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"अतिथि होते कौन हैं पापा?"

"अतिथि होते कौन हैं पापा?"

डॉ सच्चिदा कुमार प्रेमी
"अतिथि देवो भव:" सिद्धांत के अनुसार अतिथि भगवान होते हैं। यह सूत्र किस युग का है, यह पता नहीं, परन्तु कलियुग में तो यह बात आने-पाई-रत्ती (सोलह आने) सच है।
"अतिथि होते कौन हैं पापा?"
मेरा भाषण चल ही रहा था कि चिरंजीव ने बात काटते हुए पूछा। बिना उत्तर दिए मैं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता था। उसके प्रश्नों की बौछार से मैं उसी प्रकार डर रहा था जैसे चुनावी मैदान में खड़े विपक्षी उम्मीदवार गाँव की जनता के ताबड़तोड़ और कमरतोड़ प्रश्नों से डरते हैं। इसलिए प्रश्न का उत्तर देकर ही हमने आगे बढ़ने का निश्चय किया।
मैंने सरल भाषा में सहज भाव से कहा, "अतिथि माने नहीं जानते हो? जिसके आने की तिथि पूर्व से मालूम न हो।" उसने दूसरा गोला दागा— "यानी अचानक आ धमकने वाला व्यक्ति अतिथि होता है और वह भगवान होता है?" मैंने स्वीकृति तो दे दी, परन्तु यह भी सोच रहा था कि उसका अगला निशाना कहाँ होगा?
उसने अगला निशाना तुरंत साधा, "जैसे कल वाले अंकल?" मैं चुप रह गया। मेरे उत्तर का तरकश खाली हो गया था। लेकिन वह तीर चलाता ही रहा— "हाँ पापा! अब भगवान को भी कोई काम नहीं रह गया है। किसी के यहाँ बिना पूर्व सूचना के पहुँचकर एकल परिवार (Short Family) के सीमित भोजन में मूसलचंद बनना ही उन्हें भाता है।" आदि-आदि वह बोलता रहा।
वह कह ही रहा था कि बीच में बालचंद भाई ने टोका, "कल वाले अंकल का क्या मतलब है?"
चिरंजीव बोलने लगा, "कल वाले अंकल तो साक्षात् भगवान थे अंकल! वह आपातकाल था। सुनिए कल वाले अंकल की कथा।"
"सुबह के तीन बजे होंगे। पापा सुबह साढ़े चार बजे स्कूल के लिए निकलते हैं। उन्हें पाँच बजे गाड़ी पकड़नी होती है। घर से स्टेशन दूर है—करीब आठ किलोमीटर। सुबह में पूजा-पाठ भी करना रहता है। वे साढ़े तीन बजे उठकर अपने दैनिक कार्यों में लग जाते हैं। मैं सवा चार बजे उठकर उनका स्कूटर झाड़-पोंछकर, स्टार्ट कर गेट के बाहर निकाल देता हूँ। मम्मी उनका नाश्ता तैयार करती हैं। पापा बाहर होटल में नहीं खाते। इसलिए जो नाश्ता घर से मिलता है, उसी पर दिन भर निर्भर रहना पड़ता है। यह सप्ताह भर का कार्यक्रम है। इसलिए नाश्ते का प्रबंध मम्मी शाम को ही कर लेती हैं। फिर उन्हें भी छः बजे काम पर जाना होता है। वे भी पूजा-पाठ करती हैं। मैं भी साढ़े पाँच बजे निकलता हूँ। मेरी व्यवस्था भी उसी रूप में होती है। यानी, साढ़े छः बजे के बाद घर में सिर्फ छोटी रह जाती है जो अभी सिर्फ आठ वर्ष की है।
सप्ताह में एक दिन रविवार आता है। उसमें भी कई बार मीटिंग-वीटिंग होती है। कभी कोई अंकल मिलने आ जाते हैं, तो कभी कोई बुला लेते हैं। घर का साप्ताहिक कार्य जैसे साफ-सफाई, आस-पड़ोस, घर-बाजार आदि भी इसी रविवार को निपटता है। अब इस व्यस्त कार्यक्रम में आदमी को फुर्सत कहाँ है?"
"अरे अंकल!" दूसरे ने फिर टोका, "कल वाले अंकल के बारे में बताओ।"
"हाँ! कल भोर-भोर में ही कॉलबेल बजी। सुबह की नींद गाढ़ी होती है। नींद जल्दी नहीं टूटी, सात-आठ मिनट लग गए। उठ तो गए, लेकिन दरवाजा खुलने में देर हुई। लगा कि अंकल कॉलबेल ही उखाड़ देंगे। तेज़ आवाज़ से पिताजी तो उठ ही गए थे, बाकी सभी घर वालों की नींद भी टूट गई। गाँव से दादी भी आई हुई थीं। वह बीमार थीं। परसों ही पापा डॉक्टर अंकल से दिखा कर और एक्स-रे कराकर लाए थे। डॉक्टर ने आराम करने को कहा था। कॉलबेल की इस कयामत ढाने वाली आवाज़ से दादी की नींद भी टूट गई। वह खाँसने लगीं। खाँसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। फिर उन्हें खाँसते-खाँसते उल्टी होने लगी। उनकी उम्र तिरानबे वर्ष है। मैं उनकी सेवा में लगा रहा।
उधर अंकल जी हमारे सजे हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुए। वे पापा पर बरसते हुए लेक्चर झाड़ रहे थे— 'क्या यही सभ्यता है? पढ़-लिखकर भी आप इस तरह का व्यवहार करते हैं? आपके यहाँ क्या कोई आएगा? साहब, दस मिनट से कॉलबेल दबाए जा रहा हूँ। न कोई बोल रहा है, न दरवाजा खोल रहा है। जिसके दरवाजे पर अतिथि का यह सम्मान होगा, उसके यहाँ लक्ष्मी तो झाँकेगी भी नहीं। आपको तो अपने इस स्वभाव पर शर्म आनी चाहिए थी!' आदि-आदि वे बरसते रहे।
उनकी आवाज़ छन-छन कर मेरे कानों तक आ रही थी। दादी की खाँसी रुक नहीं रही थी। मैंने पापा को बुलवाया। थोड़ी देर बाद वे आए और दादी को दवा-ववा दी। फिर उन्होंने मुझसे कहा, 'चलो, अंकल के पैर छू लो। बहुत दिन बाद आए हैं।' मैंने उनका कर्कश और ऊँचे स्वर में दिया गया कुभाषण सुन लिया था, इसलिए जाने का थोड़ा भी मन नहीं था। परन्तु पापा की बात टालने की शक्ति मुझमें नहीं थी। मैं चला गया।
पैर छूने से पहले ही देखा कि नाली के काले कीचड़ से लथपथ उनकी धोती, पिघलती मोम की तरह पूरे अतिथि-कक्ष को अपनी दुर्गंध से मलिन कर रही थी। लगता है पैसे बचाने के मोह में रात में वे स्टेशन से पैदल ही चले आए थे और रास्ते में किसी नाली में गिर गए होंगे। उसी का परिणाम था कि कीचड़ से लथपथ धोती, कीचड़ का पर्याय बनी चप्पलें और घुटने तक दुर्गंध फैलाते कीचड़ के लेप ने गेस्ट रूम के कश्मीरी कालीनों और मखमली सोफे की सुंदरता को ही समाप्त कर दिया था। उनके कपड़ों से टपकता गंदा पानी कालीन को सोख्ता बना रहा था।
मुझे देखकर उन्होंने मेरा स्वागत जिन शब्दों से किया, वे मेरे मर्मस्थल को भेद गए— 'यही हैं लाट साहब? ये भी आप ही की तरह होंगे। बाँस में बाँस ही फूटता है। सब कुल डुबोने वाले जमा कर लिए हैं।' मैंने कुछ बोलना चाहा परन्तु पापा तुरंत समझ गए। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझे कमरे से बाहर कर दिया। उनकी आँखें कह रही थीं— 'कुछ न बोलो। मेरी इज्जत का सवाल है।' उनके मुँह से लड़खड़ाती हुई आवाज़ निकली— 'जाओ, चाय लाओ।'
लौटते समय मैंने देखा कि उनका गंदा झोला, जिससे नाले की बदबू आ रही थी और कोई चटपटी चीज़ टपक रही थी, मेरे कंप्यूटर के ऊपर रखा था। मेरे अंदर के देवता अब राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य को अपना गुरु मानने के लिए विवश हो उठे थे। चाय देने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी और कोई बनाने वाला भी नहीं था। मैंने बचने का बहाना ढूँढा और अंदर से पापा को आवाज़ दे दी, 'दूध नहीं आया है।'
लेकिन अंकल भी कहाँ मानने वाले थे! बोले, 'कोई बात नहीं है। चाय की काली पत्ती (लीकर) तैयार करके उसमें थोड़ा घी डाल दीजिए। हम तो सिर्फ घी वाली काली चाय भी पी लेते हैं।'
आखिर पापा का आदेश था। घी डालकर चाय बनाई गई। अंकल अपने उपदेश भरे भाषण पापा को पिलाते रहे और चाय की चुस्की लेते रहे। पापा का फरमान फिर तुरंत जारी हुआ, 'बाथरूम खाली करो। अंकल स्नान करने जाएँगे।' मैंने थोड़ा विरोध किया, 'पापा जी! पौने चार बज गए हैं। आपको लेट हो जाएगा।'
पापा ने बीच में टोकते हुए मार्शल लॉ लगा दिया, 'अरे कहते हैं सो करो न!'
खैर! बाथरूम खाली हुआ। अंकल उसमें घुसे। स्टैंड पर दाढ़ी बनाने का सामान रखा रहता है। अंकल ने शेविंग क्रीम समझकर कुछ और ही अपने मुँह पर लगा लिया। पापा के ब्रश से मुँह को सुवासित किया। दरअसल, उन्होंने इमोफॉर्म (Emoform) टूथपेस्ट का उपयोग शेविंग क्रीम की तरह कर लिया था। वहाँ झाग नहीं उठने के कारण उसे भी नाली में फेंक दिया। फिर अनचाहे बालों को उड़ाने वाले (हेयर रिमूवर) साबुन को लगाकर उन्होंने स्नान किया, जिससे उनके सिर के आधे बाल साफ हो गए!
रही-सही कसर तो तब निकल गई जब उन्होंने 'वायलेट नील' (कपड़ों में देने वाला नील) की शीशी को बालों का तेल समझकर अपने सिर पर उड़ेल लिया। यह सब काम अंदर बंद बाथरूम में चलता रहा।
सुबह का समय था। रूटीन के अनुसार शौच की सबको आवश्यकता होती है। स्नानघर और शौचालय एक साथ जुड़े होने से भारी परेशानी हुई। हम क्या करते? हम लोगों ने बारी-बारी से बगल वाले अंकल की दयालुता स्वीकारी (उनके शौचालय का प्रयोग किया)। खैर, करीब डेढ़ घंटे का यह नाटक समाप्त हुआ और अंकल बाथरूम से अपना नया चेहरा लिए बाहर आए।
भगवान की ऐसी कृपा हुई कि स्नान के उपरांत सबसे पहले मैंने ही उनके दर्शन किए। आगे के बाल साफ हो चुके थे और पूरा सिर नील के कारण नीला (Violet) हो गया था! रंगीन लकीरें कान के आगे-पीछे 'ईस्टमैन कलरफुल' विज्ञापन का प्रतिमान स्थापित कर रही थीं। पीठ की तरफ से लटकती नीली लकीरें उनके मुखमंडल को एक अलग ही आभा से चमका रही थीं। उस रूप को देखकर मुझे इतनी हँसी आई कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।
पापा बार-बार चिल्ला रहे थे, 'अरे ऐनक और कंघी दो।' बोलते-बोलते वे भी गेस्ट रूम में गए। उन्हें देखा तो पापा को भी हँसी आने लगी। वे भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए। लेकिन उन्होंने मेरी तरह धैर्य नहीं खोया; उन्होंने एक दर्पण लाकर चुपचाप अंकल को दे दिया। अपना रूप देखकर वे चिल्ला उठे— 'पता नहीं बाथरूम में आपने किस चुड़ैल को बंद कर रखा है? उसने मेरी यह शक्ल कर दी!' वे अनाप-शनाप बोलते रहे।
बाद में नाई को बुलाया गया। उसने भी अवसर का लाभ उठाकर इस अजीबोगरीब मुंडन के लिए एक सौ रुपये ऐंठ लिए। दो घंटे तक मोल-भाव होता रहा। अंकल जी ने आसमान सिर पर उठा लिया था— 'इन्हें तो बस पैसा सूझता है। भगवान ने सब कुछ दिया है, सिर्फ दरिद्रता नहीं गई है' आदि-आदि। आवाज़ ऐसी कि लाउडस्पीकर भी फेल हो जाए।
आस-पड़ोस के अंकल लोग भी जुट गए। सबने रंग छुड़ाने के अपने-अपने तरकीब और अनुभव बताने शुरू किए। उपाय किए भी गए, परन्तु वह मजीठ का पक्का रंग हो गया था। अंत में यह तय हुआ कि रंग छूटने तक अंकल यहीं गेस्ट रूम की शोभा बढ़ाएँगे और हम लोगों को देवपूजन का सुअवसर प्रदान करते रहेंगे।
छः दिन लगे। कल भी अंकल स्वयं नहीं गए, उन्हें भेजा गया। जिस प्रकार मूर्तियों की पूजा बड़ी श्रद्धा के साथ की जाती है और पूजन के उपरांत मूर्ति की इच्छा जाने बिना ही उसे नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है, वैसे ही उनका भी विसर्जन किया गया।
पापा का तीन दिन का स्कूल छूटा। मम्मी छः दिन तक परेशान रहीं। मेरा कंप्यूटर इतना खराब हो गया कि अब वह नहीं बनेगा। गेस्ट रूम की कालीन और सोफे सदा के लिए हटाने पड़े। पलंग का गद्दा, तकिया और चादर बदलनी पड़ी। गेस्ट रूम के कोने और दीवारें खैनी के थूक और पीक से आज भी इतने महक रहे हैं कि कोई वहाँ बैठ नहीं सकता।
इसलिए "अतिथि देवो भव:" का मंत्र अब लगता है बदल गया है, और वह हो गया है— "अतिथि दशमो ग्रह:" (अतिथि दसवाँ ग्रह है)।पता नहीं, कल वाले अंकल आज किसकी पूजा ले रहे होंगे?
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