चाँदनी की शीतलता, कुमुद की कोमलता और प्रेम की मधुर अनुभूति को शब्दों में पिरोने का एक छोटा सा प्रयास…
जब हृदय में अनुराग खिलता है, तब प्रकृति का हर रंग प्रेममय प्रतीत होने लगता है।
प्रस्तुत है मेरी नई रचना _
चाँदनी के आँचल में, कुमुद संग खिलता प्रेम-रंग
कुमार महेंद्ररजनी की रेशम नीरवता में,
जागा मधुमय एक स्वर।
युगों से सुप्त हृदय-तल में,
उठा प्रणय-विह्वल भंवर।
नभ ने ओढ़ी तारक-चुनरी,
धरा पर छाई नव उमंग।
चाँदनी के आँचल में, कुमुद संग खिलता प्रेम-रंग।।
शशि की शीतल रश्मियों ने,
जब हौले से तुमको छुआ।
मन-वीणा के मौन तार पर,
कोमल कोई राग जगा।
तुम्हारी विमल सरलता आगे,
फीकी पड़ जाए हर तरंग।
चाँदनी के आँचल में, कुमुद संग खिलता प्रेम-रंग।।
ज्यों कुमुदिनी नयन बिछाए,
तकती चंदा का पथ निशि भर।
त्यौं मेरी व्याकुल दृष्टि खोजे,
तुमको ही प्रिय आठों पहर।
साँसों में तुम ऐसे घुलते,
ज्यों सुरभि मिले मंद समीर संग।
चाँदनी के आँचल में, कुमुद संग खिलता प्रेम-रंग।।
आओ इस पावन विभा में,
हम तुम एकाकार हो जाएँ।
जग के सारे बंधन भूल,
प्रीति-सिंधु में खो जाएँ।
जीवन-पथ पर संग चलें हम,
हो अनुराग अमिट अनंग।
चाँदनी के आँचल में, कुमुद संग खिलता प्रेम-रंग।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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