आँख और पेटकी बीमारी
लेखक: आनन्द हठीला
सभी मनुष्यों में दो तरह की बीमारी है-आँख की बीमारी और पेट की बीमारी।
आँख की बीमारी क्या है ?-
इस दुनिया में एक अँधेरा, सबकी आँख में जो छाया।
जिसके कारण सूझ पड़े नहीं, कौन हूँ मैं कहाँ से आया।
कौन दिशा को जाना मुझको, किसको देख मैं ललचाया।
कौन है मालिक इस दुनियाका, किसने रची है यह माया।
और पेट की बीमारी क्या है?-
इस दुनिया में एक कूप है, जिसका पार कोई नहीं पावै।
जिसको भरने कारण प्राणी, देश दिगन्तर को जावै।
दीन भये पर घर में जाकर, सेवा कर कर मर जावै।
भजन ध्यान चिन्तन ईश्वरका, जिसके कारण बिसरावै ।
इस विषय में एक कहानी है। एक वैद्य थे उनके पास एक रोगी पहुँचा। उसने वैद्य से कहा कि मेरी आँख में बड़ी पीड़ा हो रही है और पेट में भी पीड़ा हो रही है। वैद्य ने उसको लिटाकर उसका पेट देखा और आँख देखी । इतने में एक दूसरा रोगी आया। उसने भी कहा कि मेरी आँख में और पेट में बड़ी पीड़ा हो रही है। वैद्य ने विचार किया कि यह कैसी हवा चली है, सबको एक ही बीमारी! वैद्यने दोनों रोगियों के लिये अलग- अलग दवा लिख दी और कहा कि कम्पाउण्डर से दवा ले लो।
कम्पाउण्डर ने दोनों को दवा की दो-दो पुड़िया बनाकर दे दीं, एक आँख के लिये और एक पेट के लिये। वैद्य ने समझा दिया कि देखो, यह आँख में डालने की पुडिया है। इसको रात में सोते समय आँख में डालना और बार-बार पलक झपकाना, जिससे आंख से गरम-गरम पानी निकल जायगा। फिर सो जाना । इससे आँख ठीक हो जायगी। यह दूसरी पुड़िया पेटके लिये है । इसको एक पाव जल में डालकर आग पर रख देना। जब जल एक छटाक रह जाय, तब वह काढ़ा छानकर पी लेना। इससे पेट ठीक हो जायगा और दस्त लगने से आँख में भी लाभ होगा।
दोनों रोगी दवा लेकर चले गये। घर जाकर एक रोगी ने तो ठीक वैसा ही किया, जैसा वैद्यने कहा था। आँख की दवा आँख में डाल दी और पेट की दवा पेट में। परन्तु दूसरे रोगी ने पुड़िया उलट दी! उसने पेट की दवा आँख में डाल दी और आँख की दवा पेट में डाल दी। आँख में थोड़ा-सा कचरा भी पड़ जाय तो पीड़ा होने लगती है, पर उसने पेट का चूर्ण आँख में डाल दिया! इससे आँख की पीड़ा बढ़ गयी! आँख की दवा ठण्डी होती है, वह पेट में चली गयी तो पेट की पीड़ा भी बढ़ गयी! अब वह वैद्य को गाली देने लगा कि तेरे बाप को मैंने मारा था क्या? वह तो अपनी मौत मरा था। फिर मेरे से किस दिन का बदला लिया है ! दूसरे दिन वह दवाखाना खुलने से पहले ही वहाँ जा बैठा । वैद्यजी आये और दवाखाना खोलकर उससे पूछा-कहो, कैसे हो ?
वह बोला-कैसे क्या हूँ! वैद्य ने कहा-अरे, क्या हुआ? वह बोला-हुआ क्या, जो तुमने किया, वही हुआ! वैद्य ने कहा-हमने क्या किया ? वह बोला-ऐसी दवा दे दी कि मेरी आँख की पीड़ा भी बढ़ गयी और पेट की पीड़ा भी बढ़ गयी! साफ कह देते कि मैं दवा नहीं देता! मेरे पास ज्यादा रुपया तो है नहीं, इसलिये उलटी दवा दे दी।
वैद्यने कहा- भाई, पीड़ा कैसे बढ़ गयी ? किसी आदमी को दवा जल्दी असर करती है, किसी को नहीं करती, यह तो अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार होता है, पर पीड़ा बढ़ने का तो कोई कारण ही नहीं है !
वह बोला-मैं तो भुक्तभोगी हूँ, मेरी पीड़ा तो बढ़ गयी! इतने में दूसरा रोगी आया। वैद्य ने उससे पूछा-कहो, तुम कैसे हो? वह बोला-महाराज, बहुत आराम है। एक-दो
दस्त लगे, पेट भी ठीक है और आँखें भी ठीक हैं। यह सुनते ही पहला रोगी बोला-देखो, यह पैसे वाला आदमी
है, इसको तो बढ़िया दवा दे दी, मेरे को घटिया दे दी! वैद्य ने कहा-घटिया कैसे दे दी? जो दवा उसको दी, वही तुमको भी दी। तुम्हारी पुड़िया कैसी थी? रोगी ने जेब से चूर्ण की पुड़िया निकालकर वैद्य के सामने पटक दी और बोला -यह है वह पुड़िया। वैद्यने कहा-दूसरी पुड़िया? वह बोला - दूसरी तो मैं काढ़ा बनाकर पी गया! यह पुड़िया आँख में डाली थी, दवा ज्यादा थी, इसलिये बच गयी । वैद्य ने कहा कि
इसको निकालो यहाँ से ! उलटी दवा तो यह खुद लेता है और कहता है कि तुमने मेरी पीड़ा बढ़ा दी!
इसी तरह हम सब लोग रोगी हैं। हमारी आँख की बीमारी क्या है? वास्तविक बात सूझती नहीं है। खुद तो जानते नहीं, दूसरे की मानते नहीं। जो अधूरा जानते हैं, उसी को पूरा मान लेते हैं कि बस, यही ठीक है। पेट की बीमारी क्या है? पेट कभी भरता ही नहीं! दरिद्र का भी पेट नहीं भरता और लखपति-करोड़पति का भी पेट नहीं भरता। कितना ही मिल जाय तो भी
कहते हैं कि क्या करें, काम नहीं चलता। इन दोनों रोगोंके लिये भगवान् ने हमें दो पुड़िया दी हैं-प्रारब्ध और पुरुषार्थ। आँख की बीमारीके लिये 'पुरुषार्थ' है और पेट की बीमारी के लिये 'प्रारब्ध' है। पुरुषार्थ करेंगे, तो आँख का रोग दूर होगा और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए प्रारब्ध पर विश्वास करेंगे कि जो हमारे भाग्य में लिखा
है, वही मिलेगा तो पेट का रोग दूर होगा।
प्रारब्ध शोक-चिन्ता मिटाने के लिये है,आलसी-अकर्मण्य बनाने के लिये नहीं। जैसे, बेटा बीमार हो तो अपनी सामर्थ्य केअनुसार उसका भली भाँति इलाज करते-करते अगर वह मर जाय तो मन में इस बातको लेकर चिन्ता, शोक, दुःख नहीं होगा कि हमने अपनी तरफ से उसके इलाज में कमी रखी । बेटा तो प्रारब्ध के अनुसार ही मरेगा, पर अपने पुरुषार्थ में कमी होगी तो चिन्ता, शोक, दुःख होगा कि हमने अपने कर्तव्य का ठीक पालन नहीं किया! इसलिये जो करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहते हैं, उनकी आँख का रोग भी ठीक हो जाता है और पेट का रोग भी। परन्तु जो पुड़िया उलट देते हैं अर्थात आँख के रोग के लिये प्रारब्ध और पेट के रोग के लिये पुरुषार्थ लगा देते हैं, उनके ये दोनों ही रोग बढ़ जाते हैं । ऐसे लोगों से सत्संग-स्वाध्याय, भजन-ध्यान करने के लिये कहा जाय तो वे कहते हैं कि कैसेकरें महाराज! हमारे तो भाग्य में ही नहीं है। प्रारब्ध से मिलने वाले धन के लिये रात-दिन पुरुषार्थ में लगे रहते हैं । सारा पुरुषार्थ पेट के लिये लगा देते हैं और आँख के लिये कुछ करते ही नहीं।
भगवान् का नाम लेने के लिये कहो तो कहते हैं कि नाम कैसे लें, मुख में सौ मन का ताला लगा है! नाम लेना हमारे भाग्य में लिखा ही नहीं है! भगवान की ऐसी ही मरजी है, हम क्या करें? हमारा क्या दोष है?
अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति का प्राप्त होना 'प्रारब्ध' के अधीन है और प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करना 'पुरुषार्थ 'केअधीन है। इसलिये कर्तव्य-पालन, सत्संग-स्वाध्याय, भजन- ध्यान आदि करने में तो मनुष्य स्वतन्त्र है, पर धन कमाने मेंस्वतन्त्र नहीं है। मनुष्य यह नियम तो ले सकता है कि मैं रोजाना इतनी माला जप करूँगा, इतना स्वाध्याय करूँगा, पर यह नियम नहीं ले सकता कि मैं रोजाना इतने रुपये कमाऊँगा । कारण कि भजन-ध्यान आदि करना पुरुषार्थ के अधीन है और रुपये कमाना प्रारब्ध के अधीन है । परन्तु जहाँ पुरुषार्थ लगाना चाहिये, वहाँ प्रारब्ध लगा दिया और जहाँ प्रारब्ध लगाना चाहिये, वहाँ पुरुषार्थ लगा दिया। इससे दोनों बीमारियाँ बढ़ गयीं पेट की बीमारी
बढ़ने से जीवन-निर्वाह का खर्चा बहुत बढ़ गया । पढ़ाई-लिखाई में, खान-पान में, स्वाद-शौकीनी में, रहन-सहन में खर्चा बढ़ गया और कहते हैं कि स्टैण्डर्ड ऊँचा होना चाहिये! सारा पुरुषार्थ स्टैण्डर्ड ऊँचा करने में, पेट भरने में लगा दिया और आँख से कुछ दीखता ही नहीं है कि भगवान् क्या हैं? संसार क्या है ? मैं कौन हूँ? मेरे को क्या करना है? रात-दिन 'हाय पैसा! हाय पैसा!' करते हैं। अगर 'हाय भगवन्! हाय भगवन् !' करें तो निहाल हो जायँ! जिस लगन से धन कमाते हैं, उस लगन से साधन करें तो कल्याण हो जाय! परन्तु साधन की यह दशा है कि नित्य नियम पूरा हुआ तो सोचते हैं कि आज की आफत तो मिटी! माला पूरी हुई तो मानो जेल से छूट गये! दूकान में रोज सौ रुपये कमाते हैं और वेसौ रुपये अगर सुबह ही पैदा हो जायँ तो भी दूकान दिनभर खोलकर बैठे रहेंगे। पर जप पूरा हो जाय तो माला लपेटकर रखदेंगे! यह क्या है? यह उलटी पुड़िया ले ली। इसलिये जो मिला है, उसमें सन्तोष करें; जो नहीं मिला है, उसकी कामना न करें;
अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करें, दूसरों की सेवा करें और भगवान् का भजन-स्मरण, सत्संग-स्वाध्याय करें तो आँख की पीड़ा भी ठीक हो जायगी और पेटकी पीड़ा भी।
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