पुष्पों की सुगंध
अरुण दिव्यांशमानवता का सौगंध ले ,
तू पुष्पों की सुगंध ले ,
ऊपर सदा तू बढ़े चल ,
शीर्ष सदा तू चढ़े चल ।
पुष्पों से तुम सीख लो ,
सदाचार का भीख लो ,
आदर प्यार व्यवहार में ,
सत्कार को लिख लो ।
तू सेवा उपकार में पल ,
बुरे के बदले भले चल ,
संकट जाए स्वयं टल ,
मत बन तू भी खल ।
पुष्पों सा सुगंध तू भर ,
मत दुर्गंध से ही डर ,
मरना तो एक दिन है ,
राष्ट्र हेतु कुछ करके मर ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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