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राष्ट्रपति और राज्यपाल पद अब प्रासंगिक नहीं ,मात्र चालीस व्यक्तियों की सुख सुविधा के लिए प्रतिवर्ष जनता का एक हजार करोड़ अनुपयोगी खर्च-रमेश कुमार चौबे

राष्ट्रपति और राज्यपाल पद अब प्रासंगिक नहीं ,मात्र चालीस व्यक्तियों की सुख सुविधा के लिए प्रतिवर्ष जनता का एक हजार करोड़ अनुपयोगी खर्च-रमेश कुमार चौबे

आदरणीय देशवासियों,
आप सभी देशवासियों को रमेश कुमार चौबे अपने दिल की गहराइयों से सादर प्रणाम करता है I
महानुभाओं, आप लोकतंत्र के असली मालिक हैं लेकिन दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति यह है कि लोकतंत्र का असली वास्तविक मालिक एक नौकर से भी बदत्तर स्थिति में जीने को मजबूर है I तथाकथित देश में लोकतंत्र है परंतु वास्तविकता यह है कि लोकतांत्रिक प्रणाली को संचालित करने वाले तीनों संवैधानिक अंग प्रथम विधायिका द्वितीय न्यायपालिका एवं तृतीय कार्यपालिका लोकतंत्र को व्यवस्थित तरीके से संवैधानिक मर्यादा और नैतिकता के अनुकूल चलाने की बजाय तीनों सिस्टम आपस में चोर चोर मौसेरे भाई की भूमिका में आ गए हैं I लोकतंत्र का असली मालिक इन तीनों सिस्टम के लोकसेवकों का गुलाम बल्कि एक तरह का बंधुआ मजददूर की भूमिका में याचक बन अपने अधिकार के लिए गिड़गिड़ा रहा है I
महानुभाओं,लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की प्रासंगिकता और उन पर होने वाले अनुपयोगी खर्च पर जनता के बीच अक्सर बहस होती है I यह बहस अब पूरी तरह से गंभीरतापूर्वक पत्रकारिता के विभिन्न माध्यमों सार्वजानिक रूप से करने की अति आवश्यकता है I आज जनता के लिए शोसल मिडिया सहज एवं सर्वसुलभ है जिसे जनता को इसे अपने लोकतंत्र में सिस्टम के भ्रष्टाचार ,अत्याचार और अनाचार के विरुद्ध कारगर हथियार के रूप में प्रयोग करने की जरुरत है I यह इसलिए भी कि पहले की पत्रकारिता भ्रष्टाचार मुक्त पूर्णतया पारदर्शी और निष्पक्ष थी लेकिन अब पत्रकारिता पूर्णतया चाटुकारिता हो गया है इसलिए लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ की गरिमा भी पूर्णतया शर्मसार हुआ है I
राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की प्रासंगिकता के पक्ष और विपक्ष में निम्नलिखित प्रमुख तर्क दिए जाते रहे हैं :-
पद के समर्थन में जो अपना तर्क यानि पक्ष रखते हैं :-
1.संवैधानिक संरक्षक:- राष्ट्रपति और राज्यपाल कार्यपालिका की शक्तियों के दुरुपयोग को रोकते हैं I वे यह सुनिश्चित करते हैं कि सरकार संविधान के दायरे में रहकर काम करे I
2.संकटकालीन शक्तियाँ:- त्रिशंकु विधानसभा या संसद की स्थिति में, सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने या आपातकाल जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में ये पद निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं I
3.संसदीय प्रक्रिया का अभिन्न अंग:- किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल की स्वीकृति अनिवार्य होती है, जो जल्दबाजी में पारित कानूनों पर रोक लगाती है I


उपर्युक्त तीनों तर्कों के प्रतिपक्ष में आलोचनात्मक तथ्यों को गंभीरता पूर्वक गहराई से समझने की जरुरत है I
लोकतंत्र में आज राष्ट्रपति और राज्यपाल का पद बिलकुल हीं रबर स्टाम्प और कठपुतली की तरह हो चूका है I मेरा भी मानना है केंद्र की सत्ताधारी पार्टियां चाहे जिस पार्टी या गठबंधन की सरकार हो राष्ट्रपति और राज्यपाल को रबर स्टाम्प और कठपुतली की तरह इस्तेमाल करते हैं और इन पदों पर विराजमान प्रधानमंत्री का विश्वास पात्र आज्ञाकारी सेवक की भूमिका में रहता है I भले संवैधानिक तौर पर किसी को दिखता नहीं है लेकिन आम जनमानस स्पष्ट रूप से आज देख रहा है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में आज राष्ट्रपति और राज्यपाल का पद बिलकुल हीं रबर स्टाम्प और कठपुतली की तरह हो चूका है I क्या आज श्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में इनके इच्छा के विपरीत कोई राष्ट्रपति और राज्यपाल अपना मुंह खोल सकता है ? जो खोलता है उसका अंजाम आम जनमानस को मालूम है l पूर्व उप राष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ और सतपाल मलिक जैसा हो जाता है I
यहाँ तक कि राज्यों की सत्ताधारी पार्टियां अक्सर इन पदों पर अपने वफादार नेताओं को नियुक्त करवाना चाहती है ,जिससे इनकी निष्पक्षता प्रभावित होती है I अगर किसी राज्य में केंद्र सरकार की सत्ताधारी पार्टी की सरकार नहीं है तो वहां वैसे को केंद्र की सरकार राज्यपाल बनाती है जो केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का विचारधारा का हार्ड कोर कट्टर व्यक्ति हो प्रधानमंत्री का अति विश्वासभाजक हो I
मेरा भी मानना है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल का पद भारत जैसे मुल्क पर गंभीर अनुपयोगी वित्तीय बोझ है I इन पदों पर नियुक्त व्यक्तियों के वेतन, भत्ते, आलीशान आवास (राजभवन/राष्ट्रपति भवन) और अन्य सुविधाओं पर जनता के टैक्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च होता है I लोकतंत्र में जनता मालिक है लेकिन ये पद धारक केंद्र सरकार के सत्ताधारी दल के प्रधानमंत्री के अति विश्वासभाजन सेवक की भूमिका में रहते हैं I यदि भूल से इस पद धारकों के मन में संवैधानिक अधिकार रूपी इगो की भावना प्रफुलित होता है तो केंद्र के सताधारी पार्टी के प्रधानमंत्री द्वारा बेरहमी से कुचल दिया जाता है I जिसके सर्वोत्तम उदहारण पूर्व उप राष्ट्रपति श्री श्री जगदीप धनखड़ और सतपाल मलिक हैं I
मेरा स्पष्ट मानना है इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर डिबेट हो I लोकतंत्र की असली मालिक जनता है जनता के बीच पूरी पारदर्शिता के साथ सब कुछ रखा जाय और इसपर जनमत संग्रह कर लिया जाय I क्या आम जनता यह नहीं जानना चाहती है कि भारत के राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति और राज्यों राज्यपाल तथा लेफ्टिनेंट जनरल के रूप में नियुक्त व्यक्तियों के वेतन, भत्ते, आलीशान आवास (राजभवन/राष्ट्रपति भवन) और अन्य सुविधाओं पर जनता के टैक्स का वार्षिक बजट कितना निरर्थक खर्च होता है जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है I मुझे लगता है कि केंद्र सरकार को सार्वजानिक करना चाहिए कि भारत के राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति और राज्यों राज्यपाल तथा लेफ्टिनेंट जनरल के रूप में नियुक्त व्यक्तियों के वेतन, भत्ते, आलीशान आवास पर कुल कितना वार्षिक खर्च आता है I इसके साथ हीं साथ इनके सभी स्टाफ एवं इनके कार्यालयों तथा इनके मूवमेंट पर जनता के टैक्स का कितना पैसा खर्च होता है I मुझे लगता है देश का लगभग हजार करोड़ से ज्यादा वार्षिक खर्च इन पद धारकों पर होता है जो अनुपयोगी है I अगर यह पैसा आम जनता पर खर्च हो तो उद्योग स्थापित करके प्रति वर्ष इतने पैसे में एक लाख लोगों को रोजगार दिया जा सकता है I केंद्र सरकार के महज चालीस विश्वासभाजक पर आम आदमी के टैक्स का एक हजार निरर्थक अनुपयोगी खर्च आख़िरकार क्यों हो रहा है ?


लेखक रमेश कुमार चौबे , नागरिक अधिकार मंच के महासचिव है |
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