सतरंगी बचपन
सत्येन्द्र कुमार पाठक
"किसी समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसके बच्चे होते हैं, और उन बच्चों के मानसिक व नैतिक विकास की सबसे मजबूत आधारशिला बाल साहित्य है।" बाल साहित्य केवल मनोरंजन या अक्षरों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह वह मार्गदर्शक है जो किसी बच्चे को पहली बार दुनिया की जटिलताओं, मानवीय मूल्यों, विज्ञान के चमत्कारों और अपनी संस्कृति से बेहद सरल और रोचक तरीके से परिचित कराता है। यह वह साहित्य है जो बच्चों के मानसिक स्तर, उनकी असीम रुचि, अकल्पनीय कल्पनाशीलता और बाल मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर रचा जाता है। इसका मूल उद्देश्य बालकों का स्वस्थ मनोरंजन करने के साथ-साथ उनमें नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवन-कौशल विकसित करना होता है।
बाल साहित्य की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि इंसानी सभ्यता। समय के साथ इसके स्वरूप में बड़े बदलाव आए हैं, जिन्हें हम दो मुख्य चरणों में देख सकते हैं। प्रारंभ में बाल साहित्य का प्रसार लिखित रूप में न होकर मौखिक रूप में हुआ। यह दादी-नानी की कहानियों, रात्रिकालीन लोरियों और स्थानीय लोकगीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। भारत की समृद्ध परंपरा में 'पंचतंत्र', 'हितोपदेश' और 'जातक कथाएं' इसी मौखिक और लोक परंपरा की अनमोल देन हैं। इन कहानियों में पशु-पक्षियों और प्रकृति को माध्यम बनाकर बच्चों को नीति और चतुराई की बातें सिखाई जाती थीं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
वैश्विक संदर्भ: आधुनिक रूप में बाल साहित्य का उदय 18वीं शताब्दी में यूरोप में हुआ। लंदन के प्रसिद्ध प्रकाशक जॉन न्यूबेरी को बाल साहित्य का जनक माना जाता है, जिन्होंने पहली बार व्यावसायिक और रचनात्मक रूप से बच्चों के लिए विशेष पुस्तकें छापना शुरू किया। हिन्दी बाल साहित्य की शुरुआत: हिन्दी में बाल साहित्य की औपचारिक शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित और 1882 में प्रकाशित 'बाल दर्पण' पत्रिका से मानी जाती है। इसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में 'बालसखा' जैसी युगांतरकारी पत्रिका का प्रकाशन हुआ। आगे चलकर 'वानर', 'मनमोहन', 'चंदामामा', 'नंदन', 'चंपक' और 'पराग' जैसी पत्रिकाओं ने हिन्दी बाल साहित्य को हर घर के ड्राइंग रूम और बच्चों के दिलों तक पहुँचाया।
साहित्य के संदर्भ में 'अवधान' का अर्थ योगदान या विशेष ध्यान केंद्रित करना है। बाल साहित्य लिखना किसी वयस्क के लिए गंभीर साहित्य रचने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बाल साहित्यकारों के अवधान और इसकी मूल अवधारणा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: बाल साहित्य की सबसे बड़ी शर्त यह है कि लेखक को अपनी उम्र, अनुभव और 'बड़प्पन के अहंकार' को छोड़कर पूरी तरह से बच्चे के दृष्टिकोण और उसकी मासूम कल्पना के स्तर पर उतरना पड़ता है। "बच्चे की आँख से दुनिया को देखना" ही बाल साहित्य का मूल मंत्र है। सहज, सरल और संगीतात्मक भाषा विधा के लेखकों का सबसे बड़ा योगदान इसकी भाषा को बोधगम्य बनाना रहा है। यहाँ वाक्य छोटे होते हैं, शब्द-विन्यास आसान होता है और भाषा में एक आंतरिक लय या संगीतात्मकता होती है, जिससे बच्चा पढ़ते समय जुड़ाव महसूस करे। : बाल साहित्य मनोरंजन और शिक्षा का एक अनूठा मिश्रण है। बच्चे स्वभाव से विद्रोही और जिज्ञासु होते हैं; उन्हें सीधे उपदेश (जैसे- "सदा सत्य बोलो") पसंद नहीं आते। इसलिए, लेखक कहानियों, कविताओं और रूपकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से उनके अवचेतन मन में अच्छी बातें रोपित करते हैं।
आज का बाल साहित्य बहुआयामी हो चुका है। बच्चों की विभिन्न रुचियों को ध्यान में रखते हुए इसे कई विधाओं में विभाजित किया जा सकता है: बाल कविता एवं लोरियाँ में तुकबंदी, लयबद्धता और सहज संगीत। भाषाई क्षमता का विकास और याददाश्त को मजबूत करना। बाल कहानी व लघुकथा रोचक पात्र (पशु, जासूस, राजा-रानी या आम बच्चे)। कल्पनाशीलता, तार्किकता और निर्णय लेने की क्षमता का विकास।।विज्ञान कथाएँ अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, भविष्य की तकनीक पर आधारित। अंधविश्वास से मुक्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण या कौतूहल जगाना। बाल नाटक व एकांकी संवादात्मक शैली और मंचन योग्य। बच्चों में आत्मविश्वास, टीम वर्क और अभिव्यक्ति की कला का विकास। आधुनिक विधाएँ (जैसे हाइकु) कम शब्दों (जैसे जापानी विधा हाइकु) में बड़ी बात कहना। संक्षिप्तता और गहरी सोच को बढ़ावा देना है।
आज का युग डिजिटल युग है, जहाँ बचपन स्मार्टफोन की स्क्रीन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया रील्स के चक्रव्यूह में फँस गया है। ऐसे समय में बाल साहित्य की महत्ता और आवश्यकता कई गुना बढ़ गई है ।
अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी पैदा कर रहा है। किताबें पढ़ने से बच्चों के मस्तिष्क में न्यूरॉन्स का बेहतर विकास होता है, जिससे उनकी एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। संस्कार और सामाजिक सरोकार में एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण आज बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का सान्निध्य नहीं मिल पा रहा है, जो कभी लोककथाओं के माध्यम से संस्कार देते थे। बाल साहित्य इस खालीपन को भरता है और बच्चों को सहानुभूति, सहिष्णुता, साहस और पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्य सिखाता है। जिज्ञासा और तर्कशक्ति को धार में बाल साहित्यकार बच्चों के भीतर छिपे "क्यों, कहाँ, कैसे" जैसे प्रश्नों को दबाते नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देकर उनकी जिज्ञासा और तर्कशक्ति को बढ़ाते हैं।
वर्तमान में बाल साहित्य के क्षेत्र में कई सराहनीय और प्रगतिशील कदम उठाए जा रहे हैं। मातेश्वरी विद्या देवी बाल साहित्य शोध संस्थान सिरसा , हरियाणा की अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन के संरक्षक संस्थापक राजकुमार निजात और जयपुर राजस्थान से हिंदी मासिक बच्चों का देश ' के संपादक संजय जैन , हरियाणा के त्रिलोक चंद फतेहपुरी की पुस्तक बाल सौरभ , तेलगाना के प्रसाद राव जामी की संपादित बाल साहित्य , दरभंगा , बिहार के सतीश चंद्र भगत , मुजफ्फरपुर , बिहार के डॉ ऊषा श्रीवास्तव की बज्जिका भाषा m बज्जिका बाल कविता संरक्ष जैसे प्रबुद्ध चिंतकों व संस्थाओं द्वारा इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। आज के नए और स्थापित बाल साहित्यकारों को न केवल पारंपरिक विधाओं, बल्कि बाल कहानी, नाटक, कविताओं, हाइकु, एकांकी और लघुकथाओं पर लिखने के लिए निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो कि बाल साहित्य के विकास का एक अत्यंत स्वागत योग्य कदम है। : आज की पीढ़ी 'डिजिटल नेटिव' है। हमें बाल साहित्य को केवल कागज़ की किताबों तक सीमित न रखकर ई-बुक्स , ऑडियो बुक्सऔर सचित्र एनिमेटेड कॉमिक्स के रूप में भी प्रस्तुत करना होगा। : आज के बच्चे को केवल राजा-रानी या परियों की कहानियों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उन्हें साइबर सुरक्षा, कोडिंग, जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य जैसे समकालीन विषयों पर उनकी भाषा में साहित्य चाहिए।
बाल साहित्य केवल बचपन का मनोरंजन करने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक प्रबुद्ध, संवेदनशील और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। एक अच्छा बाल साहित्यकार बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त और उनका अनौपचारिक शिक्षक होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं से लेकर पारिवारिक स्तर तक बाल पत्रिकाओं और पुस्तकों को अनिवार्य रूप से पहुँचाया जाए। जब बच्चों के हाथों में गैजेट्स की जगह रंग-बिरंगी, ज्ञानवर्धक और कल्पनाशीलता से भरी किताबें होंगी, तभी हमारा बचपन सुरक्षित, समृद्ध और सतरंगी बना रहेगा।
करपी , अरवल , बिहार 804419
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