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प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा

प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा

कुमार महेंद्र
धड़कन की हर मृदु थिरकन में,
बस नाम तुम्हारा बजता है।
सूने पड़े इस जीवन-वन में,
मधुमास अचानक सजता है।
साँसों की कोमल वीणा पर,
तेरा स्वर मधुबन-सा घुलने लगा।
प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा।।


तुम मौन रहो, तो भी प्रियतम,
मन में संवाद उतरते हैं।
तेरी स्मृतियों के शीतल झोंके,
प्राणों में चंदन भरते हैं।
लोचन के निर्मल दर्पण में,
रूप तुम्हारा सँवरने लगा।
प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा।।


तेरी पायल की मृदु रुनझुन से,
मन में उत्सव-राग जगे।
तेरे अधरों की मंद हँसी से,
सूखे उपवन अनुराग जगे।
तेरे स्पर्शों की स्निग्ध तपन से,
रोम-रोम मेरा निखरने लगा।
प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा।।


तुम केवल प्रिय का नाम नहीं,
मेरे मन का उत्सव हो प्रिय।
तुम केवल रूप-मोह नहीं,
जीवन का नव-गौरव हो प्रिय।
तेरे प्रेम-दीप की ज्योति पाकर,
तम का हर कोना गलने लगा।
मेरे अंतर के सूने मंदिर में,
तेरा ही रूप उतरने लगा।
प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा।।


तेरी चाहत की उजली आभा
मन-आकाश पे छाने लगी।
विरह-धूल में ढकी हुई आशा
फिर से कोंपल लाने लगी।
तेरे स्नेह-स्पर्श की वर्षा से,
भीतर का मरुथल हरने लगा।
भावों के निर्जन आँगन में,
प्रीति-सुमन फिर झरने लगा।
प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा।।


अब तुम ही मेरी प्रार्थना हो,
तुम ही मन का अभिनंदन हो।
तुम ही नयनों की शीतलता,
तुम ही अधरों का स्पंदन हो।
जब से तुमने हृदय छुआ है,
जीवन स्वर्णिम ढलने लगा।
मेरे अंतस के कण-कण में,
तेरा आलोक मचलने लगा।
प्रणय का रंग, अब मुझ पर चढ़ने लगा।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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