क्या हमारे नेता इतिहास के प्रति संवेदनशीलता खोते जा रहे हैं?
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
देश का नागरिक होने के नाते आज एक गंभीर प्रश्न मन में उठता है। क्या हमारे राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इतिहास को तथ्यों के आधार पर देख रहे हैं, या उसे तत्कालीन राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार परिभाषित करने लगे हैं?
कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन को लेकर वर्षों से उपलब्ध तथ्य, पीड़ितों की गवाही और ऐतिहासिक दस्तावेज़ एक दर्दनाक सच्चाई की ओर संकेत करते हैं। ऐसे में यदि कोई उच्च संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति यह कहे कि इसके लिए स्थानीय लोग नहीं, बल्कि बाहरी लोग जिम्मेदार थे, तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे।
इसी प्रकार, जब अंग्रेजों ने भारत को लगभग दो शताब्दियों तक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से क्षति पहुँचाई, लाखों भारतीयों ने स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिए, तब यदि यह कहा जाए कि आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों का भी योगदान था, तो यह कथन भी व्यापक बहस और असहजता पैदा करता है।
समस्या किसी एक नेता या दल की नहीं है। समस्या यह है कि क्या हम धीरे-धीरे इतिहास को उसकी वास्तविकता से अलग करके प्रस्तुत करने लगे हैं? क्या राजनीतिक सुविधा अब ऐतिहासिक सत्य से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है?
राष्ट्र का निर्माण सत्य पर होता है, सुविधाजनक कथाओं पर नहीं। कश्मीरी पंडितों का दर्द हो, विभाजन की त्रासदी हो या स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास—इन सबका मूल्यांकन ईमानदारी से होना चाहिए। इतिहास को बदलने का प्रयास करने वाले क्षणिक राजनीतिक लाभ तो पा सकते हैं, लेकिन वे समाज के विश्वास को कमजोर करते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता में हो या विपक्ष में, नेता इतिहास के प्रति बौद्धिक ईमानदारी दिखाएँ। क्योंकि जब सत्य ही विवादित बना दिया जाता है, तब राष्ट्र की सामूहिक स्मृति और भविष्य दोनों संकट में पड़ जाते हैं।
इतिहास को सजाया जा सकता है, लेकिन बदला नहीं जा सकता। सत्य को दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता।
लेखक डॉ. राकेश दत्त मिश्र दिव्य रश्मि के सम्पादक है |
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