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बाल साहित्य की विकास-यात्रा: लोककथाओं से डिजिटल स्क्रीन तक

बाल साहित्य की विकास-यात्रा: लोककथाओं से डिजिटल स्क्रीन तक

सत्येन्द्र कुमार पाठक
बाल साहित्य केवल अक्षरों का जोड़ या मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह वह अदृश्य शिल्पी है जो किसी भी समाज की भावी पीढ़ी के मानस, नैतिक चेतना और भाषाई कौशल को गढ़ता है। बच्चों की कोमल कल्पनाओं, असीम जिज्ञासाओं और उनके मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर रचा गया साहित्य ही 'बाल साहित्य' कहलाता है। 15वीं शताब्दी से लेकर आज के डिजिटल और एआई (AI) युग तक, बाल साहित्य ने एक लंबा और अत्यंत रोचक सफर तय किया है। आइए, पन्नों और स्मृतियों के इस महासागर में उतरकर बाल साहित्य के गौरवशाली इतिहास, विधाओं और आधुनिक स्वरूप को विस्तार से समझें।
भारतीय बाल साहित्य की जड़ें आधुनिक काल की कहानियों में नहीं, बल्कि हमारे हजारों वर्ष पुराने प्राचीन वांग्मय में गहरी धंसी हुई हैं। यद्यपि वेद, पुराण और स्मृति ग्रंथ सीधे तौर पर केवल बच्चों के लिए नहीं लिखे गए थे, परंतु इनकी कथा-शैली और नैतिक उपदेशों ने बाल साहित्य की नींव तैयार की। वेदों से मिली कल्पनाशीलता और प्रकृति प्रेम: वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। इनमें प्रकृति के तत्वों जैसे—सूर्य, उषा, पवन, अग्नि और बादलों को सजीव पात्रों (Personification) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सुबह की 'उषा' को एक सुंदर, चंचल देवी के रूप में देखना बच्चों की उस कल्पनाशीलता का आदि-स्रोत है, जहाँ आज के बाल साहित्य में चंदा मामा मुस्कुराते हैं और पेड़ बातें करते हैं। इसके अतिरिक्त, वेदों की सूक्तियाँ जैसे "सत्यं वद, धर्मं चर" (सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो) बच्चों को शुरुआती भाषाई और नैतिक संस्कार देने का माध्यम बनीं।
पुराणों का कथा-महासागर: यदि यह कहा जाए कि भारतीय बाल साहित्य की आत्मा पुराणों में बसती है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पुराणों ने बाल साहित्य को ऐसे 'अमर बाल चरित्र' दिए, जो सदियों से बच्चों के रोल मॉडल रहे हैं। ध्रुव और प्रह्लाद की कथाएँ बच्चों को दृढ़ संकल्प, विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने और सच्ची निष्ठा की सीख देती हैं। नचिकेता का चरित्र बच्चों में ज्ञान को पाने की अटूट जिज्ञासा और तार्किक क्षमता का विकास करता है। बाल कृष्ण का चरित्र तो जैसे बाल सुलभ चेष्टाओं का चरमोत्कर्ष है। उनकी माखन चोरी, यशोदा मैया से रूठना, कालिया नाग का मर्दन और दोस्तों के साथ खेल-कूद की कहानियाँ आज भी बच्चों की सबसे पसंदीदा विधा हैं। पुराणों की इसी 'कहानियों के जरिए सीख' देने की शैली ने आगे चलकर कथासरित्सागर, पंचतंत्र और हितोपदेश जैसे शुद्ध बाल साहित्य के लिए मार्ग प्रशस्त किया। स्मृति ग्रंथों ने समाज संचालन के नियम दिए। जब बाल इतिहासकारों और साहित्यकारों ने इनके शुष्क नियमों (जैसे- बड़ों का आदर करना, जीवों पर दया करना) को सरल, मनोरंजक कहानियों में ढाला, तो इसने बच्चों में अनुशासन और संस्कारों का बीजारोपण किया। शुरुआती दौर में बाल साहित्य वाचिक या मौखिक था। दाद-दादी, नानी की कहानियों और लोकगीतों के जरिए यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर होता रहा। अमीर खुसरो की मुकरियाँ और पहेलियाँ: लिखित परंपरा में अमीर खुसरो (13वीं-14वीं सदी) का योगदान मील का पत्थर है। खुसरो ने बच्चों के मनोरंजन और उनकी दिमागी कसरत के लिए अनूठी पहेलियाँ और मुकरियाँ रचीं। जैसे: "एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।" (उत्तर: आकाश)
ये रचनाएँ बच्चों को खेल-खेल में सोचने, कल्पना करने और भाषा की बारीकियों को समझने का अवसर देती थीं। पंचतंत्र और हितोपदेश की वैश्विक गूँज: पंडित विष्णु शर्मा द्वारा रचित 'पंचतंत्र' को दुनिया का पहला व्यवस्थित बाल कहानी संग्रह माना जा सकता है। पशु-पक्षियों को पात्र बनाकर राजनीति, व्यवहार ज्ञान और नीति सिखाने का जो हुनर पंचतंत्र में है, वह बेजोड़ है। इसका अनुवाद दुनिया की सैकड़ों भाषाओं में
मध्यकाल (भक्ति काल) में भले ही बच्चों के लिए स्वतंत्र पुस्तकें नहीं छपीं, लेकिन संतों की वाणी में बाल मनोविज्ञान कूट-कूट कर भरा था। विशेषकर महाकवि सूरदास और गोस्वामी तुलसीदास ने बाल साहित्य को समृद्ध किया। सूरदास जी के कृष्ण की बाल-लीलाओं के पद (जैसे— "मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो" या "मैया कबहिं बढ़ेगी चोटी") बाल हठ, बाल मनोविज्ञान और माँ-बच्चे के वात्सल्य रस के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन्हें सुनकर बच्चे न केवल आनंदित होते थे, बल्कि अपनी भाषा और संस्कृति से भी जुड़ते थे।
18वीं शताब्दी तक आते-आते दुनिया भर में छपाई तकनीक का विकास हुआ। लंदन के प्रसिद्ध प्रकाशक जॉन न्यूबेरी ने पहली बार यह महसूस किया कि बच्चों का एक अलग बाजार है और उनके लिए विशेष रूप से आकर्षक, सचित्र और मनोरंजक पुस्तकें छपनी चाहिए। उन्होंने बाल साहित्य को एक व्यावसायिक और संगठित रूप दिया। यही कारण है कि जॉन न्यूबेरी को विश्व स्तर पर बाल साहित्य का जनक माना जाता है। उन्हीं की याद में आज भी बाल साहित्य का प्रतिष्ठित 'न्यूबेरी मेडल' दिया जाता है।
हिंदी बाल साहित्य का स्वर्णिम काल और पत्रकारिता - हिंदी में बाल साहित्य का विकास पत्र-पत्रिकाओं के विकास के साथ समानांतर रूप से जुड़ा हुआ है। इसे हम प्रमुख चरणों में देख सकते हैं: हिंदी आधुनिकता के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेरणा से सन् 1882 में प्रयाग (इलाहाबाद) से पहली बाल पत्रिका 'बाल दर्पण' का प्रकाशन शुरू हुआ। इसने हिंदी समाज में यह चेतना जगाई कि बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए अलग से गद्य और पद्य की आवश्यकता है।
20वीं सदी की शुरुआत में (सन् 1917) इलाहाबाद से ही प्रसिद्ध बाल पत्रिका 'बाल सखा' का संपादन और प्रकाशन शुरू हुआ। लल्ली प्रसाद पांडे, सोहन लाल द्विवेदी और ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे मनीषियों ने इस पत्रिका के माध्यम से बाल साहित्य को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
स्वतंत्रता के बाद भारत में बाल पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई, जिन्होंने साक्षरता बढ़ाने और बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई: चंपक: अपनी सरल पशु-पक्षियों की कहानियों के माध्यम से बच्चों को आधुनिक नैतिक मूल्य सिखाने में अग्रणी रही। नंदन और पराग: इन्होंने बच्चों को ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और साहसिक कहानियों से जोड़ा।।बाल भारती: भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा जारी इस पत्रिका ने ज्ञान-विज्ञान और सूचनाओं को बच्चों तक सरल भाषा में पहुँचाया।।इस कालखंड में सुभद्रा कुमारी चौहान (जिन्होंने 'झांसी की रानी' जैसी वीररस की बाल कविताएँ लिखीं), हरिवंश राय बच्चन, सोहन लाल द्विवेदी और बाद के दौर में प्रकाश मनु जैसे रचनाकारों ने बाल साहित्य का विपुल भंडार तैयार किया। विशेष रूप से, प्रकाश मनु द्वारा लिखित 'हिंदी बाल साहित्य का इतिहास' को इस विधा का पहला, मुकम्मल और सबसे प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ माना जाता है।
आज का बाल साहित्य केवल राजा-रानी, परियों, भूतों या केवल उपदेशात्मक कहानियों तक सीमित नहीं है। 21वीं सदी का बच्चा तकनीक से लैस है, इसलिए बाल साहित्य का कैनवास भी बड़ा हो गया है:।अंतरिक्ष, रोबोट्स और टाइम ट्रैवल जैसी कहानियाँ बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा कर रही हैं। ग्लोवल वार्मिंग, जल संरक्षण, पशु संरक्षण और जेंडर इक्वालिटी जैसे गंभीर विषयों को अब बाल कहानियों और कविताओं का हिस्सा बनाया जा रहा है। अमर चित्र कथा, चाचा चौधरी, और नागराज से शुरू हुआ सफर आज वैश्विक स्तर के ग्राफिक उपन्यासों तक पहुँच चुका है, जो कम पढ़ने वाले बच्चों को भी विजुअल्स के जरिए साहित्य से जोड़ते हैं।।बाल साहित्य का सफर मौखिक पहेलियों से शुरू होकर आज ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स और एनिमेटेड कहानियों तक पहुँच गया है। माध्यम भले ही कागज से बदलकर स्क्रीन हो गया हो, लेकिन बाल साहित्य का मूल उद्देश्य आज भी वही है—बच्चों की मासूमियत को बचाए रखना, उनकी कल्पनाशीलता को पंख देना और उन्हें एक संवेदनशील व जागरूक इंसान बनाना। वेदों की चेतना, पुराणों के अमर पात्र, खुसरो की बुद्धिमत्ता, न्यूबेरी का विजन और आधुनिक लेखकों की कलम की बदौलत बाल साहित्य का यह कारवां निरंतर आगे बढ़ता रहेगा, क्योंकि जब तक दुनिया में बच्चे रहेंगे, तब तक कहानियों और कविताओं का यह जादुई संसार भी मुस्कुराता रहेगा।
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