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लोकतंत्र में जनता मालिक या केवल दर्शक?

लोकतंत्र में जनता मालिक या केवल दर्शक?

  • छोटे विपक्ष को तोड़कर सत्ता मजबूत करना लोकतंत्र नहीं:- अजय वर्मा
लेखक: अजय वर्मा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जन क्रांति दल (डेमोक्रेटिक)

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। संविधान की प्रस्तावना से लेकर चुनावी मंचों तक हमें यह बताया जाता है कि "जनता ही लोकतंत्र की असली मालिक है।" लेकिन आज देश की राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या जनता वास्तव में मालिक है या फिर केवल पांच वर्ष में एक बार वोट डालने वाली दर्शक मात्र बनकर रह गई है?

लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और वे प्रतिनिधि जनता की इच्छा के अनुसार शासन चलाते हैं। यदि जनता किसी दल को विपक्ष में बैठाती है तो उसका भी उतना ही सम्मान होना चाहिए जितना सत्ता पक्ष का। विपक्ष लोकतंत्र का शत्रु नहीं बल्कि उसका आवश्यक स्तंभ होता है। लेकिन दुर्भाग्य से आज भारतीय राजनीति में विपक्ष को कमजोर करने, उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों को तोड़ने और जनादेश को पलटने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

महाराष्ट्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां जनता ने एक राजनीतिक दल को जिस विचारधारा और नेतृत्व के साथ वोट दिया था, बाद में उसी दल के सांसदों और विधायकों को तोड़कर सत्ता का नया गणित खड़ा कर दिया गया। जनता ने जिस प्रतीक, जिस विचार और जिस नेतृत्व को वोट दिया था, वह जनादेश राजनीतिक जोड़-तोड़ की भेंट चढ़ गया। प्रश्न यह है कि यदि चुने हुए प्रतिनिधि चुनाव के बाद ही अपना पक्ष बदल दें, तो जनता के वोट का मूल्य क्या रह जाता है?

बंगाल में भी इसी प्रकार की राजनीति देखने को मिली, जहां विपक्षी दलों के नेताओं और सांसदों को विभिन्न माध्यमों से अपने पक्ष में लाने का प्रयास हुआ। कभी नई पार्टी का मंच तैयार किया जाता है, कभी किसी संगठन का सहारा लिया जाता है और अंततः राजनीतिक लाभ सत्ता पक्ष को प्राप्त होता है। यह प्रक्रिया भले ही कानूनी तकनीकीताओं के दायरे में फिट बैठा दी जाए, लेकिन नैतिक दृष्टि से यह लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच विचारों की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए, नेताओं की खरीद-फरोख्त नहीं। जनता यदि किसी दल को विपक्ष में बैठाती है तो उसका अर्थ यह है कि वह सत्ता पर निगरानी रखने का दायित्व उस दल को सौंप रही है। लेकिन जब विपक्ष के चुने हुए प्रतिनिधियों को तोड़कर सत्ता पक्ष अपनी संख्या बढ़ाता है, तब वास्तव में जनता के निर्णय का अपमान होता है।

आज स्थिति यह बनती जा रही है कि छोटे और क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है। बड़ी पार्टियां संसाधनों, सत्ता और प्रभाव का उपयोग करके छोटे दलों को समाप्त करने की दिशा में काम कर रही हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को बहुदलीय व्यवस्था से एक प्रकार के राजनीतिक एकाधिकार की ओर ले जा सकती है। जब विपक्ष कमजोर होगा तो सरकार की जवाबदेही भी कमजोर होगी।

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है जनता की इच्छा का सम्मान, विपक्ष का सम्मान, असहमति का सम्मान और जनादेश की रक्षा। यदि चुने हुए प्रतिनिधि जनता की सहमति के बिना बार-बार दल बदलते हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाता है।

आज आवश्यकता है कि दल-बदल विरोधी कानून को और अधिक कठोर बनाया जाए। जो जनप्रतिनिधि जनता के वोट से जीतकर बाद में दल बदलते हैं, उन्हें तत्काल अपने पद से इस्तीफा देकर पुनः जनता के बीच जाना चाहिए। यदि जनता उनके निर्णय का समर्थन करती है तो उन्हें फिर से चुन लेगी। यही लोकतांत्रिक नैतिकता का तकाजा है।

देश की जनता को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है। जनादेश की रक्षा के लिए जनता को सजग रहना होगा और उन राजनीतिक प्रवृत्तियों का विरोध करना होगा जो जनता के वोट को केवल सत्ता प्राप्ति का साधन मानती हैं।

भारतीय जन क्रांति दल (डेमोक्रेटिक) का स्पष्ट मत है कि छोटे-छोटे विपक्षी दलों को तोड़कर सत्ता पक्ष की मजबूती लोकतंत्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण है। लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब जनता के फैसले का सम्मान होगा, न कि राजनीतिक जोड़-तोड़ के माध्यम से जनादेश को बदला जाएगा।

लेखक अजय वर्मा भारतीय जन क्रांति दल (डेमोक्रेटिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राजनैतिक चिंतक है |

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