जन्म से मृत्यु तक
संजय जैनरो-कर कैसे आया था।
इस प्यारी सी दुनिया में।
पर अब हँसता रहता हूँ।
और लोगों को रुलाता हूँ।।
दुनियां के रीति-रिवाजों को।
दुनियाँ को ही बताता हूँ।
जीने मरने की कला भी।
दुनियां को सिखलता हूँ।।
बहुत सिखाया लोगों ने हमको।
अपने पराये का पाठ यहाँ पर।
पर हम तो कुछ और सीख गये।
दुनिया के चक्कर में पड़कर।।
जिस पर हाथ रखे हम।
वो अब मुझको चाहाना है।
भावनाओं का प्रश्न नही है।
बस मुझको तो उसे पाना है।।
खोखले सबके आदर्शो को।
जमाने को अब दिखाना है।
लूट मची हो चारों तरफ तो।
क्यों हमको भी लूटना है।।
खुदगर्जी का अलाम तो देखो।
बहिन-बेटी अब सुरक्षित नही।
रक्षक ही जब भक्षक बन जाये।
फिर करने को शेष रहा क्या।।
जिस्म की भूख इतनी बढ़ गई।
जिसको कैसे शांत करे अब।
छोटी-छोटी बच्चियों का भी।
अब जीवन भी कहाँ सुरक्षित।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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