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"ज्ञान एवं प्रज्ञा का अंतर"

"ज्ञान एवं प्रज्ञा का अंतर"

पंकज शर्मा
ज्ञान मनुष्य को संसार के विविध आयामों से परिचित कराता है। वह कौशल देता है, आजीविका का मार्ग प्रशस्त करता है एवं कर्म को दक्षता प्रदान करता है। किंतु केवल ज्ञान ही जीवन की पूर्णता नहीं है। यदि ज्ञान दिशा है, तो प्रज्ञा उसका ध्रुवतारा है। ज्ञान बाहरी जगत को समझने की क्षमता देता है, जबकि प्रज्ञा स्वयं को समझने का विवेक प्रदान करती है। इसी कारण विद्वत्ता एवं जीवन-बोध सदैव एक ही बात नहीं होते।


प्रज्ञा वह अंतर्दृष्टि है जो सफलता के पीछे छिपे उद्देश्य, संघर्ष के भीतर निहित शिक्षा एवं जीवन के प्रत्येक अनुभव में अर्थ खोज लेती है। ज्ञान से मनुष्य जीविका अर्जित कर सकता है, पर प्रज्ञा उसे जीवन की सार्थकता का बोध कराती है। जब ज्ञान एवं प्रज्ञा का समन्वय होता है, तभी कर्म में उत्कृष्टता एवं जीवन में प्रकाश का उदय होता है। यही वह स्थिति है जहाँ उपलब्धियाँ केवल बाहरी सफलता नहीं रह जातीं, बल्कि आत्म-विकास एवं मानवीय उत्कर्ष का माध्यम बन जाती हैं।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)

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