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साहित्यिक समागम: में'आत्म बोध से विश्व बोध' पर हुआ मंथन

साहित्यिक समागम: में'आत्म बोध से विश्व बोध' पर हुआ मंथन

पटना । राजधानी के बिहटा स्थित पैनाल में अखिल भारतीय साहित्य परिषद का एक दिवसीय बिहार प्रांतीय संगोष्ठी एवं अधिवेशन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। 27 जून को अन्नपूर्णा सभागार में आयोजित इस भव्य समारोह में बिहार के कोने-कोने से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कवियों और विचारकों का जुटान हुआ, जिससे पूरा परिसर साहित्यिक चेतना और ऊर्जा से सराबोर नजर आया । अधिवेशन का विधिवत उद्घाटन मुख्य अतिथि और स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्ष सह परिषद की विशिष्ट सदस्य, वरिष्ठ कवियत्री डॉ. ऊषा किरण श्रीवास्तव ने दीप प्रज्वलित कर किया। अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने साहित्य और समाज के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला और कहा कि साहित्य ही समाज को सही दिशा देने का सबसे सशक्त माध्यम है। परिषद द्वारा इस अवसर पर सामाजिक और पर्यावरण चेतना का एक अनूठा संदेश दिया गया। पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन की मुहिम को बढ़ावा देते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक को अंग वस्त्र और एक औषधीय पौधा (वृक्ष) भेंट कर विशेष रूप से सम्मानित किया गया। इस अनूठी पहल की उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। इस एक दिवसीय अधिवेशन का एक मुख्य आकर्षण साहित्यिक कृतियों का लोकार्पण रहा, जिसने बिहार की समृद्ध लेखन परंपरा को एक बार फिर रेखांकित किया:।साहित्य सृजन: अखिल भारतीय साहित्य परिषद सहरसा की ओर से अवधेश कुमार झा 'अवध' द्वारा संपादित इस विशिष्ट कृति का विमोचन हुआ। संवदिया (त्रैमासिकी पत्रिका): अररिया से प्रकाशित होने वाली 'मार्कण्ड' के प्रधान संपादक की इस त्रैमासिक पत्रिका के नवीन अंक का लोकार्पण किया गया।।रोटी है पूनम जैसी: 'मार्तंड' की बहुप्रतीक्षित पुस्तक 'नवनीत संग्रह' का भी अतिथियों द्वारा विमोचन हुआ।।अधिवेशन के मुख्य वैचारिक सत्र में 'आत्म बोध से विश्व बोध' विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। इस विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए इतिहासकार व साहित्यकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने कहा: "जब तक मनुष्य के भीतर आत्मीय चिंतन जाग्रत नहीं होगा, तब तक वह वैश्विक स्तर पर नहीं सोच सकता। 'वसुधैव कुटुंबकम्' की प्राचीन भारतीय अवधारणा ही आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विश्व में करुणा, त्याग और सहिष्णुता की भावना लाकर ही हम आत्म बोध से विश्व बोध के मार्ग को प्रशस्त कर सकते हैं।"।इस गंभीर और विचारोत्तेजक विषय पर परिषद के बिहार प्रांतीय अध्यक्ष रविन्द्र शहाबादी और महामंत्री जनार्दन यादव ने भी अपने विचार रखे। वहीं, पटना विश्वविद्यालय के पूर्व दर्शन विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. सुधा सिन्हा, पूर्णिया जिला सचिव सुरेन्द्र कुमार सुमन और डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव ने भी व्याख्यान देते हुए दर्शन और साहित्य के समन्वय से वैश्विक कल्याण का मार्ग बताया। समारोह के अंत में आए हुए सभी अतिथियों, कवियों और रचनाकारों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया गया। यह अधिवेशन बिहार के साहित्यिक परिदृश्य में वैचारिक विमर्श और नई रचनाशीलता को बढ़ावा देने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
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