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प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की

(प्रेम केवल शब्दों का आकर्षण नहीं,बल्कि आत्मा की वह अनुभूति है जो हर सीमा और हर बंधन को पार कर जाती है…। प्रस्तुत है इन्हीं भावों को पिरोती मेरी नई कविता)

प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की

कुमार महेन्द्र


अलौकिक स्पंदन हृदयांगन,
पावन मन की मधुर कामना।
स्वप्निल चितवन, कोमल आहट,
प्रिय मिलन की मौन साधना।
कल्पना बन यथार्थ उतरती,
हर धड़कन प्रियतम को पाने की।
प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की।।


हर पल अनुराग अनंत सजल,
दर्शन हेतु मन व्याकुल रहता।
मुस्कान सजी अधरों पर ऐसे,
मानो चंद्र नभ में हँसता।
तृषित नयन, अधरों की चाहत,
प्यास प्रणय-सुधा से बुझाने की।
प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की।।


मस्त पवन मदमाती फिरती,
रजनी चाँदनी में खो जाए।
तन से तन का कोमल स्पर्श,
मन में नव यौवन जगाए।
साँसों में महके नेह-चंदन,
ऋतु मधुमास बन जाने की।
प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की।।


तेरे नयनों की गहराई में,
मेरा हर स्वप्न उतर आया।
तेरे आलिंगन की मृदु ऊष्मा से,
सूना अंतर जगमगाया।
रग-रग में अनुरक्ति बहती,
सीमा हर बंध मिटाने की।
प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की।।


जन्म-जन्म का पावन अनुबंध,
प्रीत अमर अभिनंदन बनकर।
जीवन-पथ पर साथ तुम्हारा,
लाया उर मकरंद रस भरकर।
हिय में प्रेम तरंगें उठतीं,
नया संसार सजाने की।
प्रणय की प्रकृति है, हर बंधन तोड़ जाने की।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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