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लोकतंत्र, आलोचना और जनसंघ

लोकतंत्र, आलोचना और जनसंघ


डॉ राकेश कुमार आर्य
गांधी जी का अहिंसावादी दृष्टिकोण देश के विभाजन का एक महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ । इसी प्रकार नेहरू जी का अहिंसा के प्रति अतिवादी दृष्टिकोण भी देश के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। उन्होंने गांधी जी से भी आगे बढ़कर अहिंसा का प्रचार प्रसार किया। अहिंसा का शोर मचाते मचाते और इसे भारत की राष्ट्रीय नीति घोषित करते-करते स्वयं कांग्रेसी नेतृत्व के कान पक गए थे। उन्हें बाहर का कोई शोर सुनाई नहीं दे रहा था। कहा जा सकता है कि वह आत्म मुग्ध की सी अवस्था को प्राप्त हो गये थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अतिवादी नेहरू अधिनायकवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए अहिंसा को भारतीय कूटनीति और राजनीति का एक अचूक ब्रह्मास्त्र सिद्ध करने की जिद पर पड़ गए। उन्होंने तनिक भी यह नहीं सोचा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को लेकर कभी भी अड़ियल नहीं होना चाहिए और यदि दूसरों के घर में हथियार हैं तो अपने घर में भी हथियार रखने की नीति अपनाना ही उचित होता है। नेहरू जी चीन को लेकर कभी स्पष्ट नहीं रहे। चीन की नीतियां एक कम्युनिस्ट देश होने के कारण मानवता के अनुकूल नहीं रहीं। चीन की ड्रैगन वादी नीति और भारत के तत्कालीन नेतृत्व की अहिंसावादी नीति दोनों में कोई संबंध हो ही नहीं सकता था। यह बेमेल की खिचड़ी थी। जिसे नेहरू जी पकाने में व्यस्त थे। वे चीन को बड़ा भाई मानते थे और यह भ्रम पाल चुके थे कि बड़े भाई के रूप में चीन हमारा संरक्षक रहेगा। 24 अक्टूबर 1951 को चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। 1959 में बौद्धों के धर्मगुरु दलाईलामा को भी तिब्बत छोड़कर भारत आना पड़ा। चीन विस्तारवादी नीति अपना रहा था और बड़े-बड़े देशों के भूभाग को लेकर अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाता जा रहा था। इधर हमारा नेतृत्व था जो कि सामने खड़े संकटों को देखकर भी निश्चिंत होकर सो रहा था। नेहरू जी को एक जिद हो गई थी कि चाहे जो कुछ हो जाए, वह चीन की गतिविधियों को अपने देश के लिए खतरनाक कहने वाले नहीं हैं।
उन दिनों भी अमेरिका चीन की गतिविधियों और नीतियों को लेकर स्पष्ट था। वह चीन को सोता हुआ राक्षस मानता था। उसकी स्पष्ट मान्यता थी कि उसकी साम्राज्यवादी और विस्तारवादी नीति संसार के लिए खतरनाक हो सकती है। इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाला अमेरिका कम्युनिस्ट चीन की अपेक्षा भारत को प्राथमिकता देता था।
भारत में उसे समय जनसंघ एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कार्य कर रहा था। जनसंघ नेहरू जी की गहन निद्रा को भंग करने का हर संभव प्रयास कर रहा था और बताता जा रहा था कि चीन जिस प्रकार की नीतियों पर चल रहा है वे भविष्य में भारत के लिए खतरनाक हो सकती हैं। परंतु नेहरू जी थे कि ठाठ से बांसुरी बजा रहे थे। जब भारत को सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाने के लिए अमेरिका जैसा देश भी तैयार था तब भी गांधीजी के शिष्य और भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता मिलने की वह थाली अपने बड़े भाई चीन की ओर सरका दी थी।
सितंबर 2023 में नवभारत टाइम्स में 26 एक लेख के अनुसार कुछ साल पहले 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट में कांग्रेस नेता शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया' का हवाला दिया गया था। किताब में थरूर लिखते हैं कि 1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था। यह और बात है कि नेहरू ने चीन को वरीयता दी। थरूर के मुताबिक, भारतीय राजनयिकों ने वह फाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इनकार का जिक्र था। पंडित नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।'
हम स्वाधीनता पूर्व के अपने उन आलसी और प्रमादी राजाओं को बहुत कोसते हैं जिनके कारण विदेशी आक्रांताओं को हमारे देश पर शासन करने का अवसर उपलब्ध हुआ था। यद्यपि उस समय भी कुछ लोग थे जो आलसी और प्रमादी राजाओं को जाग रहे थे परंतु वह जग नहीं थे। यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब 1947 के बाद देश की पहली सरकार पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी तो वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति इसी आलस्य और प्रमाद का प्रदर्शन कर रही थी, जिसके कारण देश को दीर्घ काल तक गुलामी झेलनी पड़ी थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेता कांग्रेसी सरकार की चीनी नीति का विरोध कर रहे थे।
उपरोक्त लेख के अनुसार अमेरिका और सोवियत संघ 1950 के दशक में ही भारत को स्थायी सदस्यता दिलवाना के पक्ष में थे। इसकी एक वजह यह भी थी कि भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र के संस्‍थापक सदस्‍यों में था। एक जनवरी 1942 को संयुक्‍त राष्‍ट्र की स्‍थापना की घोषणा पर हस्‍ताक्षर हुए थे। जिन 26 देशों ने इस पर दस्‍तखत किए थे उनमें से एक भारत भी था। ....इस सब के बीच भारत को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता देने की चर्चा हुई। उस वक्‍त चीन में गृह युद्ध चल रहा था। च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी में तलवारें खिंची हुई थी। इस संघर्ष में न जाने कितना खून बह चुका था। अमेरिका ही नहीं उसके सहयोगी ब्रिटेन और फ्रांस को भी कम्‍युनिस्‍ट रत्‍तीभर नहीं सुहाते थे। वे कतई चीन को सुरक्षा परिषद में नहीं देखना चाहते थे। हुआ यूं कि चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को मिली। ...करीब-करीब इसी समय 15 अगस्‍त 1947 को भारत आजाद हुआ था। नेहरू प्रधानमंत्री बने। वह रूस और चीन की समाजवादी सोच से बहुत ज्‍यादा प्रभावित थे। इसी का नतीजा था कि जब चीन में माओ त्‍से तुंग की कम्‍युनिस्‍ट सरकार बनी तो भारत उसे राजनयिक मान्‍यता देने वाले देशों में अव्‍वल था। नेहरू की सोच 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' वाली थी।"
ऐसी परिस्थितियों में 1962 का भारत चीन युद्ध हुआ। तत्कालीन परिस्थितियों का अवलोकन करने से स्पष्ट है कि भारत का नेतृत्व उपस्थित संकट से सावधान नहीं था। इसका एक कारण यह भी था कि उसे 1947 में देश की आजादी के बाद सत्ता बड़े आराम से मिल गई थी। कांग्रेस और कांग्रेस के नेताओं का बलिदानों से दूर-दूर का भी सरोकार नहीं था। इसलिए उसे यह पता नहीं था कि आजादी खून बहा कर मिली है और यदि इसे सुरक्षित रखना है तो इसके लिए भी खून बहाने की आवश्यकता पड़ेगी। हम सभी को यह भली प्रकार ज्ञात है कि चीन से हमारा सीमा संबंधी विवाद लंबे समय से चला आ रहा था। मैकमोहन रेखा को चीन मानता नहीं था। अक्साईचिन् में भी उसका दावा चला आ रहा था। बात स्पष्ट है कि विस्तारवादी चीन कभी भी कोई बखेड़ा खड़ा कर सकता था। इसीलिए भारतीय जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय और उनके अन्य साथी संसद और संसद के बाहर दोनों स्थानों पर कांग्रेस की नेहरू सरकार को घेरते रहते थे। 1959 में जब दलाईलामा तिब्बत छोड़कर भारत आए तो भारत की सरकार ने उन्हें शरण प्रदान कर दी। अब एक ओर तो भारत की सरकार चीन से भाईचारा निभा रही थी और दूसरी और चीन के परम शत्रु दलाईलामा को उसने अपने यहां शरण दे दी । यह कूटनीतिक दृष्टिकोण से उचित नहीं था। या तो भारत सरकार को प्रारंभ से ही खुलकर तिब्बत के समर्थन में आना चाहिए था और वैश्विक समर्थन प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए था कि चीन तिब्बत को हड़प न सके। या फिर तिब्बत के प्रति पूर्णतया तटस्थ भाव अपना कर रहना चाहिए था। यदि दलाईलामा अपना देश छोड़कर निकलने की तैयारी भी कर रहे थे तो भी भारत सरकार को ऐसा कोई संदेश या संकेत नहीं देना चाहिए था कि आप भारत आओ और हम आपका स्वागत करेंगे।

( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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