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याद है वो पल...

याद है वो पल...

संजय जैन
आज से करीब 10-15 साल पहले की सच्ची एक घटना आज याद आ गई। कभी कभी हमारे और आपके जीवन में कुछ इस तरह का घटित हो जाता है, जिसे हम और आप पूरी जिंदगी नहीं भूल पाते है। ठीक इसी तरह की घटना मेरे जीवन में घटी, जिसे में आज तक नहीं भूल पाया हूँ। सावन और चातुर्मास का महीना चल रहे था। जिसमे लोग दान धर्म और त्याग आदि करते है ! जिससे उनका ये मनुष्य जीवन सार्थक हो जाये और उनका अगला भव भी सुधार जाये। मेरे जीवन की एक सच्ची घटना का में जिक्र कर रहा हूँ । आफिस के लंच के समय हम ३-4 लोग लंच के बाद एक होटल में लस्सी पीने गए और ऑर्डर देकर एक दूसरे की खींच तान कर रहे थे। तभी एक लगभग 70-75 साल की दादाजी कुछ पैसे मांगते हुए, मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं .......! उनकी कमर झुकी हुई थी ,.चेहरे की झुर्रियों मे भूख तैर रही थी ! आंखें भीतर को धंसी हुई, किन्तु सजल थीं ..! उनको देखकर मन मे ना जाने क्या विचार आया कि मैने जेब से सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया .."दादीजी लस्सी पियोगी ?" मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं, मेरे मित्र अधिक .... !
क्योंकि अक्सर मैं बूढ़े और असहाय लोगो को 2-५ या 10 रुपए देता रहता था। लेकिन न जाने उस दिन मेरे मन में उन्हें लस्सी पिलाने का मन हुआ, और मैंने दादी से पूछा की आप लस्सी पियोगी ? दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी, और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे, वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए .... मुझे कुछ समझ नही आया, तो मैने उनसे पूछा .. "ये काहे के लिए दादी ?" " वो बोली इनको मिला के पिला दो बेटा !" भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था , रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी ! एका एक आंखें छलछला आईं और भर भराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी देने को कहा .. उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं ...!
अब मुझे वास्तविकता मे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार और अपने ही दोस्तों के साथ ही अन्य कई ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह पा रहा था !
डर था कि कहीं कोई टोक ना दे ....कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर मे बैठ जाने पर आपत्ति ना हो ..? लेकिन वो कुर्सी जिस पर मैं बैठा था, मुझे काट रही थी ..! लस्सी से भरा ग्लास हम लोगों के हाथों मे आते ही, मैं अपना लस्सी का ग्लास पकड़ कर दादी के बाजू मे ही जमीन पर बैठ गया ! क्योंकि ये करने के लिए मैं स्वतंत्र था, और इससे किसी को आपत्ति भी नही हो सकती थी ! ये करते हुए मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल के लिए घूरा ..लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बिठाया, और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा .."ऊपर बैठ जाइए साहब !" अब सब के हाथों मे लस्सी के ग्लास और होठों पर मुस्कुराहट थी !
बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसूं ..होंठों पर मलाई के कुछ अंश और सैकड़ों दुआएं थी...! मेरे जीवन का ये लम्हा मुझे आज भी याद है और आगे भी जब तक में इस संसार में रहूँगा तब तक याद रहेगा !
ना जाने क्यों जब कभी हमें 10-20-50 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उस पर खर्च करने होते हैं, तो वो हमें बहुत ज्यादा क्यों लगते हैं ?
लेकिन सोचिए कभी..... कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं ? या बीड़ी, सिगरेट, गुटका , या अन्य निषेध पदार्थो पर खर्च कर देते है। जिसके कारण हमारा शरीर अस्वस्थ्य और बीमारियों से घिर सकता है । या उन रुपयों को आप खर्च कर दुआएं खरीद सकती हैं ! अपना मानव जन्म और इंसान के प्रति अपनी इंसानियत तो कम से कम दिखा सकते हो ।बोलने वाले और देखने वाले चाहे कुछ भी आप को बोले ? इस की बिना परवाह किये मन की बात सुने और अपने इस मनुष्य जीवन को धन्य बनाये और अपने मनुष्य होना प्रमाण दे।
इस घटना ने मेरे जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला दिया। जिसके कारण में आज कई सेवाभावी संस्थाओ से जुड़ गया हूँ और जब भी समय मिलता है। लोगो की सेवा करने का प्रयास करता हूँ। सेवा दान और मदद करना मानव जीवन का सबसे बड़ा आधार है जो समझते है वो इसी अपने जीवन में अपनाते है।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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