पितृ छाया से वंचित हुई आज दुनिया मेरी
कुमार महेंद्रहृदय विदीर्ण है,
नयनों में अविरल अश्रुधार है।
तात! तुम्हारे बिना बिखर गया,
मेरा यह समूचा संसार है।
काल की निष्ठुर वेला ने,
बिखेर दी स्वप्नों की माला सुनहरी।
पितृ छाया से वंचित हुई आज दुनिया मेरी।।
वो संबल का अटल हिमालय,
वो वात्सल्य का महासागर।
जिनके शुभ आशीषों से,
भरते थे सुख के गागर।
स्वयं तपे जेठ की दुपहरी में,
मुझ पर बरसाई शीतल छाँव घनेरी।
पितृ छाया से वंचित हुई आज दुनिया मेरी।।
लुप्त हुआ वह तेजस्वी मुकुट,
वो गौरव का अमिट शिखर गया।
रूठा जैसे भाग्य स्वयं,
मेरा जीवन-आधार गया।
सूने आँगन, सूने सपने,
गूँजे स्मृतियों की मधुर लहरी।
पितृ छाया से वंचित हुई आज दुनिया मेरी।।
शेष बचीं हैं स्मृतियाँ केवल,
और विरक्त हुई यह काया है।
जो धर्म-पथ तुमने दिखलाया,
वही अब जीवन का सहारा है।
हर श्वास में, हर धड़कन में,
बसती रहेगी छवि पूज्य तेरी।
पितृ छाया से वंचित हुई आज दुनिया मेरी।।
जब तक प्राण रहेंगे तन में,
ऋणी रहूँगा तेरे उपकारों का।
तेरे आदर्शों की ज्योति जलाकर,
रक्षक बनूँगा उन संस्कारों का।
ईश्वर चरणों में शांति मिले,
यही रहे विनती मेरी।
पितृ छाया से वंचित हुई आज दुनिया मेरी।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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