राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक रात एक अंधा भिखारी आया और बोला, महाराज, मुझे चार दीये चाहिए, एक मेरे लिए, तीन मेरे गुरुओं के लिए।
लेखक: आनन्द हठीला
चार दीये
उज्जैन की वह रात अमावस्या की थी। दरबार में दीप जल रहे थे। भिखारी की आँखें सफेद थीं, लाठी बाँस की, कपड़े फटे। मंत्री हँसा, राजा से दीया माँगता है।
विक्रम ने पूछा, तुम्हारे गुरु कौन हैं।
भिखारी बोला, पहला गुरु मेरा क्रोध, दूसरा मेरा लोभ, तीसरा मेरा भय। चौथा मैं स्वयं।
राजा ने चार मिट्टी के दीये मँगवाए, तेल भरवाया। भिखारी ने एक-एक कर जलाया। पहला दीया हवा से बुझ गया। दूसरा जलते-जलते तेल खत्म होने से बुझ गया। तीसरा जलता रहा पर उसकी लौ काँपती रही। चौथा स्थिर जला।
भिखारी ने कहा, अब समझे महाराज।
विक्रम बोला, नहीं।
भिखारी हँसा, तो कथा सुनो।
पहली कथा, क्रोध का दीया
मैं पहले मालवा का सेनापति था। नाम था भद्रसेन। एक बार युद्ध में मेरा छोटा भाई मारा गया। मैंने प्रतिज्ञा की, शत्रु का गाँव जलाऊँगा। आधी रात को मशाल लेकर निकला। रास्ते में एक बुढ़िया मिली, पानी माँग रही थी। मैंने लात मारी। वह गिरी, घड़ा टूटा।
गाँव पहुँचा, आग लगाई। सुबह देखा, वह मेरा ही गाँव था, शत्रु ने पहले ही कब्जा कर लिया था। मैंने अपने ही घर जलाए। बुढ़िया मेरी माँ थी। वह प्यास से मर गई।
उसी दिन मैंने आँखें फोड़ लीं, क्योंकि जिस आँख ने क्रोध में सच नहीं देखा, वह आँख किस काम की। क्रोध का दीया हवा से बुझता है, क्योंकि वह बाहर देखता है, भीतर नहीं।
दूसरी कथा, लोभ का दीया
अंधा होने के बाद मैं काशी गया। वहाँ एक सेठ ने मुझे नौकरी दी, मंदिर में दान गिनने की। मैं रोज सिक्के गिनता। धीरे-धीरे मन में आया, एक मुट्ठी ले लूँ, किसे पता चलेगा।
मैंने एक-एक सिक्का चुराना शुरू किया। एक साल में घड़ा भर गया। एक रात चोर आए, मंदिर लूटा। सेठ ने मुझे पकड़ा, सोचा मैंने बताया। मुझे कोड़े मारे। मेरा घड़ा भी लूट गया।
मैंने सेठ से कहा, मैंने चुराया था। सेठ बोला, मुझे पता था, पर तू अंधा है इसलिए छोड़ा। उसी दिन मैंने घड़ा गंगा में फेंक दिया।
लोभ का दीया तेल खत्म होने से बुझता है, क्योंकि वह भरता नहीं, खाली करता है।
तीसरी कथा, भय का दीया
मैं भीख माँगने लगा। एक बार जंगल में डाकुओं ने घेरा। मैं डर गया, बोला मेरे पास कुछ नहीं। सरदार ने कहा, तू अंधा है, तुझे छोड़ते हैं।
मैं भागा। पीछे से आवाज आई, रुक। मैं और डरा। वह सरदार था। उसने मेरी लाठी पकड़ी, बोला, डर मत, मैं तुझे गाँव तक छोड़ दूँगा।
रास्ते में उसने बताया, वह भी पहले सिपाही था, डर के कारण भागा था। अब डाकू है। मैंने पूछा, डर गया तो। उसने कहा, डर से भागोगे तो डर बड़ा होगा, डर के साथ चलोगे तो डर छोटा होगा।
उसने मुझे गाँव छोड़ा। अगली सुबह वह पकड़ा गया। फाँसी से पहले उसने मुझे संदेश भेजा, भद्रसेन, डर का दीया काँपता है, पर बुझता नहीं, जब तक तुम उसे पकड़े रहो।
चौथा दीया, स्वयं
भिखारी चुप हो गया। चौथा दीया अब भी जल रहा था। विक्रम ने पूछा, यह कौन है।
भिखारी बोला, यह मैं हूँ। जब क्रोध बुझ गया, लोभ खाली हो गया, भय काँपना सीख गया, तब मैं बचा। मैं अंधा हूँ, पर अब देखता हूँ। मैं भिखारी हूँ, पर अब माँगता नहीं।
मैं हर अमावस्या को राजा के पास आता हूँ, चार दीये माँगता हूँ, ताकि याद रहे, मन में चार ही आग जलती हैं। तीन बुझ जाती हैं, एक को तुम्हें जलाए रखना है।
विक्रम ने सिंहासन से उतरकर भिखारी के पैर छुए। बोला, गुरु, मुझे भी एक दीया दो।
भिखारी ने चौथा दीया राजा के हाथ में रखा। कहा, इसे महल में मत रखना, इसे हृदय में रखना। जब प्रजा दुखी हो, तो इसकी लौ से देखना। जब क्रोध आए, इसे आड़ देना। जब लोभ आए, इसमें तेल डालना। जब भय आए, इसे थामना।
उज्जैन में आज भी
कहते हैं उस रात के बाद विक्रमादित्य ने अपने महल में चार दीये जलाने की परम्परा शुरू की। अमावस्या को वह स्वयं अंधे भिखारी के वेश में नगर में निकलता, देखता कौन सा दीया बुझा है।
लोग आज भी उज्जैन में कार्तिक अमावस्या को चार मिट्टी के दीये जलाते हैं। तीन दरवाजे के बाहर, एक भीतर।
बाहर वाले क्रोध, लोभ, भय को याद दिलाते हैं, भीतर वाला स्वयं को।
क्योंकि कहानी खत्म नहीं हुई। भद्रसेन मर गया, पर हर मनुष्य के भीतर वही चार दीये हर रात जलते-बुझते हैं।
तुम्हें केवल यह चुनना है, तुम किसे हवा दोगे, किसे तेल, किसे थामोगे, और किसे जिंदा रखोगे।
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