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हिरण्य प्रदेश संस्कृति: मद सरवा का मलमास

हिरण्य प्रदेश संस्कृति: मद सरवा का मलमास

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास केवल राजाओं के युद्धों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह ऋषियों के तपोबल, नदियों के प्रवाह और सांस्कृतिक धाराओं के अंतर्संबंधों का एक जीवंत ताना-बाना है। जब हम 'मगध' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मानस पटल पर चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, बिंबिसार और भगवान बुद्ध का कालखंड उभर आता है। परंतु, ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण और मौर्यकालीन वैभव से हजारों वर्ष पूर्व, प्रागैतिहासिक और वैदिक काल में इसी भूमि का एक बड़ा हिस्सा 'हिरण्य प्रदेश' के नाम से विख्यात था। यह वह कालखंड था जब वैदिक ऋषियों का कारवां सप्त-सैंधव प्रदेश (सरस्वती और सिंधु घाटी) से पूर्व की ओर बढ़ रहा था। वायु पुराण, महाभारत (वनपर्व) और शतपथ ब्राह्मण के साक्ष्यों के अनुसार, वर्तमान बिहार के दक्षिण-पश्चिम का सोन-कमांड क्षेत्र—जिसमें अरवल, औरंगाबाद, रोहतास, भोजपुर और पटना का कुछ हिस्सा शामिल है—वैदिक संस्कृति की प्रयोगशाला बना। यहाँ भृगु वंश के ऋषियों (च्यवन, और्व, जमदग्नि) और स्थानीय सूर्यवंशी शासकों (राजा शर्याति) के बीच एक ऐसा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गठबंधन हुआ, जिसने सनातन धर्म की दिशा बदल दी।
हिरण्य प्रदेश के कालखंड को समझने के लिए हमें मुख्य रूप से पौराणिक मन्वंतर व्यवस्था और पुरातात्विक साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ता है। सनातन कालगणना के अनुसार, यह पूरी घटना वैवस्वत मन्वंतर के सतयुग के उत्तरार्ध और त्रेतायुग के संधिकाल की है। यह वह समय था जब मनु के पुत्र राजा शर्याति भारतवर्ष के एक बड़े भू-भाग पर शासन कर रहे थे। महाभारत के वनपर्व के 'तीर्थयात्रा पर्व' में लोमश ऋषि पांडवों को इस क्षेत्र की महत्ता बताते हुए इसे अत्यंत प्राचीन और देवताओं की क्रीड़ास्थली बताते हैं। यदि इसे आधुनिक भू-वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह उत्तर-नूतन काल के बाद का कालखंड है, जब गंगा और सोन नदियों ने अपनी वर्तमान घाटियों का निर्माण कर लिया था। पुरातात्विक भाषा में, सोन और पुनपुन नदी घाटी में मिले नवपाषाणिक और ताम्रपाषाणिक अवशेष—जैसे चिरांद, सेनुआड़ (रोहतास) और ताराडीह (गया)—यह सिद्ध करते हैं कि ईसा पूर्व ५००० से ३००० वर्ष पहले यहाँ एक अत्यंत विकसित, कृषि-प्रधान और यज्ञ-संस्कृति पर आधारित मानव सभ्यता फल-फूल रही थी, जिसे वेदों में 'कीकट' और बाद में 'हिरण्य प्रदेश' कहा गया।
वैवस्वत मनु के प्रतापी पुत्र राजा शर्याति का साम्राज्य प्राचीन भारत के सबसे दिलचस्प भू-राजनीतिक विन्यासों में से एक था। शर्याति के साम्राज्य की दो मुख्य राजधानियाँ या प्रभाव क्षेत्र थे: कुशस्थली (आनर्त प्रदेश - वर्तमान गुजरात): जहाँ शर्याति के पुत्र आनर्त ने शासन किया। हिरण्य प्रदेश (मगध का सोन तट - वर्तमान बिहार): जो शर्याति का यज्ञीय और आध्यात्मिक केंद्र था।
राजा शर्याति का साम्राज्य विस्तार पश्चिम सीमा: आनर्त (गुजरात/नर्मदा घाटी) <===============> पूर्वी सीमा: हिरण्य प्रदेश (सोन-पुनपुन घाटी, बिहार)शर्याति साम्राज्य का यह विस्तार दर्शाता है कि प्राचीन काल में व्यापारिक और सांस्कृतिक गलियारे (Corridors) कितने सुदृढ़ थे। राजा शर्याति अपनी सेना और पुरोहितों के साथ यज्ञ अनुष्ठानों के लिए हिरण्य प्रदेश की घने जंगलों वाली और पवित्र नदियों से घिरी भूमि को चुनते थे। इसी क्षेत्र के वनों में राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या का विवाह भृगुवंशी च्यवन ऋषि से हुआ था, जिसने इस साम्राज्य को एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की हिरण्य प्रदेश की पहचान यहाँ की भौतिक संपदा से अधिक यहाँ रहने वाले ऋषियों के कारण थी। यह क्षेत्र भृगुवंशी ऋषियों का मुख्य गढ़ था। भृगु वंश की विशेषता थी कि वे अग्नि के ज्ञाता, आयुर्वेद के अन्वेषक और शस्त्र-शास्त्र दोनों में निपुण थे।
यद्यपि भृगु ऋषि का मूल स्थान पश्चिमी भारत माना जाता है, लेकिन उनके शिष्यों और पुत्रों ने पूर्व के जंगलों को साफ कर कृषि योग्य बनाया। भृगु ने ही 'अग्नि-मंथन' (लकड़ी से आग पैदा करना) की तकनीक को जन-जन तक पहुँचाया था। भृगु के पुत्र च्यवन इस क्षेत्र के सबसे जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं। किंवदंती है कि वे वर्तमान अरवल-रोहतास के जंगलों में हजारों वर्षों तक एक ही स्थान पर ध्यानमग्न रहे, जिसके कारण उनके शरीर पर दीमक ने बांबी (मिट्टी का ढेर) बना ली थी। राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने अनजाने में उनकी आँखों को चमकीला कीट समझकर सुई से छेद दिया, जिससे ऋषि अंधे हो गए। पश्चाताप स्वरूप शर्याति ने सुकन्या का विवाह वृद्ध च्यवन से कर दिया।
च्यवन ऋषि की सेवा से प्रसन्न होकर देव-वैद्य अश्वनी कुमारों ने इसी हिरण्य प्रदेश के औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों (जैसे आंवला, गिलोय, अष्टवर्ग) के मिश्रण से एक दिव्य रसायन तैयार किया, जिसे आज हम 'च्यवनप्राश' के नाम से जानते हैं। इसके सेवन से च्यवन ऋषि को पुनः युवावस्था (कायाकल्प) और दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। हिरण्य प्रदेश के अंतर्गत आने वाले वर्तमान अरवल जिले के 'मदसरवा' के मूल अधिष्ठाता मधुश्रवा ऋषि थे। 'मधुश्रवा' शब्द का अर्थ है—"जिसके मुख या आश्रम से वेदमंत्रों की अमृतमयी ध्वनि (मधु) का निरंतर श्रवण (प्रवाह) हो"। वे च्यवन ऋषि के समकालीन और परम सहयोगी थे। उनका आश्रम ब्रह्म-विद्या के अध्ययन का बहुत बड़ा विश्वविद्यालय था। विल्व (बिल्व) ऋषि - भृगु परंपरा के एक और विस्मृत ऋषि विल्व थे। उन्होंने इस क्षेत्र में बेल (बिल्व) के जंगलों को रोपित किया और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ शिव उपासना को बढ़ावा दिया। आज भी इस क्षेत्र में बेल के वृक्षों की बहुतायत उनके इसी प्रयास का अवशेष है। और्व ऋषि: अस्त्र-विज्ञान के जनक -- च्यवन ऋषि के पौत्र और ऊरु के पुत्र और्व ऋषि थे। इनका जन्म अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में हुआ था, और इनके भीतर की क्रोधाग्नि को 'और्वाग्नि' (या बड़वाग्नि) कहा गया। और्व ऋषि ने हिरण्य प्रदेश को अपना सैन्य और वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र बनाया। उन्होंने यहाँ धनुर्वेद और आग्नेयास्त्रों का विकास किया, जिसका उपयोग बाद में उनके वंशज परशुराम ने किया।
हिरण्य प्रदेश का जल-जाल: पाँच पौराणिक नदियाँ में किसी भी सभ्यता का विकास उसकी जल प्रणालियों पर निर्भर करता है। हिरण्य प्रदेश पाँच प्रमुख नदियों के तंत्र से घिरा हुआ था, जिसमें से कुछ आज अत्यंत संकुचित या विलुप्त हो चुकी हैं:।विलुप्त वैदिक हिरण्यबाहु नदी (सोन नद) इस क्षेत्र की जीवन रेखा 'सोन' है, जिसे प्राचीन काल में हिरण्यबाहु या सुवर्णभद्र कहा जाता था। नदी का पुलिंग रूप 'नद' इसकी विशालता को दर्शाता है। इसके कणों में सोने (हिरण्य) के अंश पाए जाने के कारण इसका नाम हिरण्यबाहु पड़ा। यह नदी अमरकंटक से निकलकर उत्तर की ओर बहती हुई मदसरवा के पावन तट को छूती थी।
पुनपुन नदी (वैदिक कीकट धारा) - हिरण्य प्रदेश की पूर्वी सीमा का निर्धारण पुनपुन नदी करती थी। ऋग्वेद में जिस 'कीकट' देश की अपवित्र नदियों का उल्लेख है, कालांतर में सनातन संस्कृति ने अपनी शुद्धि प्रक्रिया से इसे अत्यंत पवित्र बना दिया। गया में पिंड दान से पूर्व पुनपुन नदी में स्नान और तर्पण का अनिवार्य विधान है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है। आद्री नदी (अदरा)।सोन और पुनपुन के बीच बहने वाली यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैदिक सहायक नदी थी। वर्तमान में यह औरंगाबाद और अरवल जिले के कुछ हिस्सों में 'अदरा' या 'आद्री' के नाम से जानी जाती है। प्राचीन काल में यह बारहमासी नदी थी, जिसके तटों पर ऋषियों के छोटे-छोटे गुरुकुल स्थित थे। आज यह नदी अत्यधिक गाद (Silt) जमा होने और पर्यावरण क्षरण के कारण एक मौसमी नाले या संकुचित धारा के रूप में सिमट गई है।
मदार नदी (मदसरवा की विलुप्त धारा)। एक स्थानीय पौराणिक धारा थी जो सीधे मधुश्रवा ऋषि के आश्रम और ब्रह्मेष्ठि यज्ञ कुंड के समीप से प्रवाहित होती थी। च्यवन ऋषि और देवराज इंद्र के युद्ध के दौरान उत्पन्न 'मद दैत्य' के रक्त और स्वेद से इस धारा के उत्पन्न होने की कथा है। आधुनिक भूगोल में यह धारा भूमिगत हो चुकी है या वर्षा ऋतु के जलजमाव के रूप में ही दिखाई देती है।
. गंगा नदी - हिरण्य प्रदेश की उत्तरी सीमा का निर्धारण स्वयं पतितपावनी गंगा करती थी। प्राचीन काल में सोन (हिरण्यबाहु) और गंगा का संगम वर्तमान पटना के मनेर के समीप होता था, जो इस पूरे प्रदेश का मुख्य व्यापारिक प्रवेश द्वार था। मदसरवा का ब्रह्मेष्ठि यज्ञ और ऐतिहासिक देव-संग्राम - हिरण्य प्रदेश के इतिहास की सबसे भव्य और निर्णायक घटना अरवल के कलेर प्रखंड स्थित मदसरवा में आयोजित 'ब्रह्मेष्ठि यज्ञ' है। राजा शर्याति द्वारा आयोजित इस यज्ञ के सूत्रधार च्यवन और मधुश्रवा ऋषि थे। पुरुषोत्तम मास मलमास यज्ञ ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड यानी अधिकमास (मलमास) में किया गया था। उस समय मलमास को अशुद्ध मानकर कोई शुभ कार्य नहीं होता था। ऋषियों ने प्रकृति के संतुलन और कालचक्र के शुद्धिकरण के लिए इसी समय को चुना। इस यज्ञ की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें सनातन ब्रह्मांड विज्ञान के सभी प्रमुख देवताओं की उपस्थिति थी: 12 आदित्य: अंतरिक्ष और समय के नियंत्रक। , 8 वसु: प्रकृति के पांच तत्व और ऊर्जा के रूप। , 11 रुद्र: संहार और पुनर्जागरण की शक्तियाँ। , अश्वनी कुमार: देवताओं के चिकित्सक।, देवराज इंद्र: स्वर्ग के अधिपति। , इस महायज्ञ की संप्रभुता और सुरक्षा स्वयं भगवान शिव ने की थी। शिव इस यज्ञ के सर्वोच्च रक्षक के रूप में उपस्थित थे।
यज्ञ के दौरान च्यवन ऋषि ने घोषणा की कि इस बार अश्वनी कुमारों को भी देवताओं के समान 'सोमपान' (सोम रस ग्रहण करने) का अधिकार दिया जाएगा, क्योंकि उन्होंने ऋषि को नया जीवन दिया था। देवराज इंद्र ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि अश्वनी कुमार पृथ्वी पर मनुष्यों की चिकित्सा करते हैं, इसलिए वे अशुद्ध हैं और देवताओं की पंक्ति में नहीं बैठ सकते। जब इंद्र ने अपने वज्र से च्यवन ऋषि पर प्रहार करना चाहतो, तो च्यवन ऋषि ने अपने तपोबल से इंद्र के हाथ को वहीं स्तंभित (पैरलाइज) कर दिया। उसी क्षण ऋषि ने यज्ञ कुंड की आहुति और अपने क्रोध से एक अत्यंत भयानक, गगनचुंबी असुर की रचना की, जिसका नाम था 'मद दैत्य'। मद दैत्य की विशेषताएं (महाभारत के अनुसार) * उसके केवल एक जबड़े में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग समा सकता था।* उसकी आँखें धधकते हुए अंगारों के समान थीं। * उसकी जिह्वा कालसर्प की भांति लपलपा रही थी।
मद दैत्य ने जैसे ही इंद्र को निगलने के लिए अपना मुंह खोला, इंद्र का अहंकार चूर-चूर हो गया। भयभीत इंद्र ने भगवान शिव की शरण ली और च्यवन ऋषि से क्षमा मांगी। इंद्र ने सहर्ष अश्वनी कुमारों को सोमपान का अधिकार स्वीकार कर लिया। मद दैत्य ने इस प्रकार यज्ञ को बिना किसी विध्न के सफल बनाया। इसी 'मद' दैत्य और 'मधुश्रवा' ऋषि के नाम के संयोग से इस स्थान का नाम कालांतर में मदसरवा पड़ा।
: च्यवनेश्वर शिवलिंग और पंच-संर्षकृति - मदसरवा का यह ब्रह्मेष्ठि यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि इसने भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक और दार्शनिक भूगोल को हमेशा के लिए बदल दिया। देवराज इंद्र पर विजय और भगवान शिव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए च्यवन ऋषि ने यज्ञ भूमि पर 'च्यवनेश्वर शिवलिंग' की स्थापना की। यह शिवलिंग इस बात का प्रतीक था कि ज्ञान और तप के आगे भौतिक सत्ता (इंद्र) हमेशा नतमस्तक होती है। भगवान विष्णु बने 'मलमास' के देव - यज्ञ की समाप्ति पर, कालचक्र के इस तथाकथित उपेक्षित महीने (मलमास) को पवित्र करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु इसके अधिष्ठाता देव बने। उन्होंने घोषणा की कि "अब से यह महीना मेरे नाम 'पुरुषोत्तम मास' के नाम से जाना जाएगा और इस दौरान किए गए दान, यज्ञ और तप का फल अनंत होगा।"वैवस्वत मन्वंतर में पंच-संस्कृति की स्थापना - मदसरवा की इस भूमि से सनातन धर्म की पांच प्रमुख वैचारिक धाराओं का समन्वय हुआ, जिसे 'पंच-संस्कृति' कहा जाता है। ऋषियों ने यह सुनिश्चित किया कि समाज में कोई टकराव न हो: पंच संस्कृति समन्वय में सौर , शाक्त , शैव , वैष्णव, ब्रह्म है। सौर संस्कृति: 12 आदित्यों की उपस्थिति से सूर्य की ऊर्जा और काल-गणना को सुदृढ़ किया गया। शाक्त संस्कृति: सुकन्या के त्याग और प्रकृति की औषधीय शक्तियों (च्यवनप्राश के निर्माण) के माध्यम से शक्ति की महत्ता स्थापित हुई। शैव संस्कृति: भगवान शिव के यज्ञ-संरक्षक रूप और च्यवनेश्वर शिवलिंग के माध्यम से योग और वैराग्य को समाज का आधार बनाया गया। ब्रह्म संस्कृति: ब्रह्मेष्ठि यज्ञ के नियमों के द्वारा वेदों की सर्वोच्चता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था (ऋत) को स्थापित किया गया। वैष्णव संस्कृति: भगवान विष्णु को पुरुषोत्तम मास का स्वामित्व देकर भक्ति और शरणागति के मार्ग को सुलभ बनाया गया है।
यदि हम प्राचीन पुराणों में वर्णित हिरण्य प्रदेश की सीमाओं को आज के आधुनिक २१वीं सदी के प्रशासनिक मानचित्र पर रेखांकित करें, तो यह बिहार का सबसे समृद्ध कृषि और जल-कमांड क्षेत्र (सोन-कमांड) है:: अरवल जिला का कलेर प्रखंड (मदसरवा गाँव)। यह वही स्थान है जहाँ आज भी प्राचीन टीले और पौराणिक अवशेष बिखरे पड़े हैं। उत्तरी सीमा: पटना जिले का मनेर और दानापुर क्षेत्र। प्राचीन काल में सोन यहीं गंगा से मिलती थी, जो शर्याति साम्राज्य का जल-परिवहन केंद्र था। दक्षिणी सीमा: रोहतास (सासाराम) की पहाड़ियाँ और झारखंड के पलामू की सीमा। यह क्षेत्र और्व ऋषि और परशुराम की अस्त्र-शस्त्र निर्माण शाला से समृद्ध है। पूर्वी सीमा: जहानाबाद और गया का क्षेत्र, जहाँ पुनपुन नदी बहती है। यह क्षेत्र भृगुवंशियों के पितृ-तर्पण और श्राद्ध संस्कृति से जुड़ा था। पश्चिमी सीमा: भोजपुर (आरा) और बक्सर। बक्सर का 'चरित्रवन' क्षेत्र भी च्यवन ऋषि और बाद में महर्षि विश्वामित्र की कर्मस्थली बना है।
अरवल जिले का कलेर प्रखण्ड के मदसरवा और प्राचीन हिरण्य प्रदेश केवल किंवदंतियों का हिस्सा नहीं हैं। यह वह ऐतिहासिक भूमि है जहाँ भारत ने अपनी चिकित्सा पद्धति (च्यवनप्राश), अपना खगोल विज्ञान (अधिकमास का नियमन) और अपनी रक्षा प्रणाली (और्व ऋषि के आग्नेयास्त्र) को विकसित किया था। आज आवश्यकता इस बात की है कि सोन और पुनपुन नदी घाटी के इन पौराणिक स्थलों का पुरातात्विक उत्खनन किया जाए, विलुप्त हो रही आद्री और मदार जैसी वैदिक नदियों का पुनरुद्धार किया जाए, और 'मदसरवा' के च्यवनेश्वर क्षेत्र को एक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक व आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। यह विस्मृत साम्राज्य भारत की उस 'ऋषि संस्कृति' का साक्षात प्रमाण है, जिसने कभी पूरे विश्व को "वसुधैव कुटुंबकम" और "तमसो मा ज्योतिर्गमय" का संदेश दिया था।
संदर्भ - ऋग्वेद संहिता - कीकट प्रदेश और नदियों के सूक्त (मण्डल ३, सूक्त ५३)। महाभारत (वनपर्व) - तीर्थयात्रा उपपर्व, लोमश ऋषि-युधिष्ठिर संवाद (अध्याय १२१-१२४; च्यवन-सुकन्या प्रसंग)। वायु पुराण - अनुषंग पाद, मगध और हिरण्यबाहु नदी का भौगोलिक वर्णन। शतपथ ब्राह्मण - चतुर्थ काण्ड (अश्वनी कुमारों को सोमपान अधिकार प्रसंग)। बिहार डिस्ट्रिक्ट गैजेटियर (गया और औरंगाबाद) - विरासत , स्थानीय लोकश्रुतियां और पुरातात्विक टीलों का विवरण
करपी , अरवल, बिहार 804419
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