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ख़ुद्दारी

ख़ुद्दारी

डॉ. अंकेश कुमार
राह मुश्किल है अगर तो राह मुश्किल ही सही,
हम कभी बैठे नहीं तकदीर के ही आसरे।
ज़िन्दगी यह कुछ हमें करके दिखाने को मिली,
याद रक्खेगा ज़माना अब हुनर के आसरे।
देख लो फौलाद का रखता हूँ मैं अज़्म-ओ-जिगर,
तय करूँगा मंज़िलें इस हौसले के आसरे।
जानता है रुख हवा का मेरी नज़रों का मिज़ाज,
हिल रहा है पत्ता-पत्ता इस नज़र के आसरे।
थक के रुक जाना नहीं 'कुमार' भी फितरत मेरी,
चल रहे हैं रास्ते भी इस सफ़र के आसरे।

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