क्या बांकीपुर उपचुनाव सीएम सम्राट चौधरी के राज का जनमत संग्रह होगा?.jpeg)
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मंजू सिंह
जन सुराज पार्टी ने आखिरकार आज घोषणा कर दी कि प्रशांत किशोर ही बांकीपुर उपचुनाव में पार्टी के उम्मीदवार होंगे. यह बड़ा फैसला है. इस फैसले से पार्टी को 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार से उबरने का एक बड़ा अवसर मिलेगा. इस तरह यह चुनाव उसके लिए कंपार्टमेंटल परीक्षा सरीखा होगा. यह बड़ा चुनाव होने वाला है. क्योंकि यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के त्यागपत्र के बाद खाली हुई है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सीट 1995 से ही भाजपा के पास रही है. अगर पीके इस चुनाव को जीत लेते हैं तो वे भाजपा के इस 31 साल पुराने गढ़ को ध्वस्त करने में कामयाब होंगे.
इतना ही नहीं पीके ने आज यह कह कर चुनाव को और महत्वपूर्ण बना दिया है कि यह चुनाव सम्राट चौधरी के अब तक से शासन काल पर जनमत होगा. क्योंकि पिछले चुनाव में सम्राट को सीएम कैंडिडेट नहीं बनाया गया था. वे बैकडोर से सत्ता में आ गये हैं. ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशांत किशोर इस सीट को जीत पाते हैं, यह भाजपा इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बनाकर फिर से इसे बचाने में कामयाब रहती है.
वे फैक्टर जिसके कारण पीके की जीत सकते हैं
पिछले चुनाव में जन सुराज के हारने की एक बड़ी वजह यह मानी गई कि प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा. तीन साल से लगातार पदयात्रा कर माहौल बनाने वाले प्रशांत को न लड़ता देख उनके समर्थकों में एक सुस्ती आ गई. उन्हें लगा कि उनका नेता रिस्क नहीं ले रहा है. हालांकि तब यह तर्क दिये गये थे कि अगर पीके चुनाव लड़ेंगे तो बाकी सीटों पर प्रचार कैसे करेंगे.
बहरहाल ऐसे में इस बार पीके ने खुद चुनाव लड़ने का फैसला कर एक तरह से यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे रिस्क लेने और अपनी पार्टी को फ्रंट से लीड करने के लिए तैयार हैं.
बांकीपुर शहरी सीट है. वैसे तो इस सीट पर बहुत कम मतदान होते हैं. कई बार 40 फीसदी से भी कम. मगर माना जाता है कि यहां के वोटर मुद्दों को लेकर जागरूक रहते हैं. पहले से कहा जा रहा था कि अगर पीके खुद चुनाव लड़ते हैं तो यहां की जनता उन्हें वोट करने का मन बना सकती है.
दूसरा फैक्टर यह है कि भरत तिवारी मामले में लीड लेकर उन्होंने राज्य के सवर्ण मतदाताओं की सहानुभूति हासिल की है. इसका लाभ उन्हें इस चुनाव में मिल सकता है.
उनके कार्यकर्ता, खास कर मिथिला स्टूडेंट यूनियन से जन सुराज में शामिल हुई टीम लंबे समय से इस इलाके में सक्रिय है और वह यहां की गंदगी और नागरिक संसाधनों की कमी को लेकर लगातार मुखर है. पीके भी कुछ दिनों से इस इलाके में मोहल्ला सभा कर रहे हैं.
तीसरा फैक्टर, भरत तिवारी प्रकरण, स्टेट हाइवे पर टोल टैक्स और पंचायतों में कर, निजीकरण में तेजी, आर्थिक संकट मामलों के कारण राज्य सरकार बैकफुट पर है. ऊपर से ईथेनॉल मामला, परीक्षाओं न करवा पाने की स्थितियों के कारण लोगों में केंद्र के प्रति भी गुस्सा है, इसका लाभ पीके को मिल सकता है.
क्या विपक्ष पीके का साथ देगा?
पीके चाहते हैं कि इस चुनाव को सम्राट चौधरी सरकार के खिलाफ रेफरेंडम बनाकर वे विपक्षी पार्टियों का साथ ले लें. क्योंकि इस एक हार से सत्ता पक्ष को बड़ा झटका लगेगा और विपक्ष का मनोबल ऊंचा होगा. ऐसी खबरें हैं कि कांग्रेस उन्हें समर्थन करने के लिए तैयार है. मगर राजद और वामदल क्या उन्हें साथ देंगे, यह देखने वाली बात होगी.
वाम दल एक बार विपक्षी एकता के नाम पर उन्हें सुरक्षित पैसेज दे सकती है. मगर राजद औऱ तेजस्वी यादव जिन पर पीके लगातार तीखे और व्यक्तिगत हमले करते रहे हैं, क्या वे उन्हें वाक ओवर देने के लिए तैयार होंगे.
कांग्रेस इस कोशिश में है कि महागठबंधन किसी प्रतीकात्मक उम्मीदवार को टिकट दे, ताकि पीके का रास्ता आसान हो. मगर तेजस्वी शायद ही इसके लिए राजी हो. क्योंकि बीते दिनों में कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को उन्होंने इसी तरह रोकने की कोशिश की. माना जाता है कि तेजस्वी जो खुद को बिहार का भविष्य का सीएम मानते हैं, वे अपने सामने किसी प्रतिद्वंद्वी को खड़ा होने नहीं देंगे. ऐसे में इस बात की उम्मीद कम ही है कि वे पीके के बाहरी समर्थन या वाक ओवर दें.
इसके बावजूद अगर वे पप्पू यादव की तरह जीत जायें तो यह भी हैरत की बात नहीं.
नाखुश भाजपाई और जदयू वालों का मिल सकता है अंदरूनी समर्थन
ऐसा कहा जा रहा है कि भाजपा में ऐसे नेताओं की बड़ी संख्या है जो सम्राट चौधरी को सीएम बनाये जाने और नितिन नवीन को इतना बड़ा पद दिये जाने से नाखुश हैं. ऐसे कई नेताओं के अपने घर इस इलाके में हैं. वे अंदर ही अंदर भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं.
इसी तरह जदयू के कई बड़े नेता जो मौजूदा नेतृत्व में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. वे भी इस चुनाव में भाजपा की हार की वजह बन सकते हैं.
भाजपा के बारे में माना जा रहा है कि वह नितिन नवीन की पसंद नील रतन घोष को टिकट दे सकती है. अगर उन्हें टिकट दिया गया तो वे पीके के आगे कमजोर प्रत्याशी होंगे. उनके अलावा अजय आलोक के नाम की भी चर्चा चल रही है. वे अगर चुनाव में उतरते हैं तो कांटे की टक्कर होगी.
शाह की रणनीति की काट ढूंढ पायेंगे पीके?
इन तमाम सकारात्मक पहलुओं के बावजूद पीके के लिए एक बड़ी चुनौती अमित शाह होंगे. वे किसी सूरत में नहीं चाहेंगे कि भाजपा का गढ़ ध्वस्त हो जाये या उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पार्टी हार जाये. वे जमीनी स्तर पर रणनीति बनाकर हारे हुए चुनाव को जीतने के लिए जी-जान लगा देते हैं.
ऐसे में अगर वे पटना में आकर बैठ जाते हैं तो पीके के लिए अपने पहले चुनाव को जीतना आसान नहीं होगा. अगर वे अपना पहला चुनाव जीत नहीं पाते हैं, तो यह उनके लिए बड़ा झटका होगा. फिर भी उम्मीद की जा सकती है कि पीके जो खुद एक सफल इलेक्शन स्ट्रेटजिस्ट हैं, शाह की सोच से आगे की रणनीति तैयार कर रहे होंगे.
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