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भारतीय साम्राज्यों के निर्माता 'ऋषि, गुरु और पुरोहित'

भारतीय साम्राज्यों के निर्माता 'ऋषि, गुरु और पुरोहित'

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत की भूमि केवल राजाओं के शौर्य और युद्धों की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन ऋषियों, मुनियों, गुरुओं और पुरोहितों के बौद्धिक चिंतन की भी कहानी है जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर राष्ट्र का भाग्य बदला। मन्वंतर काल (पौराणिक युग) से लेकर मौर्य, गुप्त, पाल और सेन राजवंशों तक, जब-जब राजाओं ने इन मनीषियों को प्रश्रय (संरक्षण) दिया, तब-तब एक महान साम्राज्य का उदय हुआ। इन गुरुओं का अवदान (योगदान) केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, बल्कि वे राजनीति, कूटनीति, विज्ञान और समाजशास्त्र के सच्चे वास्तुकार थे।
पौराणिक मन्वंतर काल में राजा और ऋषि के बीच का संबंध मार्गदर्शक और शिष्य का था। राजा जनक जैसे 'राजर्षि' और वशिष्ठ-विश्वामित्र जैसे ऋषियों ने राजसत्ता को धर्म (कर्तव्य) के अधीन रखना सिखाया।
यही परंपरा ऐतिहासिक काल में मौर्य साम्राज्य के दौरान अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची। मगध (पाटलिपुत्र) के राजा चंद्रगुप्त मौर्य ने आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) को अपना गुरु और प्रधान पुरोहित नियुक्त किया। चाणक्य ने 'अर्थशास्त्र' जैसी कालजयी कृति रचकर राज्य संचालन, कूटनीति और अर्थव्यवस्था के जो नियम दिए, उन्होंने भारत को पहला 'अखंड साम्राज्य' बनाया। बाद में, सम्राट अशोक ने बौद्ध गुरु उपगुप्त के प्रभाव में आकर युद्ध का मार्ग छोड़ा और 'धम्म' (लोक-कल्याण) को अपनाया, जिसने मौर्य साम्राज्य को वैश्विक पहचान दिलाई।
गुप्त साम्राज्य (4थी-5वीं शताब्दी) को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल में राजाओं ने वैदिक पुरोहितों और वैज्ञानिकों को अभूतपूर्व प्रश्रय दिया। समुद्रगुप्त के पुरोहित और महाकवि हरिषेण ने 'प्रयाग प्रशस्ति' के माध्यम से साम्राज्य की नीतियों को अमर कर दिया। इसी काल में ऋषि तुल्य वैज्ञानिक आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने खगोलशास्त्र और गणित में भारत का डंका बजाया।
7वीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने बौद्ध और सनातन दोनों परंपराओं के विद्वानों को सिर-आँखों पर बिठाया। हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट ने 'हर्षचरित' लिखकर इतिहास को समृद्ध किया। वहीं, चीनी भिक्षु ह्वेनसांग और नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र के मार्गदर्शन में हर्ष ने शिक्षा को राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया, जिससे भारत वैश्विक शिक्षा का केंद्र (विश्वगुरु) बन गया।।मध्यकाल की शुरुआत में बंगाल और बिहार के पाल शासकों (जैसे धर्मपाल) ने बौद्ध गुरुओं को विशेष संरक्षण दिया। उन्होंने विक्रमशिला और सोमपुरा जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना की। इस काल के महान गुरु अतिश दीपंकर ने तिब्बत की यात्रा कर वहां ज्ञान का प्रकाश फैलाया।
पाल वंश के बाद आए सेन राजवंश (विशेषकर राजा लक्ष्मण सेन) के काल में पुनः वैदिक परंपरा का उत्थान हुआ। उनके राजपुरोहित हलायुध ने 'ब्राह्मण-सर्वस्व' ग्रंथ लिखा, जिसने तत्कालीन समाज के आचार-विचार और न्याय व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया। इसी दौर में सांस्कृतिक गुरु जयदेव ने 'गीतगोविंद' की रचना की, जिसने भारतीय कला और भक्ति मार्ग को एक नई दिशा दी।आज का आधुनिक भारत भले ही लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था से चलता हो, लेकिन हमारी प्रशासनिक नीतियां, न्याय प्रणाली (कौटिल्य के सिद्धांत) और 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना इन्हीं ऋषियों और गुरुओं की देन है। प्राचीन साम्राज्यों का इतिहास गवाह है कि जब भी शासकों ने गुरुओं के ज्ञान और पुरोहितों के नैतिक मूल्यों को प्रश्रय दिया, समाज का कल्याण ही हुआ। गुरु-शिष्य की यह महान परंपरा आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना का मूल आधार है।
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