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अमर शहीद भरत भूषण तिवारी - एक नाम नहीं, व्यवस्था से टकराने का साहस।

अमर शहीद भरत भूषण तिवारी - एक नाम नहीं, व्यवस्था से टकराने का साहस।

मंजू सिंह
कल एक रील देखी। किसी ने पूछा-"देश का असली हीरो कौन है? कोई अभिनेता, कोई नेता?"

एक युवती ने बिना एक पल रुके कहा-"हमारे देश का हीरो तो अमर शहीद भरत भूषण तिवारी हैं, बाकी सब जीरो।"

आख़िर कितने लोग होते हैं जो मात्र 28 वर्ष की उम्र में भ्रष्टाचार, सत्ता की मनमानी और सड़ी हुई व्यवस्था को चुनौती देने के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा देते हैं?

आज तो एक एफआईआर दर्ज होते ही लोग शहर छोड़ देते हैं, लेकिन एक नौजवान गोलियों के सामने डटकर खड़ा रहा। अपने लिए नहीं, उस व्यवस्था के खिलाफ जिसे बदलने का सपना उसने देखा था।

और विडंबना देखिए...

कुछ लोगों को उसका बलिदान दिखाई नहीं देता, सिर्फ़ उसके हाथ की बंदूक दिखाई देती है😡

मैं पूछना चाहती हूँ-उस बंदूक से कितने लोगों की जान गई? किसका घर उजड़ा? किस परिवार को उसने अनाथ किया?

लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि वह स्वयं गोलियों से छलनी होकर क्यों शहीद हुआ?

जब Pappu Yadav ने उसके परिवार को मुआवज़ा देने की बात कही, तब भी कुछ लोग जल उठे।

इतनी आग... इतनी नफ़रत... इतना आक्रोश...

यह सब भ्रष्टाचार के खिलाफ क्यों नहीं दिखता?
गलत नेताओं के खिलाफ क्यों नहीं दिखता?
जनता को लूटने वाली नीतियों के खिलाफ क्यों नहीं दिखता?

हर बात को जाति के चश्मे से देखने वालों से एक प्रश्न है...

क्या शहादत की भी कोई जाति होती है?
क्या अन्याय जाति देखकर किसी के घर में प्रवेश करता है?

याद रखिए, जिस दिन यही अन्याय आपके अपने दरवाज़े तक पहुँचेगा, उस दिन न जाति काम आएगी, न चाटुकारिता, न दलाली।

उस दिन केवल एक सवाल गूँजेगा...

जब व्यवस्था के लिए लड़ने वाले युवाओं का अपमान किया जा रहा था, तब हम किसके साथ खड़े थे? 

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