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"शून्य की साधिका"

"शून्य की साधिका"

पंकज शर्मा
कौन मुझे
इस मौन गगन में
अश्रु-किरण-सा बुलाता है?
लौह-लताओं में बँधा हुआ तन,
फिर भी अंतर
नभ तक जाता है।
किस असीम के
मूक निमंत्रण पर
यह प्राण नित्य झुक जाता है?


बाँध सके क्या
ये जड़ बंधन
उस उड़ान को
जो पंख बिना
निशि की गोद में
दीप बन
जलना जान गई?
मेरे पथ का
एकाकी तम ही
मेरा चिर सहचर है।


ऊपर उठता
यह रिक्त कर,
किसका स्पर्श टटोल रहा?
नीचे झुकती
यह थकी भुजा,
किस पीड़ा को
गोद रही?
एक दिशा
अनंत को सुनती,
दूजी जग का
मौन विलाप।


प्रिय!
तुम यदि
शून्य बने हो,
मैं क्यों
स्वर बन जाऊँ?
मुझे रहने दो
इस नीरवता में,
जहाँ
मिलन भी
विरह बन जाता है।


तंतु-तंतु में
कौन छिपा है?
जो छूते ही
काँप उठे
मेरा सारा
निर्वाक अस्तित्व।
धातु नहीं यह—
जमी हुई
प्रतीक्षा है,
जिसमें
युगों का
एक निःश्वास
अभी तक जीवित है।


मैंने देखा—
दीप नहीं जलता,
जलती है
उसकी प्रतीक्षा।
पथ नहीं चलता,
चलती है
उसकी प्यास।
शायद
इसीलिए
मेरे भीतर
अब भी
कोई
अदृश्य पदचाप
गूँजती रहती है।


जब-जब
नभ से
कोई मौन किरण
उतरती है,
मेरे समस्त
लौह-पाश
क्षण भर को
फूल बन जाते हैं।
तब लगता है—
विरह ही
प्रिय का
सबसे निकट
आलिंगन है।


अब
मुझे न
मुक्ति चाहिए,
न मिलन।
केवल इतना—
मेरे इस
मूक नर्तन में
तुम्हारी
अदृश्य छाया
युगों तक
काँपती रहे।
यदि यही
शून्य है—
तो यही
मेरा
अनंत है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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