क्या अब लोग घर में बंद रहें?
- बढ़ते टोल कर और सिकुड़ती नागरिक स्वतंत्रता पर एक समीक्षात्मक आलेख
लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र
हाल ही में प्रकाशित समाचार के अनुसार बिहार सरकार ने राज्य की कई सड़कों, बड़े पुलों और बाइपास मार्गों पर टोल कर लगाने का निर्णय लिया है। समाचार में बताया गया है कि वाहनों को प्रति किलोमीटर 1.25 रुपये से लेकर 8.10 रुपये तक शुल्क देना पड़ सकता है। सरकार का तर्क है कि इससे सड़कों के रखरखाव, विकास और नई परियोजनाओं के लिए संसाधन उपलब्ध होंगे। परंतु इस निर्णय ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या अब आम नागरिक के लिए अपने ही राज्य में यात्रा करना भी महंगा और कठिन होता जाएगा?
सड़कें सुविधा हैं या कमाई का साधन?
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सड़कें, पुल और सार्वजनिक अवसंरचनाएं नागरिकों को सुविधा प्रदान करने के लिए बनाई जाती हैं। इनका निर्माण जनता के करों से होता है। जब नागरिक पेट्रोल-डीजल पर कर देता है, वाहन पंजीकरण शुल्क देता है, रोड टैक्स देता है, बीमा और अन्य सरकारी शुल्क देता है, तब यह स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि उसे सड़कों पर चलने के लिए बार-बार अतिरिक्त भुगतान न करना पड़े।
यदि हर सड़क, हर पुल और हर बाइपास पर टोल लगाया जाएगा, तो नागरिक यह पूछने के लिए विवश होगा कि आखिर वह कर किस बात का दे रहा है?
गरीब और मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त बोझ
सरकार के इस निर्णय का सबसे अधिक प्रभाव मध्यम वर्ग, छोटे व्यापारियों, किसानों और दैनिक यात्रियों पर पड़ेगा। गांव से शहर सब्जी बेचने आने वाला किसान, नौकरी के लिए प्रतिदिन यात्रा करने वाला युवक, छोटे वाहन से माल ढुलाई करने वाला व्यापारी—सभी के खर्च में वृद्धि होगी।
परिणामस्वरूप परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ेगा। अंततः इसकी कीमत आम जनता को ही चुकानी होगी।
क्या विकास का यही मॉडल है?
सरकारें अक्सर विकास के नाम पर नए कर और शुल्क लगाती हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल राजस्व संग्रह नहीं है। विकास का अर्थ है जनता के जीवन को आसान बनाना।
यदि सड़क पर निकलने से पहले नागरिक को यह सोचना पड़े कि आज यात्रा का खर्च कितना बढ़ जाएगा, तो यह सुविधा नहीं बल्कि आर्थिक बाधा है। विकास का ऐसा मॉडल, जिसमें जनता की जेब पर लगातार बोझ बढ़ता जाए, दीर्घकाल में सामाजिक असंतोष को जन्म देता है।
आवागमन भी अधिकार है
संविधान नागरिकों को पूरे देश में स्वतंत्र रूप से आने-जाने का अधिकार देता है। यद्यपि टोल कर इस अधिकार का प्रत्यक्ष हनन नहीं है, लेकिन जब शुल्क अत्यधिक बढ़ने लगते हैं तो गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए यह अधिकार व्यवहारिक रूप से सीमित होने लगता है।
एक मजदूर, किसान या निम्न वेतनभोगी व्यक्ति के लिए हर यात्रा पर अतिरिक्त भुगतान करना आसान नहीं है। धीरे-धीरे वह अनावश्यक यात्राओं से बचने लगेगा। क्या यह स्थिति नागरिक स्वतंत्रता के अनुकूल कही जा सकती है?
सरकार को क्या करना चाहिए?
- सरकार को राजस्व बढ़ाने का अधिकार है, लेकिन इसके साथ जनहित का संतुलन भी आवश्यक है।
- स्थानीय निवासियों के लिए विशेष छूट की व्यवस्था हो।
- किसानों, छात्रों, एम्बुलेंस और आवश्यक सेवाओं को राहत मिले।
- टोल दरों के निर्धारण में जनसुनवाई की प्रक्रिया अपनाई जाए।
- पहले से वसूले जा रहे रोड टैक्स और नए टोल के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
- टोल से प्राप्त राशि के उपयोग का सार्वजनिक लेखा-जोखा जारी किया जाए।
- प्रश्न यह नहीं है कि सड़कों के रखरखाव के लिए धन कहां से आएगा। प्रश्न यह है कि क्या इसका पूरा बोझ केवल नागरिकों पर ही डाला जाना चाहिए? यदि हर सुविधा के उपयोग पर अलग-अलग शुल्क लगाया जाएगा, तो आम आदमी स्वयं को विकास का भागीदार नहीं, बल्कि उसका भुगतानकर्ता मात्र महसूस करेगा।
- आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार विकास और जनसुविधा के बीच संतुलन स्थापित करे। अन्यथा जनता के मन में यह प्रश्न बार-बार उठेगा
"क्या अब लोग घर में बंद रहें, क्योंकि बाहर निकलना दिन-ब-दिन महंगा होता जा रहा है?"
लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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