डिजिटल युग में बढ़ता एकाकीपन📱☎️
डॉ.अनिता देवीहाथों में दुनिया सिमट गई,
पर दिलों की दूरी बढ़ती गई,
स्क्रीन की चमक में खोकर,
अपनों की हँसी कहीं छूटती गई।
सैकड़ों मित्र हैं सूची में,
फिर भी मन क्यों उदास है,
भीड़ भरी इस आभासी दुनिया में,
हर चेहरा कितना निराश है।
संदेशों की झड़ी लगती है,
पर अपनापन कम मिलता है,
दो मीठे बोल जो सामने मिलते थे,
अब उनका स्वर भी खोता जाता है।
माँ की बातें, दादी की कहानी,
आँगन की वह प्यारी रवानी,
मोबाइल की कैद में आकर,
बन गई जैसे बीती निशानी।
डिजिटल युग का यह उपहार,
ज्ञान और सुविधा का संसार,
पर रिश्तों की गर्माहट भी रखिए,
यही जीवन का सच्चा आधार।
आओ फिर से हाथ थाम लें,
कुछ पल अपनों के नाम करें,
तकनीक रहे जीवन का साधन,
पर प्रेम को अपना धाम करें।
क्योंकि इंसान की असली दौलत,
न लाइक है, न कोई पहचान,
सच्चे रिश्ते, सच्चा अपनापन,
यही है जीवन का सम्मान।॥
लेखिका डॉ.अनिता देवी शिक्षिका जिला पूर्वी चंपारण बिहार
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