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कश्मीरी पंडित: राजनीति का विषय या राष्ट्र का अधूरा न्याय?

कश्मीरी पंडित: राजनीति का विषय या राष्ट्र का अधूरा न्याय?

  • धारा 370 समाप्त होने के बाद भी कश्मीरी पंडित अपने घर क्यों नहीं लौट सके?

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर चर्चा होते ही भावनाएं उफान पर आ जाती हैं और तर्क पीछे छूट जाते हैं। कश्मीर और कश्मीरी पंडितों का मुद्दा ऐसा ही एक विषय है। पिछले तीन दशकों से कश्मीरी पंडितों की पीड़ा, उनका विस्थापन, उनकी असुरक्षा और उनके पुनर्वास का प्रश्न देश की राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा रहा है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि जिस विषय पर सबसे अधिक भाषण दिए गए, जिस विषय पर सबसे अधिक राजनीतिक लाभ उठाया गया, उसी विषय का समाधान आज तक नहीं हो सका।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भावनाओं, नारों और राजनीतिक प्रचार से ऊपर उठकर इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए कि आखिर कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ क्या था, उनकी त्रासदी के लिए कौन-कौन जिम्मेदार थे, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि धारा 370 समाप्त होने के लगभग सात वर्ष बाद भी वे अपने पैतृक घरों में सम्मानपूर्वक क्यों नहीं लौट पाए?

कश्मीर: केवल भूगोल नहीं, एक सभ्यता


कश्मीर केवल एक भूभाग नहीं है। यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है। शारदा पीठ की परंपरा, अभिनवगुप्त का दर्शन, कल्हण की राजतरंगिणी, संस्कृत विद्या और सनातन संस्कृति की अनेक धाराएं कश्मीर से निकली हैं। कश्मीरी पंडित इस सांस्कृतिक विरासत के प्रमुख संवाहक रहे हैं।

जिस भूमि ने भारत को दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन दिया, उसी भूमि से एक संपूर्ण समुदाय का पलायन हो जाना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्र-राज्य की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक है।

विडंबना यह है कि इस त्रासदी को समझने के बजाय इसे राजनीतिक हथियार बना दिया गया।

इतिहास का सबसे बड़ा मिथक


पिछले कई वर्षों से देश में एक धारणा स्थापित की गई कि कश्मीरी पंडितों का पलायन कांग्रेस की वजह से हुआ था। अनेक राजनीतिक मंचों से यही बात दोहराई गई। सोशल मीडिया से लेकर चुनावी सभाओं तक यह नैरेटिव लगातार फैलाया गया कि कांग्रेस ने कश्मीरी पंडितों को मरने के लिए छोड़ दिया।

लेकिन जब हम इतिहास के तथ्यों की ओर देखते हैं तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।

कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन की शुरुआत जनवरी 1990 में हुई। 19 जनवरी 1990 को घाटी में भय और आतंक का ऐसा वातावरण बना कि हजारों परिवारों ने अपने घर छोड़ने शुरू कर दिए।

उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार नहीं थी।

देश के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। उनकी जनता दल सरकार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से चल रही थी।

जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू था। अर्थात राज्य की सुरक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी सीधे केंद्र सरकार और राज्यपाल प्रशासन पर थी।

यदि उस समय कश्मीरी पंडितों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली, यदि आतंकवादियों के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, यदि हजारों परिवारों को रातोंरात घाटी छोड़नी पड़ी, तो स्वाभाविक रूप से उस समय की सरकारों और प्रशासन की भूमिका पर भी प्रश्न उठेंगे।

यह कहना गलत होगा कि केवल कांग्रेस जिम्मेदार थी।

यह कहना भी गलत होगा कि केवल जनता दल या भाजपा जिम्मेदार थी।

सच्चाई यह है कि कश्मीर की समस्या दशकों की राजनीतिक भूलों, प्रशासनिक कमजोरियों, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और अलगाववादी राजनीति का परिणाम थी।

लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए इतिहास को सरल बनाकर प्रस्तुत किया गया और एक ही दल को खलनायक तथा दूसरे को नायक बना दिया गया।

कश्मीरी पंडितों का दर्द और राजनीति का लाभ


सबसे दुखद तथ्य यह है कि जिन लोगों ने अपना घर खोया, जिनकी बेटियों ने शरणार्थी शिविरों में जीवन बिताया, जिनके बुजुर्ग तंबुओं में दम तोड़ गए, उनकी पीड़ा पर सबसे अधिक राजनीति हुई।

हर चुनाव में कश्मीरी पंडित याद आते हैं।

हर मंच से उनके नाम पर राष्ट्रवाद की बातें होती हैं।

हर सरकार उनके पुनर्वास का वादा करती है।

लेकिन जब परिणाम देखने की बारी आती है तो तस्वीर निराशाजनक दिखाई देती है।

यदि वास्तव में कश्मीरी पंडित किसी राजनीतिक दल की प्राथमिकता होते तो आज तीन दशक से अधिक समय बाद भी लाखों लोग अपने घर लौटने की प्रतीक्षा नहीं कर रहे होते।
धारा 370: समाधान या प्रतीक?

भारतीय जनता पार्टी ने लंबे समय तक यह दावा किया कि कश्मीर की अधिकांश समस्याओं की जड़ धारा 370 है।

देश को बताया गया कि धारा 370 हटते ही-

  • आतंकवाद समाप्त हो जाएगा।
  • अलगाववाद खत्म हो जाएगा।
  • विकास की गंगा बहेगी।
  • बाहरी निवेश आएगा।
  • कश्मीरी पंडित वापस लौटेंगे।
  • 5 अगस्त 2019 को धारा 370 समाप्त कर दी गई।
  • देशभर में इसका स्वागत हुआ।
  • कई लोगों ने इसे ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय कहा।
  • लेकिन अब प्रश्न यह है कि उस निर्णय के घोषित उद्देश्यों में से कितने पूरे हुए?
  • क्या कश्मीरी पंडित अपने घर लौट गए?
  • क्या उनकी संपत्तियां वापस मिल गईं?
  • क्या घाटी में उनके लिए सुरक्षित वातावरण बन गया?
  • क्या आतंकवाद पूरी तरह समाप्त हो गया?


यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो इस पर गंभीर चिंतन होना चाहिए।

धारा 370 हटने के बाद भी वापसी क्यों नहीं?

यह वह प्रश्न है जिससे राजनीतिक दल अक्सर बचते हैं।
पहला कारण: सुरक्षा की भावना का अभाव

किसी भी व्यक्ति के लिए घर लौटने की पहली शर्त सुरक्षा है।

धारा 370 हटने के बाद भी आतंकवादी घटनाएं समाप्त नहीं हुईं।

कई अवसरों पर कश्मीरी पंडित कर्मचारियों और अन्य नागरिकों की लक्षित हत्याएं हुईं।

ऐसी परिस्थितियों में किसी परिवार से यह अपेक्षा करना कि वह केवल राजनीतिक घोषणाओं के आधार पर लौट आएगा, व्यावहारिक नहीं है।

दूसरा कारण: नष्ट हो चुकी सामाजिक संरचना


1990 में जो परिवार घाटी छोड़कर गए थे, उनकी तीन पीढ़ियां अब कश्मीर से बाहर जीवन बिता चुकी हैं।

बच्चे बड़े हो गए।

रोजगार मिल गया।

व्यवसाय स्थापित हो गए।

नई सामाजिक पहचान बन गई।

आज कश्मीर लौटना केवल मकान में प्रवेश करना नहीं है, बल्कि पूरे जीवन को पुनः स्थापित करना है।
तीसरा कारण: संपत्तियों का प्रश्न

हजारों घर नष्ट हो गए।

अनेक संपत्तियां विवादित हो गईं।

कई स्थानों पर मूल बस्तियां ही समाप्त हो गईं।

ऐसे में पुनर्वास एक अत्यंत जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया बन जाती है।
चौथा कारण: आर्थिक पुनर्वास की कमी

केवल घर दे देने से कोई समुदाय वापस नहीं बसता।

उसे विद्यालय, अस्पताल, व्यापार, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा भी चाहिए।

आज तक ऐसी व्यापक योजना सामने नहीं आई जो बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों के स्थायी पुनर्वास को सुनिश्चित कर सके।
क्या कश्मीरी पंडित केवल चुनावी मुद्दा बन गए?

यह प्रश्न कठोर अवश्य है लेकिन प्रासंगिक है।

यदि किसी समस्या का समाधान नहीं होता लेकिन उस पर लगातार राजनीति होती रहती है, तो यह संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि कहीं उस समस्या को जीवित रखने में ही राजनीतिक लाभ तो नहीं छिपा है।

कश्मीरी पंडितों का मुद्दा भी कहीं-कहीं ऐसा ही प्रतीत होता है।

जब चुनाव आते हैं तो कश्मीरी पंडितों की चर्चा बढ़ जाती है।

जब चुनाव समाप्त हो जाते हैं तो पुनर्वास की चर्चा भी धीमी पड़ जाती है।

यदि राष्ट्र वास्तव में उनके प्रति संवेदनशील है तो पुनर्वास की समयबद्ध राष्ट्रीय नीति क्यों नहीं बनाई गई?
राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ

आज राष्ट्रवाद की चर्चा बहुत होती है।

लेकिन राष्ट्रवाद केवल नारे लगाने का नाम नहीं है।

राष्ट्रवाद का अर्थ है-

  • नागरिकों की सुरक्षा।
  • न्याय की स्थापना।
  • विस्थापितों का सम्मानजनक पुनर्वास।
  • सांस्कृतिक विरासत की रक्षा।


यदि लाखों नागरिक अपने ही देश में दशकों तक शरणार्थी जैसा जीवन जीने को विवश हों, तो यह राष्ट्रवाद की सफलता नहीं बल्कि उसकी अधूरी यात्रा का संकेत है।

इतिहास से सीखने की आवश्यकता

कश्मीरी पंडितों की त्रासदी हमें कई महत्वपूर्ण सबक देती है।

पहला, किसी भी प्रकार के धार्मिक कट्टरवाद को समय रहते रोकना आवश्यक है।

दूसरा, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर राजनीतिक स्वार्थ नहीं होना चाहिए।

तीसरा, किसी भी समुदाय की पीड़ा को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

चौथा, इतिहास को आधा-अधूरा नहीं बल्कि संपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए।
सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न

आज यदि कोई नागरिक यह पूछे कि—

"धारा 370 हट गई, केंद्र सरकार के पास पूर्ण नियंत्रण है, सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती है, फिर भी कश्मीरी पंडित अपने घर क्यों नहीं लौट पाए?"

तो यह प्रश्न राष्ट्र-विरोधी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है।

इसका उत्तर किसी राजनीतिक दल को देना ही होगा।

क्योंकि किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके परिणामों से होता है, उसके प्रचार से नहीं।
निष्कर्ष

कश्मीरी पंडितों की त्रासदी भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसे केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

यह एक समुदाय की पीड़ा का इतिहास है।

यह प्रशासनिक विफलताओं का इतिहास है।

यह आतंकवाद की क्रूरता का इतिहास है।

और यह उन अधूरे वादों का इतिहास भी है जो आज तक पूरे नहीं हुए।

देश को यह स्वीकार करना होगा कि कश्मीरी पंडितों का प्रश्न अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।

धारा 370 का हटना एक संवैधानिक निर्णय था, लेकिन कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक वापसी एक मानवीय और राष्ट्रीय दायित्व है।

जब तक कश्मीर की धरती पर फिर से कश्मीरी पंडित उसी सम्मान, सुरक्षा और अधिकार के साथ नहीं बसते जिस प्रकार वे सदियों से बसे थे, तब तक यह कहना कठिन होगा कि यह अध्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है।

इतिहास का न्याय भाषणों से नहीं होता।

न्याय तब होता है जब विस्थापित अपने घर लौटते हैं, जब पीड़ितों को सम्मान मिलता है और जब राष्ट्र अपनी भूलों से सीखकर उन्हें दोहराने से बचता है।

कश्मीरी पंडितों के नाम पर राजनीति बहुत हो चुकी। अब समय है कि उनके नाम पर नहीं, उनके लिए काम हो।
-डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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