राजधानी में धर्म, संस्कृति, साहित्य और कला : हम अपना कर्तव्य कितना निभा रहे हैं?
हृदय नारायण झा
राजधानी पाटलिपुत्र में धर्म, संस्कृति, साहित्य और कला से जुड़े लोगों की सक्रियता को देखकर मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है-क्या हम वास्तव में अपने दायित्वों का निर्वाह कर रहे हैं, अथवा केवल आयोजनों और औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह गए हैं? वर्तमान परिवेश को देखकर, सुनकर और अनुभव कर मन चिंतित हो उठता है कि हमारी सांस्कृतिक गतिविधियाँ किस दिशा में जा रही हैं और उनका वास्तविक लाभ किसे प्राप्त हो रहा है।
भारतीय सभ्यता और संस्कृति की आधारशिला धर्म, साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला तथा अन्य कलात्मक विधाओं पर टिकी रही है। इनका उद्देश्य केवल मनोरंजन या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा अर्जित करना नहीं था, बल्कि मानव जीवन को ज्ञान, विवेक, संस्कार, सौंदर्यबोध और संतुलित जीवन-दृष्टि प्रदान करना था। समाज में समरसता, संवेदना और नैतिक मूल्यों के संरक्षण का उत्तरदायित्व संतों, विद्वानों, साहित्यकारों, कलाकारों और चिंतकों पर रहा है। चित्रकार अपने समय का साक्षी बनकर समाज की आत्मा को रंगों में अभिव्यक्त करता है, साहित्यकार शब्दों के माध्यम से जनमानस को दिशा देता है और कलाकार अपने प्रदर्शन से समाज के भीतर चेतना का संचार करता है।
दुर्भाग्यवश आज राजधानी में आयोजित होने वाले अनेक धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इस मूल चेतना का अभाव दिखाई देता है। कार्यक्रमों की संख्या बढ़ी है, मंचों की चमक बढ़ी है, किंतु उनके सामाजिक प्रभाव और वैचारिक गहराई में अपेक्षित वृद्धि नहीं दिखती। धर्म के नाम पर आयोजन तो हो रहे हैं, किंतु धर्म की आत्मा-आत्मबोध, करुणा, संयम और लोकमंगल-को जागृत करने का प्रयास अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। अनेक धार्मिक संस्थानों में ऐसे विद्वानों और मार्गदर्शकों की कमी अनुभव की जाती है जो धर्म के वास्तविक मर्म को समझकर समाज तक पहुँचा सकें। परिणामस्वरूप प्रवचन, सत्संग, भजन-संध्या और भंडारे जैसे कार्यक्रम होने के बावजूद उनका व्यापक सामाजिक प्रभाव दिखाई नहीं देता।
साहित्य जगत की स्थिति भी विचारणीय है। साहित्य का उद्देश्य केवल रचना प्रकाशित करना या गोष्ठियों का आयोजन करना नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता, समरसता, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का विकास करना है। आज कविता-पाठ, पुस्तक-विमोचन और साहित्यिक सभाएँ तो निरंतर आयोजित हो रही हैं, किंतु उनका प्रभाव सामान्य जनजीवन और सामाजिक चेतना पर अपेक्षित रूप से परिलक्षित नहीं हो रहा है। साहित्य यदि समाज और राष्ट्र के हित में परिवर्तन का माध्यम न बने, तो उसका उद्देश्य अधूरा माना जाएगा।
संगीत, गायन, वादन और नृत्य की दुनिया भी अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है। कला साधना का क्षेत्र है, जहाँ विनम्रता, अनुशासन, समर्पण और आत्मसंयम सर्वोपरि होते हैं। किंतु आज अनेक कलाकार प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की दौड़ में उलझे दिखाई देते हैं। संगीत का मूल उद्देश्य मानव जीवन में संतुलन, संवेदना और आनंद का संचार करना है, परंतु यह भावना धीरे-धीरे कमजोर पड़ती प्रतीत होती है। कई स्थानों पर तकनीकी दक्षता, परंपरा की समझ और गंभीर साधना का अभाव भी दृष्टिगोचर होता है।
चित्रकला और अन्य ललित कलाओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। एक चित्रकार केवल रंगों का संयोजन नहीं करता, वह अपने समय का इतिहास रचता है। उसकी कृतियाँ समाज की चेतना, संघर्ष, आकांक्षाओं और मूल्यों का दस्तावेज होती हैं। यदि चित्रकार, साहित्यकार, संगीतकार, नृत्यकार और धर्माचार्य अपने-अपने क्षेत्र में कर्तव्यबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ कार्य करें, तभी राजधानी की सांस्कृतिक पहचान सशक्त हो सकेगी और राष्ट्र का सांस्कृतिक भविष्य सुरक्षित एवं उज्ज्वल बन सकेगा।
आज आवश्यकता केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण सांस्कृतिक जागरण की है। धर्म में आत्मबोध और लोककल्याण का भाव, साहित्य में जनचेतना और लोकमंगल की दृष्टि, संगीत में साधना और संवेदना तथा कला में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पुनः स्थापित करनी होगी। तभी पाटलिपुत्र अपनी ऐतिहासिक गरिमा के अनुरूप पुनः राष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेगा।
आज प्रत्येक संवेदनशील नागरिक के मन में यही प्रश्न गूँज रहा है-क्या हम अपने कर्तव्य का सही निर्वाह कर रहे हैं, अथवा केवल परंपराओं के बाहरी स्वरूप को निभाने में संतुष्ट हो गए हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें स्वयं अपने अंतर्मन में खोजने की आवश्यकता है।
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