कालचक्र की गोद में खटांगी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
इतिहास केवल धूल-धूसरित तारीखों का बेजान पुलिंदा नहीं होता, बल्कि वह उन जीवंत बदलावों की महागाथा है, जिसे किसी भूमि ने सदियों से अपनी छाती पर झेला और संजोया है। बिहार का मगध क्षेत्र वैसे भी ज्ञान, अध्यात्म, दर्शन और अद्वितीय पराक्रम की आदि-भूमि रहा है। इसी मगध के आंचल में, वर्तमान अरवल जिले की सीमा पर बसा एक छोटा सा गाँव खटांगी (जिसका प्राचीन नाम खंटबार या खंडवार पुर है) आज भी कालचक्र की गति को चुनौती देता हुआ खड़ा है। यह कोई साधारण कस्बा नहीं, बल्कि एक ऐसा ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कोलाज है, जिसका वजूद किसी एक कालखंड की बपौती नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज के इस आधुनिक सूचना क्रांति के युग तक की अविरल यात्रा का जीवंत गवाह है। नेरा और पुनपुन जैसी पवित्र नदियों के दोआब में फला-फूला यह क्षेत्र भारत के पौराणिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा पन्ना है, जिसे जितनी बार पलटो, उतनी ही नई अनुभूतियाँ सामने आती हैं। यह संस्मरण उसी खटांगी की मिट्टी की महक, उसके संघर्ष, और उसकी आत्मा में रची-बसी सूर्य उपासना के वैभव की एक यात्रा है।
: सौर साधना और ऋषियों की आदिभूमि में भारतीय वांग्मय और सनातन परंपरा समय की गति को चार युगों में विभाजित करती है। अचरज की बात यह है कि खटांगी के लोक-मानस और पुरातात्विक साक्ष्यों में इन चारों युगों की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार, सतयुग और त्रेता के दौर में जब मानव सभ्यता भौतिकता से दूर आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छू रही थी, तब मगध का यह कोना 'तपोभूमि' के रूप में विख्यात था। यहाँ घने जंगलों के बीच, कल-कल करती नदियों के किनारे ऋषि-मुनि कुटिया बनाकर ब्रह्म साधना किया करते थे। यह वह काल था जब मनुष्य ने प्रकृति के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया था।
वैदिक कालखंड के बाद, भारत के धार्मिक क्षितिज पर एक अभूतपूर्व बदलाव आया—'सौर संप्रदाय' यानी सूर्य की प्रत्यक्ष और सगुण उपासना का उभार। इसी दौर में सुदूर क्षेत्रों से शाकद्वीपीय या मग ब्राह्मण ऋषियों का आगमन मगध की इस भूमि पर हुआ। इन सौर ऋषियों ने नेरा और पुनपुन नदी के पावन संगम और इसके आस-पास की शांत पट्टी को अपनी मुख्य साधना स्थली के रूप में चुना। स्थानीय जनश्रुतियों और भाषाई इतिहास के अनुसार, इस स्थल का प्राचीन नाम 'खनटवार' या 'खंडवार पुर' पड़ने के पीछे भी यही गहरा रहस्य है। सौर ऋषियों ने सूर्य की रश्मियों (किरणों) के संचयन, उनके वैज्ञानिक प्रभाव के अध्ययन और ध्यान के लिए यहाँ एक विशेष केंद्र या 'खंड' स्थापित किया था। यही कारण था कि इन ऋषियों को 'सौर ऋषि' या 'मग ऋषि' कहा गया। उन्होंने प्रकृति के पांच तत्वों को मिलाकर यहाँ सूर्य साधना की जो नींव रखी, वह आज भी इस गाँव की रगों में दौड़ रही है।
जब समय ने करवट ली और द्वापर युग का आगमन हुआ, तब मगध की गद्दी पर पराक्रमी सम्राट जरासंध का शासन था। उस दौर में भी इस क्षेत्र के प्राचीन 'खटांगी गढ़' की सामरिक और धार्मिक महत्ता बनी हुई थी। लोक-कथाओं और पौराणिक आख्यानों (भविष्य पुराण) में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब को जब दुर्वासा ऋषि के श्रापवश कुष्ठ रोग हो गया था, तब उन्होंने सूर्य उपासना के जरिए ही इस असाध्य रोग से मुक्ति पाई थी। साम्ब की इस सौर चेतना से प्रभावित होकर, हिरण्य प्रदेश (प्राचीन मगध और सोन नदी के आस-पास का स्वर्ण-भूमि क्षेत्र) के तत्कालीन राजाओं ने खटांगी गढ़ के शासकों के साथ मिलकर यहाँ के मुख्य उपासना केंद्र में भगवान सूर्य की एक अत्यंत भव्य विग्रह (मूर्ति) स्थापित करवाई थी। कुछ क्षेत्रीय कथाओं में सूर्यवंशी राजा सुद्युम्न और सत्रोजित का संबंध भी इस आदि-स्थापना से जोड़ा जाता है।
जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, इतिहास पौराणिक कथाओं के कुहासे से निकलकर लिखित और पुरातात्विक साक्ष्यों के ठोस धरातल पर उतरा। खटांगी और इसके आस-पास का अरवल क्षेत्र तब सीधे भारत की महासत्ता के केंद्र बिंदु यानी पाटलिपुत्र और राजगृह के प्रभाव क्षेत्र में आ गया।
मगध साम्राज्य के उत्कर्ष के दौरान, विशेषकर मौर्य काल में, यह क्षेत्र न केवल राजनीति बल्कि कला, संस्कृति और अद्वितीय वास्तुकला का गढ़ बन गया। मौर्यकालीन शिल्पकारों ने पत्थरों को जीवंत करने की जो अनूठी तकनीक (ओपदार पॉलिश) विकसित की थी, उसका सीधा और साक्षात प्रमाण खटांगी में मिलता है।
आज खटांगी के आधुनिक सूर्य मंदिर के गर्भगृह में जो काले पत्थर की, सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान भास्कर की प्रतिमा स्थापित है, वह मौर्यकालीन स्थापत्य कला का एक अप्रतिम और बेजोड़ उदाहरण है। यह वही विग्रह है जो बाद में खटांगी गढ़ की खुदाई से प्राप्त हुआ। मूर्ति की बनावट, घोड़ों की गतिशीलता और सूर्य देव के चेहरे का तेज देखकर सहसा ही मौर्य साम्राज्य के उस वैभवशाली दौर की याद आ जाती है, जब कला केवल शौक नहीं, बल्कि ईश्वर को धरती पर उतारने का माध्यम थी।
भारत के 'स्वर्ण युग' यानी गुप्त काल में जब सनातन धर्म और हिंदू मंदिरों का राष्ट्रव्यापी पुनरुद्धार हुआ, तब खटांगी के प्राचीन गढ़ और यहाँ के उपासना केंद्रों को गुप्त शासकों का विशेष धार्मिक और आर्थिक संरक्षण मिला। इसके बाद, मध्यकाल की शुरुआत से ठीक पहले जब बिहार पर पाल वंश का शासन था—जो बौद्ध और हिंदू दोनों कलाओं के समान संरक्षक थे—तब भी यह सीमावर्ती क्षेत्र अपनी धार्मिक विशिष्टता के कारण फलता-फूला रहा। पाल काल के बाद आए सेन राजवंश के समय भी इस क्षेत्र की सामंतशाही और धार्मिक संरचनाएं सुरक्षित रहीं, जिससे खटांगी गढ़ एक समृद्ध सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहा
इतिहास का पहिया हमेशा एक जैसा नहीं रहता। मध्यकाल के आगमन के साथ ही भारत राजनीतिक उथल-पुथल के एक लंबे दौर में दाखिल हो गया, जिसने मगध की इस पावन भूमि के भूगोल और इतिहास को बुरी तरह प्रभावित है। मुगलकाल और उसके पूर्ववर्ती सुल्तानों के दौर में दिल्ली, जौनपुर और बंगाल के बीच होने वाले सैन्य अभियान और व्यापारिक मार्ग मगध के इन्हीं मैदानी इलाकों से होकर गुजरते थे। निरंतर होने वाले युद्धों, बाहरी आक्रमणों और स्थानीय राजनीतिक अस्थिरता के कारण कई प्राचीन किले, मठ और धार्मिक केंद्र नष्ट कर दिए गए या देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील हो गए। समय के इसी क्रूर थपेड़े में खटांगी का वह प्राचीन और वैभवशाली गढ़ (खंटबार स्थल) भी धीरे-धीरे मिट्टी के टीले में तब्दील होकर जमींदोज हो गया। इतिहास के पन्नों पर धूल जम गई, लेकिन जन-चेतना में वह कहानी कभी मरी नहीं। ब्रिटिश काल: के औपनिवेशिक शासनकाल में यह क्षेत्र प्रशासनिक रूप से पहले गया और बाद में जहानाबाद जिले का हिस्सा बना। लेकिन इसी ब्रिटिश काल के दौरान (आज से लगभग 200 साल पहले) एक ऐसी चमत्कारिक घटना घटी, जिसने खटांगी के इतिहास को दोबारा जीवित कर दिया। स्थानीय ग्रामीणों को प्राचीन खटांगी गढ़ के एक ऊंचे टीले की सामान्य खुदाई (उत्खनन) के दौरान वही मौर्यकालीन अति-प्राचीन काले पत्थर की सूर्य प्रतिमा पुनः प्राप्त हुई। जब मिट्टी की परतों के नीचे से सात घोड़ों वाले रथ पर सवार भगवान सूर्य की वह दिव्य मूरत बाहर निकली, तो मानो पूरे गाँव के सामूहिक रोंगटे खड़े हो गए। ग्रामीणों और इलाके के बुजुर्गों ने सर्वसंख्या से निर्णय लिया कि इस पावन विग्रह को नेरा नदी के सुरम्य तट पर, एक विशाल और प्राचीन पीपल के पेड़ के नीचे पुनर्स्थापित किया जाए। इस एक घटना ने पूरे मगध क्षेत्र में एक बार फिर से सोई हुई सौर चेतना को जगा दिया और यह निर्जन किनारा दोबारा जन-आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभर आया।
आधुनिक युग खटांगी के लिए एक नए और सुनहरे सवेरे जैसा साबित हुआ है, जहाँ उसकी प्राचीन, लुप्तप्राय विरासत को आधुनिक श्रद्धा और पुरुषार्थ का ठोस संबल मिला है। प्रशासनिक और भौगोलिक विकास की सुगमता को देखते हुए, 20 अगस्त 2001 को जहानाबाद से अलग कर अरवल को एक स्वतंत्र जिला बनाया गया। इस प्रशासनिक पुनर्गठन से सोनभद्र-वंशी-सूर्यपुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले इस ऐतिहासिक खटांगी गाँव के विकास को एक नई और तेज गति मिली। हालांकि, अतीत के कुछ दशकों में यह पूरा इलाका गंभीर सामाजिक उथल-पुथल और नक्सल प्रभाव से जूझता रहा, लेकिन अपनी मजबूत सांस्कृतिक रीढ़ और धार्मिक आस्था के कारण इस गाँव ने अपनी सकारात्मक और शांत पहचान को कभी धुंधला नहीं पड़ने दिया।
ग्रामीणों, स्थानीय प्रबुद्ध जनों और देश-विदेश में फैले सौर भक्तों के सामूहिक और अनवरत सहयोग से आज उसी पीपल के पेड़ वाले ऐतिहासिक स्थल पर 108 फीट ऊँचा गगनचुंबी भव्य सूर्य मंदिर सीना ताने खड़ा है। यह आधुनिक वास्तुकला और प्राचीन श्रद्धा का एक अद्भुत संगम है। मंदिर का गगनचुंबी शिखर दूर से ही देखने वालों को अपनी ओर आकर्षित करता है। जब सुबह की पहली किरण इस मंदिर के कलश को छूती है, तो ऐसा लगता है मानो भगवान सूर्य स्वयं अपनी इस प्राचीन तपोभूमि को आशीर्वाद दे रहे हों। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित उस प्राचीन मौर्यकालीन मूर्ति की चमक और ओप आज भी वैसी ही बनी हुई है, जो यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध और सम्मोहित कर देती है।
सर्व-समावेशी सांस्कृतिक पहचान में खटांगी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा। यहाँ पांच प्रमुख सनातनी धाराओं और प्रकृति पूजा का अद्भुत समन्वय मिलता है:
सौर संस्कृति का शाकद्वीपीय (मग) ब्राह्मणों के आगमन के बाद यह क्षेत्र 'खंडवार पुर' कहलाया। यहाँ सूर्य की किरणों की ऊर्जा को संचित करने और स्वास्थ्य लाभ (विशेषकर कुष्ठ रोगों से मुक्ति) के लिए वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान होते थे। शाक्त एवं ब्रह्म संस्कृति: ऋषियों की तपोभूमि होने के कारण यहाँ आदि-शक्ति और ब्रह्म-साधना की जड़ें बेहद गहरी थीं। शैव एवं वैष्णव समन्वय: द्वापर युग में भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब और मगध नरेश जरासंध (जो शिव भक्त था) के काल में यह क्षेत्र दोनों संस्कृतियों के प्रभाव में रहा। जल एवं वृक्ष संस्कृति: नेरा और पुनपुन जैसी पवित्र नदियों के जल को 'अमृत' मानकर उसकी पूजा करना तथा पीपल जैसे विशाल वृक्षों को चेतना का केंद्र मानना यहाँ की आदिम और अक्षुण्ण स
खटांगी के इस विराट इतिहास को गढ़ने में यहाँ की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह भूमि केवल सूखी मिट्टी नहीं, बल्कि नदियों के आंचल से सिंचित एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) है। प्राचीन खंटबार / खटांगी गढ़ पुराणों के अनुसार कीकट आधुनिक नाम पुनपुन नदी की उपधारा मेरा नदी है । पुनपुन नदी (प्राचीन कीकट): मगध की प्राचीन और पवित्रतम नदियों में से एक, जिसे पुराणों में 'कीकट' के नाम से भी संबोधित किया गया है। यह नदी इस पूरे क्षेत्र की कृषि, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की वास्तविक जीवन रेखा है। नेरा नदी: पुनपुन की ही एक पावन उपधारा—नेरा नदी के शांत और मनोरम तट पर ही खटांगी का यह ऐतिहासिक सूर्य मंदिर स्थित है। इस नदी का निर्मल जल और इसके किनारे निर्मित पवित्र सूर्यकुंड सदियों से छठ व्रतियों और साधकों को अपनी ओर खींचता रहा है।
खंटबार स्थल (खटांगी गढ़): वह ऐतिहासिक टीला है, जिसके गर्भ में सतयुग के ऋषियों की समाधि से लेकर मौर्यकाल के राजाओं का वैभव और मध्यकाल की उथल-पुथल दफन थी। इसी गढ़ की कोख से निकली सूर्य प्रतिमा आज इस गाँव की धड़कन और आत्मा है।
वर्तमान में खटांगी केवल एक ऐतिहासिक धरोहर ही नहीं, बल्कि बिहार के ग्रामीण परिवेश का एक जीवंत और प्रगतिशील हिस्सा भी है।।अरवल जिले का सोनभद्र वंशी सूर्यपुर प्रखंड के खटांगी पंचायत में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 8.54 वर्ग किलोमीटर , कुल आबादी (2011 जनगणना) 5,609 ,पुरुष जनसंख्या 2,934 , महिला जनसंख्या 2,675 है। मुख्य सांस्कृतिक उत्सव चैती छठ और कार्तिक छठ महापर्व (लाखों श्रद्धालुओं का आगमन) है। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी जितनी प्रचुरता से अनाज उपजाती है, यहाँ की सात्विक संस्कृति उतनी ही प्रगाढ़ता से लोगों के दिलों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास उपजाती है। आज भी जब कार्तिक और चैत के महीने में यहाँ लोक आस्था का महापर्व 'छठ' आता है, तो खटांगी की सीमाएं छोटी पड़ जाती हैं। नेरा नदी के घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं की भीड़, गूंजते हुए पारंपरिक छठ गीत और अस्ताचलगामी तथा उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देते लोग इस बात का साक्षात प्रमाण पेश करते हैं कि सदियों पुराना वह 'सौर संप्रदाय' आज भी इस आधुनिक दौर में पूरी तरह जीवंत और प्रासंगिक है।सतयुग की अमूर्त आध्यात्मिक कल्पनाओं से अपनी यात्रा शुरू करके, द्वापर के साम्ब काल से गुजरते हुए, मौर्यकाल के चमकीले काले पत्थरों पर उकेरी गई नायाब शिल्पकला को अपने भीतर समेटे, और फिर मध्यकाल के अंधेरों को चीरकर आधुनिक काल के 108 फीट ऊंचे सफेद शिखर तक पहुँचना—खटांगी (प्राचीन खंटबार) की यह महागाथा किसी भी संवेदनशील हृदय को विस्मय, कौतूहल और अगाध गौरव से भर देती है। नेरा और पुनपुन नदियों के थपेड़ों और इतिहास के क्रूर बदलावों को सहते हुए भी इस गाँव ने अपनी जिस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को बचाए रखा है, वह इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि इमारतें ढह सकती हैं, साम्राज्य मिट्टी में मिल सकते हैं, राजा-महाराजा इतिहास के पन्नों में खो सकते हैं—लेकिन लोक की सामूहिक आस्था और संस्कृति कभी नहीं मरती। कालचक्र की गोद में लेटा खटांगी आज भी अपनी मद्धम मगर शाश्वत मुस्कान के साथ भारत की अमर सनातन परंपरा का एक देदीप्यमान और चमकता हुआ प्रतीक बना हुआ है।
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