभ से,
महक उठे अंग-प्रत्यंग।
मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग।।


चंचल चितवन की आभा से,
मन-पावन झंकृत हो उठा।
तेरे कोमल स्पर्श-मात्र से,
सूना जीवन पुष्पित हो उठा।
प्राणों के हर एक कोने में,
प्रेम-दीप जले अंग-अंग।
मेरे रोम-रोम में तुम्हारे प्रणय की तरंग।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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