तुम्हारी तपिश इस माटी को महकाएगी
कुमार महेंद्रझुलसाती धूप, दहकती लू में,
तुमने हर द्वार खटखटाया।
नवभारत के शुभ प्रांगण में,
स्वर्णिम भविष्य का दीप जलाया।
सत्य-संग्रह की तप-साधना,
जनहित का मार्ग दिखाएगी।
तुम्हारी तपिश इस माटी को महकाएगी।।
कागज़-कलम की सीमाएँ छोड़,
किया तकनीक का अभिनव प्रयोग।
डिजिटल युग की नव गणना ,
बनी परिवर्तन का शुभ संयोग।
हर भवन, परिवार और आँगन की कथा,
भारत का सौभाग्य जगाएगी।
तुम्हारी तपिश इस माटी को महकाएगी।।
पूछा तुमने घर-घर का हाल,
सुने जीवन के विविध तराने।
चौंतीस प्रश्नों के उत्तर में,
उभरे कितने अनकहे फ़साने।
मृदुल वाणी का मधुर स्पर्श,
विश्वास की ज्योति जलाएगी।
तुम्हारी तपिश इस माटी को महकाएगी।।
डिजिटल युग की यह नव आभा,
प्रगति-स्वप्न साकार करेगी।
नीति, योजना और विकास की,
मनमोहक छवि उभरेगी।
अथक कर्म की यह साधना,
हर द्वार खुशियाँ पहुँचाएगी।
तुम्हारी तपिश इस माटी को महकाएगी।।
राष्ट्र तुम्हारे श्रम को नमन करे,
इतिहास तुम्हें दोहराएगा।
कल का विकसित भारत तुमसे,
नव गौरव-पथ पर जाएगा।
तुम्हारी सेवा,कर्तव्यनिष्ठा,
भारती का मान बढ़ाएगी।
तुम्हारी तपिश इस माटी को महकाएगी।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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