स्वतंत्रता के स्वप्न और संवैधानिक संकल्प की कसौटी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल एक भौगोलिक या राजनीतिक संप्रभुता की लड़ाई नहीं था। वह सदियों से औपनिवेशिक दासता, सामाजिक असमानता, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक जड़ता से जकड़े एक विशाल उपउपमहाद्वीप की सामूहिक मुक्ति का उद्घोष था। देश की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर सपूतों ने एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी, जहाँ न्याय, बंधुत्व और अवसरों की समता समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। इसी महान स्वप्न को एक सुदृढ़ वैधानिक ढांचा देने के लिए १९५० में भारत का संविधान लागू हुआ। संविधान निर्माताओं ने तात्कालिक सामाजिक यथार्थ और ऐतिहासिक अन्यायों को गहराई से समझा था। सदियों से सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर धकेले गए अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति के समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए 'सकारात्मक भेदभाव' (Positive Discrimination) के तहत लोक सभा, विधान सभा क्षेत्रों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया। उद्देश्य स्पष्ट था—यह व्यवस्था एक निश्चित समय के लिए एक सीढ़ी बनेगी, जो पिछड़े वर्गों को समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष खड़ा होने का हौसला और अवसर देगी। लेकिन आज सात दशकों के बाद, जब हम इस व्यवस्था का पुनरावलोकन करते हैं, तो एक यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है: क्या हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे एक 'आरक्षण तंत्र' में तब्दील हो रहा है? और क्या इस वैचारिक व प्रशासनिक टकराव के बीच राष्ट्र का चतुर्दिक विकास संभव है।
इतिहास इस बात का निर्विवाद गवाह है कि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज में मेधा (Merit) और प्रबुद्ध वर्ग (Intellectuals) को क्या स्थान प्राप्त है। ज्ञान-आधारित समाज ही टिकाऊ विकास की नींव रख सकता है। चाहे प्राचीन काल के महान साम्राज्य रहे हों या आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र, जब-जब राजनीति ने अपने तात्कालिक लाभ के लिए बुद्धिजीवियों, विचारकों और योग्य पेशेवरों की आवाज को दबाने या उन्हें हाशिए पर धकेलेने का प्रयास किया है, तब-तब सभ्यताओं का ह्रास हुआ है। जब राजनीतिज्ञों के आक्रामक तेवर नीतियों के निर्धारण में प्रबुद्ध वर्ग के तर्कों पर हावी होने लगते हैं, तो दूरगामी परिणाम आत्मघाती होते हैं। जब-जब बुद्धिजीवियों पर वैचारिक या प्रशासनिक शिकंजा कसा गया है, तब-तब देश के आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों का पतन हुआ है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि:
: बुद्धिजीवी वर्ग समाज और अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक विश्लेषण करता है, जबकि शुद्ध राजनीतिज्ञ केवल अगले चुनाव और तात्कालिक वोट बैंक को देखते हैं। जब प्रबुद्ध वर्ग को दरकिनार किया जाता है, तो नीतियां लोकलुभावन तो हो सकती हैं, लेकिन वे देश को आर्थिक और संरचनात्मक रूप से खोखला कर देती हैं। समाज के शिक्षक, वैज्ञानिक, लेखक और विचारक ही वह प्रकाश स्तंभ हैं जो किसी भी व्यवस्था को सही राह दिखाते हैं। जब इन्हें राजनीति की आक्रामकता का सामना करना पड़ता है, तो वे मौन हो जाते हैं। प्रबुद्ध वर्ग का यह मौन किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है।
वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की सबसे व्यावहारिक और तीखी आलोचना इसके चयन मानकों को लेकर होती है। आज प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के बीच कट-ऑफ अंकों का अंतर इतना बड़ा हो चुका है कि यह युवाओं के भीतर गहरे असंतोष और मानसिक अवसाद को जन्म दे रहा है।
एक तरफ वह युवा हैं जो विपरीत परिस्थितियों में दिन-रात संघर्ष करके ८०% या ९०% अंक प्राप्त करते हैं, फिर भी सामान्य वर्ग (सवर्ण) से होने के कारण वे रोजगार की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। दूसरी तरफ, आरक्षण के सुरक्षा कवच के कारण ४०% या ५०% अंक पाने वाले अभ्यर्थी चयनित होकर व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं।
असंतोष और सामाजिक कटुता: जब अत्यधिक प्रतिभावान युवा खुद को योग्य होते हुए भी अवसरों से वंचित पाते हैं, तो वे सड़कों पर संघर्ष करने, छोटी-मोटी नौकरियां करने या गलियों में घूमने को मजबूर होते हैं। यह स्थिति न केवल उन युवाओं के साथ अन्याय है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उनकी क्षमता का पूर्ण उपयोग न हो पाना देश की भी बड़ी क्षति है । जब देश के भीतर मेधा को उसका उचित सम्मान और स्थान नहीं मिलता, तो देश का सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक वर्ग विदेशों का रुख करता है। भारत के संसाधनों से पढ़कर तैयार हुए मेधावी युवा विदेशों के विकास में योगदान दे रहे हैं, क्योंकि हमारे यहाँ नीतियां योग्यता के बजाय जातिगत समीकरणों से अधिक प्रभावित हैं।
संवैधानिक प्रावधानों के तहत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) का निर्माण समाज के सबसे कमजोर तबके को सामाजिक उत्पीड़न, भेदभाव और हिंसा से बचाने के लिए एक ढाल के रूप में किया गया था। इस कानून की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ग्रामीण और कस्बाई भारत में आज भी जातिगत भेदभाव के अवशेष मौजूद हैं। परंतु, इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन और प्रशासनिक दुरुपयोग ने एक नई और गंभीर समस्या को जन्म दे दिया है।
फर्जी मुकदमों का बढ़ता चलन: देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी चिंताजनक रिपोर्ट और अदालती टिप्पणियां सामने आती रही हैं, जहाँ इस विशेष कानून का उपयोग आपसी रंजिश साधने, भूमि विवादों को सुलझाने या किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रताड़ित करने के लिए एक 'हथियार' के रूप में किया गया है। सवर्ण, पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग के कई निर्दोष लोगों को बिना किसी गहन प्रारंभिक जांच के फर्जी मुकदमों में फंसाए जाने के उदाहरण मौजूद हैं। कार्यस्थलों पर अनुशासनहीनता और प्रशासनिक भय: सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में यह समस्या अधिक जटिल रूप में उभरी है। यदि कोई सवर्ण या पिछड़ा वर्ग का प्रशासनिक अधिकारी या विद्यालय का प्रधानाचार्य किसी SC/ST कर्मी की कार्यहीनता, समय पर कार्यालय न आने या अनुशासनहीनता पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का प्रयास करता है, तो कई बार उस अधिकारी को SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दी जाती है। इस प्रशासनिक भय के कारण अधिकारी वर्ग मुक्त होकर निर्णय लेने से कतराने लगा है। कार्यस्थलों पर कामचोरी और अनुशासनहीनता को बढ़ावा मिलना किसी भी उत्पादक व्यवस्था के लिए आत्मघाती है।
यूजीसी एक्ट और नए कानूनी चाबुक की चिंता: हालिया कानूनी संशोधनों और नियामक दायरों (जैसे यूजी एक्ट आदि) के संदर्भ में प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि सवर्णों और सामान्य वर्ग के प्रबंधकों या शिक्षाविदों पर नियमों का चाबुक और तेज कर दिया गया है। जब नियम निष्पक्ष होने के बजाय एकतरफा दबाव बनाने वाले बन जाते हैं, तो संस्थागत स्वायत्तता और गुणवत्ता दम तोड़ने लगती है।।चतुर्दिक (चौतरफा) विकास का अर्थ केवल आर्थिक जीडीपी का बढ़ना नहीं है। इसके अंतर्गत आर्थिक सुदृढ़ता, शैक्षणिक उत्कृष्टता, सामाजिक समरसता और सुशासन का समावेश होता है। जब तक ये चारों स्तंभ मजबूत नहीं होंगे, देश का समग्र विकास एक दिवास्वप्न ही रहेगा।
वर्तमान 'लोकतंत्र बनाम आरक्षण तंत्र' के द्वंद्व में देश का सर्वांगीण विकास गंभीर रूप से बाधित हो रहा है:
शैक्षणिक ह्रास: जब विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों में प्रोफेसरों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का चयन योग्यता के बजाय पूरी तरह सामाजिक कोटे से तय होने लगता है, तो शोध और शिक्षा का स्तर वैश्विक मानकों से पिछड़ जाता है।। योग्यता की अनदेखी और सुरक्षात्मक कानूनों के दुरुपयोग के डर से प्रशासनिक तंत्र में 'अकर्मण्यता' की स्थिति पैदा होती है। अधिकारी कड़े और सुधारात्मक फैसले लेने से बचते हैं, जिससे नीतिगत पंगुता आती है। एक ऐसा समाज जहाँ का युवा वर्ग योग्यता के बावजूद सड़कों पर घूमने को मजबूर हो और दूसरा वर्ग केवल जातिगत पहचान के बल पर पदों को सुशोभित करे, वहाँ आंतरिक असंतोष और सामाजिक तनाव का फटना अपरिहार्य हो जाता है। आंतरिक संघर्षों से जूझता हुआ कोई भी देश वैश्विक मंच पर महाशक्ति नहीं बन सकता। लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुसंख्यकवाद या किसी एक वर्ग का तुष्टिकरण नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा और मेधा के सम्मान का नाम है। आज समय आ गया है कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—अपनी मूक भूमिका से बाहर आएं और इस 'आरक्षण तंत्र' के सुधारे जाने की दिशा में साहसिक कदम उठाएं। आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करना व्यावहारिक रूप से न तो संभव है और न ही सामाजिक यथार्थ के अनुकूल, परंतु इसमें अति-आवश्यक और युगांतकारी सुधारों का समय अवश्य आ गया है:: आरक्षण का पैमाना धीरे-धीरे जातिगत पहचान से हटाकर 'आर्थिक स्थिति' पर केंद्रित किया जाना चाहिए। सवर्ण वर्ग के गरीब युवाओं को भी अवसर मिलना चाहिए और आरक्षित वर्ग के संपन्न लोगों को स्वेच्छा से या वैधानिक रूप से इसका त्याग करना चाहिए। एस सी / एसटी एक्ट जैसे सुरक्षात्मक कानूनों में ऐसी व्यवस्था जोड़ी जाए जहाँ किसी भी शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी के बजाय एक निश्चित समय सीमा के भीतर किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा प्रारंभिक जांच अनिवार्य हो, ताकि निर्दोषों को फर्जी मुकदमों से बचाया जा सके और कार्यस्थलों पर अनुशासन बना रहे।: सरकार का मुख्य ध्यान केवल नौकरियों के अंत में आरक्षण देने के बजाय प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के स्तर पर ऐसी क्रांतिकारी व्यवस्था बनाने पर होना चाहिए, जहाँ देश के हर गरीब बच्चे को समान रूप से विश्वस्तरीय शिक्षा मिले। जब शुरुआत से ही अवसर समान होंगे, तो अंकों का यह भारी अंतर स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। लोकतंत्र की असली पहचान यह नहीं है कि वह कितनी बैसाखियां पैदा कर सकता है, बल्कि यह है कि वह कितनी प्रतिभाओं को अपने पैरों पर स्वतंत्र रूप से खड़ा होने का आकाश दे सकता है। बुद्धिजीवियों और योग्यता का सम्मान किए बिना कोई भी राष्ट्र महान नहीं बन सकता। जब राजनीति मेधा का आदर करना सीखेगी और नीतियां वोट बैंक के बजाय राष्ट्रहित में बनेंगी, तभी स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का समतामूलक, समृद्ध और चतुर्दिक विकसित भारत साकार हो सके।
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