वेदों की ऋचाओं से आधुनिक विज्ञान तक: पर्यावरण सनातन
सत्येन्द्र कुमार पाठक
विकास की अंधी दौड़ और वसुंधरा की पुकार में आज इक्कीसवीं सदी में मानव सभ्यता विकास के जिस शिखर पर खड़ी है, वहाँ वह एक बड़े संकट से भी जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming), नदियों का दम घुटता अस्तित्व, ऋतु चक्र का अनियंत्रित होना, ओजोन परत का क्षरण और विलुप्त होती जैव-विविधता—ये सब इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि मनुष्य ने तकनीकी प्रगति की होड़ में अपनी जीवनदायिनी प्रकृति को हाशिए पर धकेल दिया है।। (वर्ष 2026) में जब पूरी दुनिया 'क्लाइमेट चेंज' और 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट' (सतत विकास) के नए-नए सिद्धांतों को गढ़ रही है, तब यह अनिवार्य हो जाता है कि हम अतीत के उन पन्नों को पलटें जहाँ पर्यावरण संरक्षण केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि जीवन की एक परम पावन पद्धति था। भारतीय सनातन वांग्मय—वेदों, पुराणों, उपनिषदों और स्मृति ग्रंथों—में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व (Co-existence) का जो मार्ग दिखाया गया है, वह आज के वैश्विक संकट का एकमात्र तार्किक समाधान है। आइए, विश्व पर्यावरण दिवस की वैश्विक यात्रा से लेकर भारतीय ग्रंथों की ऋचाओं और बिहार की ऐतिहासिक धरती तक, पर्यावरण संरक्षण के इस महा-आलेख के माध्यम से प्रकृति के इस पावन अंतर्संबंध को समझें।
विश्व पर्यावरण दिवस: वैश्विक चेतना का ऐतिहासिक सफर - पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक जागृति लाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1970 के दशक में एक अभूतपूर्व पहल की। यह पहल आज दुनिया का सबसे बड़ा नागरिक आंदोलन बन चुकी है। वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 'मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' आयोजित किया गया था। यह इतिहास का पहला ऐसा सम्मेलन था, जहाँ दुनिया के तमाम राष्ट्र प्रमुखों ने एक मंच पर बैठकर माना कि इंसानी गतिविधियाँ पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँचा रही हैं। इसी ऐतिहासिक चर्चा के दौरान 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाने का सुझाव दिया गया और संयुक्त राष्ट्र ने इसकी आधिकारिक घोषणा की। घोषणा के दो वर्ष बाद, 5 जून 1974 को पहला आधिकारिक विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया (यद्यपि इसकी नींव 1973 में ही रख दी गई थी)। इस दिवस का आधिकारिक नाम 'संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यावरण दिवस' है, जिसे आम बोलचाल में 'इको डे' , या 'वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे' भी कहा जाता है।
शुरुआत में यह कुछ देशों तक सीमित था, परंतु वर्तमान में यह वार्षिक आयोजन 143 से अधिक देशों (व्यापक अर्थों में 150 से अधिक राष्ट्रों) की भागीदारी के साथ सार्वजनिक पहुंच का सबसे बड़ा वैश्विक मंच बन चुका है। वर्ष 1987 में संयुक्त राष्ट्र ने एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिया, जिसके तहत हर साल इस आयोजन का मुख्य केंद्र (Global Host) अलग-अलग देशों को चुना जाने लगा। इससे यह लाभ हुआ कि पर्यावरण की क्षेत्रीय समस्याओं को वैश्विक मंच मिल सका।
बदलती चेतना के प्रतीक इतिहास के कुछ प्रमुख पर्यावरण दिवसों पर नज़र डालें तो समझ आता है कि समय के साथ हमारे सरोकार कैसे बदले:
अल्जीरिया में वर्ष 2026 का मुख्य अंतर्राष्ट्रीय समारोह अल्जीरिया में हुआ। इसकी थीम मरुस्थल और मरुस्थलीकरण पर केंद्रित थी, जिसका नारा था— "शुष्क भूमि को मरुस्थल न बनाएं"। इसने बंजर होती धरती को बचाने के प्रति दुनिया को सचेत किया। वर्ष 2007 (नॉर्वे): आर्कटिक सर्कल के उत्तर में स्थित शहर ट्रोम्सो में इसका आयोजन हुआ। इसकी थीम थी— "मेल्टिंग आइस - ए हॉट टॉपिक?" (पिघलती बर्फ - एक ज्वलंत विषय?)। अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीय वर्ष के दौरान आयोजित इस कार्यक्रम ने ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ रहे विनाशकारी प्रभावों को दुनिया के सामने रखा। इस अवसर पर मिस्र जैसे प्राचीन देशों ने विशेष डाक टिकट भी जारी किए थे।
जब हम पर्यावरण और पारिस्थितिकी को वैज्ञानिक धरातल पर समझने का प्रयास करते हैं, तो कुछ महान मनीषियों और वैज्ञानिकों का नाम स्वतः सामने आता है, जिन्होंने इस विमर्श को अकादमिक और व्यावहारिक रूप दिया। जर्मन जीवविज्ञानी अर्नस्ट हेकेल ने सर्वप्रथम 'इकोलॉजी' (पारिस्थितिकी) शब्द का प्रतिपादन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी जीव अपने निर्जीव और सजीव पर्यावरण से अलग होकर जीवित नहीं रह सकता। वहीं, बीसवीं सदी में यूजीन पी. ओडम को 'आधुनिक पारिस्थितिकी का जनक' माना गया, जिनकी पुस्तक 'फंडामेंटल्स ऑफ इकोलॉजी' ने पूरी दुनिया को पर्यावरण को एक 'सिस्टम' (पारिस्थितिक तंत्र) के रूप में देखना सिखाया।
भारत में आधुनिक पर्यावरण चेतना और पारिस्थितिकी के अध्ययन को स्थापित करने का श्रेय प्रोफेसर रामदेव मिश्रा को जाता है। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में पारिस्थितिकी के गहन शोध की नींव रखी। उनके अथक प्रयासों और वैज्ञानिक शोधों के कारण ही भारत सरकार ने 1972 में 'राष्ट्रीय पर्यावरण योजना एवं समन्वय समिति' का गठन किया, जो कालांतर में विकसित होकर 1984 में स्वतंत्र 'पर्यावरण एवं वन मंत्रालय' के रूप में सामने आया। प्रो. मिश्रा ने सिद्ध किया कि भारत के पारंपरिक ग्रंथ पर्यावरण विज्ञान के आधुनिक सिद्धांतों से पूरी तरह मेल खाते हैं।
सनातन वांग्मय में पर्यावरण चिंतन: वेद, पुराण और स्मृतियाँ में पाश्चात्य जगत ने पर्यावरण को बीसवीं सदी में समझना शुरू किया, परंतु भारत के ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व वेदों की ऋचाओं में प्रकृति को 'माता' और मानव को उसका 'पुत्र' घोषित कर दिया था। ऋग्वेद का यह शांति पाठ केवल मनुष्यों की शांति की कामना नहीं करता, बल्कि समूचे ब्रह्मांड और प्रकृति की शांति की प्रार्थना करता है: "द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः। वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वं शांतिः शांतिरेव शांतिः सा मा शांतिरेधी॥"
(अर्थात: आकाश, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, औषधियाँ, वनस्पतियाँ और संपूर्ण चराचर जगत शांत और प्रदूषण मुक्त रहे।) अथर्ववेद (भूमि सूक्त): इसमें ऋषि उद्घोष करते हैं— "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ)। एक पुत्र अपनी माता का केवल दोहन कर सकता है, शोषण नहीं। यजुर्वेद: इस वेद में वनस्पतियों और जंगलों को न काटने की सख्त हिदायत दी गई है, क्योंकि वे वायुमंडल को शुद्ध करने वाले मुख्य कारक हैं।।पुराणों में वृक्षारोपण को सबसे बड़ा पुण्य और मोक्ष का साधन बताया गया है। मत्स्य पुराण का यह श्लोक आधुनिक काल के किसी भी सामाजिक विमर्श से कहीं अधिक गहरा और प्रासंगिक है: "दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥" (अर्थात: दस कुओं के बराबर एक बावड़ी (बड़ा कुआं) होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब होता है, दस तालाबों के बराबर एक गुणवान पुत्र होता है; और दस पुत्रों के पालन-पोषण से जो पुण्य मिलता है, वह केवल एक वृक्ष लगाने और उसे बचाने से प्राप्त हो जाता है।)
पद्म पुराण: इस पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि जो मनुष्य सड़कों के किनारे, जलाशयों के पास छायादार और फलदार वृक्ष लगाता है, उसके लौकिक और पारलौकिक कष्ट स्वतः समाप्त हो जाते हैं। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और पराशर स्मृति जैसे ग्रंथों में पर्यावरण को क्षति पहुँचाने को 'महापाप' की श्रेणी में रखा गया है और इसके लिए कड़े सामाजिक व राजकीय दंड के प्रावधान थे। मनुस्मृति (11.142): बिना किसी वैध या अपरिहार्य कारण के हरे-भरे वृक्षों, लताओं और झाड़ियों को काटना दंडनीय अपराध माना गया है। इसके लिए व्यक्ति को उतनी ही क्षतिपूर्ति या प्रायश्चित करना पड़ता था, जितना किसी जीव को नुकसान पहुँचाने पर होता है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र: स्मृतियों के आधार पर रचित इस ऐतिहासिक ग्रंथ में वनों को 'अभयारण्य' और 'द्रव्यवन' के रूप में वर्गीकृत कर उनके संरक्षण के लिए विशेष अधिकारियों (वनपालों) की नियुक्ति का विधान था।
हमारे पूर्वज अत्यंत दूरदर्शी वैज्ञानिक थे। वे जानते थे कि यदि किसी सामान्य वृक्ष को केवल 'लकड़ी' माना जाएगा, तो मनुष्य अपने लालच में उसे काट देगा। इसलिए उन्होंने उन वृक्षों के औषधीय और पर्यावरणीय गुणों को पहचाना और उन्हें देवताओं के साथ जोड़कर 'पूजनीय' बना दिया। यहाँ कुछ प्रमुख पूजनीय वृक्षों और पौधों की पर्यावरणीय एवं धार्मिक देन का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है:
क्र.सं. वृक्ष/पौधा धार्मिक/सांस्कृतिक प्रतीक मुख्य पर्यावरणीय एवं औषधीय योगदान
1 पीपल (अश्वत्थ) साक्षात भगवान विष्णु का स्वरूप, वृक्षों के राजा। 24 घंटे ऑक्सीजन देने वाला एकमात्र विशाल वृक्ष। वायु शुद्धिकरण और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण में सर्वोत्तम।
2 बरगद (वट) भगवान शिव और ब्रह्मा का प्रतीक, 'अक्षयवट'। विशाल कार्बन सिंक (Carbon Sink)। हज़ारों पक्षियों व जीवों का आश्रय (Micro-Ecosystem)। भूजल स्तर बनाए रखता है।
3 तुलसी (वृंदा) साक्षात देवी स्वरूप, नारायण की प्रिया। प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर। बैक्टीरिया और वायरस नाशक। ओजोन निर्माण में सहायक।
4 आंवला (धात्री) माता लक्ष्मी और नारायण का वास। भारी धातुओं के प्रदूषण को सोखने में सक्षम। विटामिन-सी का सर्वोत्तम स्रोत (रोग प्रतिरोधक)।
5 पलाश (ढाक) 'ब्रह्मवृक्ष', त्रिदेवों का वास। शुष्क व बंजर भूमि को उपजाऊ बनाना। इसके फूलों से प्राकृतिक, रसायन-मुक्त रंग बनते हैं।
6 कदंब भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय क्रीड़ा वृक्ष। सघन छाया प्रदान करना। वर्षा की बूंदों के सीधे प्रहार से मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोकना। पाकर (प्लक्ष) पंचपल्लव में शामिल, यज्ञ की समिधा। धूल कणों को सोखना, सघन छाया और पक्षियों के घोंसलों के लिए अनुकूल वातानुकूलन। शक वृक्ष (साल/सागौन) वनों का रक्षक और सुदृढ़ता का प्रतीक। मानसून को आकर्षित करना, बादलों को बांधना और वनों के सघन घनत्व को बनाए रखना।
पीपल: प्राणवायु का अजस्र स्रोत वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध किया है कि पीपल का वृक्ष अपनी विशेष संरचना (Crassulacean Acid Metabolism - CAM) के कारण रात में भी ऑक्सीजन उत्सर्जित करने की क्षमता रखता है। इसके पत्तों का आकार ऐसा होता है कि यह हवा के हल्के झोंकों से भी कंपन करता है, जिससे इसके आस-पास का वायुमंडल लगातार गतिशील और शुद्ध रहता है।
एक परिपक्व बरगद का वृक्ष अपने आप में एक लघु वन (Mini Forest) के समान होता है। इसकी जटाएं जब ज़मीन में धंसती हैं, तो वे मिट्टी की पकड़ को इतनी मजबूती देती हैं कि भीषण बाढ़ में भी वहाँ की मिट्टी का कटाव नहीं होता। इसकी घनी पत्तियां सूर्य की पराबैंगनी किरणों के कुप्रभाव को धरती तक आने से रोकती हैं।
तुलसी: घरेलू डॉक्टर और वायु शोधक है।प्राचीन काल से हर घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाने की परंपरा के पीछे गहरा स्वास्थ्य विज्ञान है। तुलसी की पत्तियां हवा में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नष्ट करती हैं। इसके नियमित सेवन से मानव शरीर की श्वसन प्रणाली सुदृढ़ रहती है, जो वायु प्रदूषण के इस दौर में अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की धुरी: बिहार की ऐतिहासिक और आधुनिक भूमिका का जब हम भारत के संदर्भ में पर्यावरण के प्रति जन-आंदोलन और नीतिगत निर्णयों की समीक्षा करते हैं, तो बिहार राज्य की भूमिका अत्यंत गौरवशाली और पथप्रदर्शक के रूप में उभरती है।
बिहार की पावन भूमि जैन तीर्थंकरों और भगवान बुद्ध की कर्मभूमि रही है। बोधिवृक्ष का संदेश: सिद्धार्थ ने बोधगया में एक पीपल (बोधिवृक्ष) के नीचे ही कठिन तपस्या कर 'बुद्धत्व' प्राप्त किया था। यह घटना पूरी दुनिया को संदेश देती है कि सर्वोच्च ज्ञान और शांति की प्राप्ति प्रकृति की शरण में ही संभव है। जैन और बौद्ध दर्शन का 'अहिंसा' का सिद्धांत केवल मानव मात्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सूक्ष्म जीवों, पेड़-पौधों और नदियों के प्रति भी उतनी ही करुणा की बात करता है। सम्राट अशोक के राजकीय प्रयास: मगध के महान सम्राट अशोक ने अपने स्तंभों और शिलालेखों में पशु-पक्षियों के शिकार पर प्रतिबंध लगाने, सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगाने और कुएं खुदवाने के जो आदेश उत्कीर्ण करवाए, वे वैश्विक इतिहास में पर्यावरण संरक्षण के सबसे पहले राजकीय लिखित दस्तावेज हैं।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से त्रस्त है, बिहार सरकार द्वारा संचालित 'जल-जीवन-हरियाली' मिशन पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बन चुका है। पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार: इस योजना के तहत राज्य के प्राचीन आहर, पईन, पोखर, कुओं और तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराकर उनका जीर्णोद्धार किया जा रहा है। इसके अंतर्गत करोड़ों की संख्या में किए गए वृक्षारोपण के फलस्वरूप बिहार का हरित क्षेत्र (Green Cover) तेजी से बढ़ा है, जिसने गिरते भूजल स्तर (Water Table) को थामने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस अभियान का मूल मंत्र है— "जल और हरियाली है, तभी जीवन सुरक्षित है।" बिहार के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन की रीढ़ माँ गंगा है। 'नमामि गंगे' परियोजना (जिसके दूसरे चरण के कार्य वर्तमान समय में अत्यंत सक्रियता से चल रहे हैं) के अंतर्गत बिहार में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं।। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के निर्माण के साथ-साथ नदियों के किनारों पर व्यापक वनीकरण किया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें स्थानीय युवाओं और समाजसेवियों को 'गंगा दूतों' के रूप में जोड़कर इसे एक सरकारी योजना से बदलकर जन-आंदोलन बना दिया गया है।
भागलपुर का 'विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य' इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जहाँ भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव (गांगेय डॉल्फिन) का संरक्षण स्थानीय मछुआरों और समाज के सहयोग से किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त बेगूसराय की 'कावर झील' (रामसर साइट) और वाल्मीकि टाइगर रिजर्व बिहार की समृद्ध जैव-विविधता के जीवंत केंद है। बिहार की धरती पर चेतना की कमी कभी नहीं रही। 'सच्चिदानंद शिक्षा एवं समाज कल्याण संस्थान' और 'जीवनधारा नमामि गंगे' जैसी सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाएँ ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरों तक पर्यावरण की अलख जगा रही हैं। स्थानीय विचारकों, अवकाशप्राप्त शिक्षकों, पत्रकारों और पर्यावरणविदों की लेखनी, संगोष्ठियों और ज़मीनी वृक्षारोपण कार्यक्रमों ने पर्यावरण को आम आदमी के चूल्हे-चौके और विमर्श से जोड़ दिया है।
विश्व पर्यावरण दिवस और हमारे सनातन ग्रंथों का गहन अध्ययन हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि पर्यावरण का संकट कोई बाहरी संकट नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के लालच का परिणाम है। ईशोपनिषद का पहला ही मंत्र कहता है:"तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"(अर्थात: इस प्रकृति में जो कुछ भी है, उसका त्याग पूर्वक उपभोग करो, लालच मत करो क्योंकि यह धन किसी एक का नहीं है।)।प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने जिन बरगद, पीपल, तुलसी और आंवले को पूजा, आज आधुनिक विज्ञान भी उनके आगे नतमस्तक है। नीतियों का निर्माण वैश्विक सम्मेलनों में होता है, लेकिन उनका क्रियान्वयन हमारे अपने आंगन, हमारे अपने गाँव और हमारी अपनी सोच से होता है।। पर्यावरण विमर्श के माध्यम से हम सब यह संकल्प लें कि हम जल का अपव्यय रोकेंगे, एकल-उपयोग प्लास्टिक (Single-use Plastic) का पूर्ण बहिष्कार करेंगे, अपनी नदियों को गंदा नहीं करेंगे और अपने जीवन के प्रत्येक मांगलिक अवसर (जन्मदिन, पुण्यतिथि या उत्सव) पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएंगे और उसे एक पुत्र की भांति पालकर वृक्ष बनाएंगे। तभी हमारी यह वसुंधरा हरी-भरी और सुरक्षित रह पाएगी और हमारी आने वाली पीढ़ी एक शुद्ध, स्वच्छ और दीर्घायु जीवन जी सकेगी।"वृक्षो रक्षति रक्षितः" — जो वृक्ष की रक्षा करता है, वृक्ष उसकी रक्षा करता है।
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