"पात्रता का शून्य"
पंकज शर्माभीतर एक आदिम जिज्ञासा
अब भी धीमे-धीमे सुलगती है।
क्या यह आकाश,
ये नक्षत्र,
यह दीप्त विस्तार—
सिर्फ इसलिए मेरे हैं
कि मैं इन्हें देख सकता हूँ?
या दृश्य होना मात्र,
किसी अधिकार का प्रमाण नहीं?
कौन जाने,
यह सम्मोहक चमक
किसी विराट उदासीनता का आवरण हो,
और मैं उसे अर्थ समझता रहूँ।
चाहत की कोई ज्यामिति नहीं होती।
मन एक अनियंत्रित वेग है,
जो हर बार
अप्राप्य क्षितिजों की ओर भागता है।
पर अनंत का विस्तार
किसी प्रतिज्ञा पर नहीं चलता।
वहाँ न मंज़िलें आश्वस्त करती हैं,
न रास्ते संकेत देते हैं।
शायद मयस्सर होना ही
अस्तित्व का नियम नहीं।
और अभाव,
सृष्टि की मौन व्याकरण का
एक अनिवार्य शब्द है।
यह ज़िद,
जिसे मैं अपना स्वभाव कहता हूँ,
शायद मेरे अहं का ही
एक सूक्ष्म विस्तार है।
सृष्टि का कोई हृदय नहीं
जो द्रवित हो जाए।
नियति के कोई कान नहीं
जो पुकार सुन सकें।
मैं जिसे अपना केंद्र मानता हूँ,
वह इस असीमता में
धूल के एक कण से भी
कम निर्णायक है।
फिर भी,
मेरी व्यथा मुझे
अपरिमेय लगती है।
पसंद और अधिकार के बीच
जो रिक्त स्थान है,
वहीं मनुष्य का वास्तविक निवास है।
कर्म चलते-चलते थक जाते हैं।
पात्रता
अपने ही प्रमाण ढूँढ़ते-ढूँढ़ते
लहूलुहान हो जाती है।
और समय—
वह न न्यायाधीश है,
न सहयात्री।
वह केवल देखता है।
परिस्थितियों के चक्रव्यूह में
इच्छा की अकेली शक्ति
किसी सत्य को जन्म नहीं देती।
मैं स्वयं से पूछता हूँ,
इस गहन एकांत में—
क्या पात्रता
सिर्फ एक सांत्वना है?
क्या योग्य होना
प्राप्ति का दूसरा नाम है?
या फिर
पाने और खोने के पार भी
कोई अनाम व्यवस्था है,
जो बिना घोषणा के काम करती है?
जिसका कोई चेहरा नहीं,
कोई आरंभ नहीं,
कोई अंतिम स्पष्टीकरण नहीं।
यदि चाहने से सब मिल जाता,
तो संतुलन कब का टूट चुका होता।
शायद अधूरी इच्छाएँ ही
इस संसार को टिकाए हुए हैं।
मंज़िल तक न पहुँच पाना,
हमेशा विफलता नहीं होता।
कभी-कभी वह संकेत है
कि कथा का केंद्र
हमारी कामना नहीं।
हम सब शायद
किसी अज्ञात नाटक के पात्र हैं,
जिसकी पटकथा
हमारी समझ से बाहर लिखी गई है।
जहाँ हर हार
एक नया प्रश्न छोड़ जाती है।
और हर अनकही नापसंदगी
भीतर एक और द्वार खोल देती है।
जिसके पार
उत्तर नहीं,
केवल और गहरा होता हुआ
स्वयं का शून्य है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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