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वैचारिक चेतना का महाकुंभ: मुजफ्फरपुर में 'बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन

वैचारिक चेतना का महाकुंभ: मुजफ्फरपुर में 'बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन

सत्येन्द्र कुमार पाठक , राष्ट्रीय प्रवक्ता , आचार्यकुल
बिहार की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक चेतना की अत्यंत समृद्ध भूमि मुजफ्फरपुर में 'बिहार राज्य आचार्यकुल' के दो दिवसीय प्रदेश सम्मेलन का एक अभूतपूर्व, भव्य और युगांतरकारी आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। दिनांक 30 और 31 मई 2026 को मुजफ्फरपुर के हृदय स्थल सरैयागंज स्थित प्रतिष्ठित श्री नवयुवक समिति ट्रस्ट के सभागार में आयोजित इस अधिवेशन ने न केवल बिहार, बल्कि संपूर्ण देश के शीर्ष विचारकों, मूर्धन्य साहित्यकारों, निष्पक्ष पत्रकारों और समर्पित समाजसेवियों को एक साझा ऐतिहासिक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ जब संपूर्ण विश्व और भारतीय समाज तीव्र तकनीकी प्रगति के बीच गंभीर नैतिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस महासम्मेलन का मुख्य उद्देश्य आचार्यकुल के मूल सिद्धांतों—सत्य, अहिंसा, करुणा, सर्वोदय और भूदान आंदोलन की प्रासंगिकता को आधुनिक युग में पुनर्स्थापित करना और भावी पीढ़ी के लिए एक नैतिक मार्गदर्शिका तैयार करना था। दो दिनों तक चले इस गहन वैचारिक समागम में वर्तमान सामाजिक चुनौतियों, मानवीय मूल्यों के निरंतर हो रहे ह्रास, पर्यावरण संकट और उनके व्यावहारिक समाधान में आचार्यों (शिक्षकों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, और पत्रकारों) की भूमिका पर अत्यंत गंभीर, सारगर्भित और दिशा-परक विमर्श हुआ।
सम्मेलन का विधिवत और गरिमामय उद्घाटन आचार्यकुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष, देश के प्रख्यात चिंतक, मनीषी एवं पूर्व कुलपति आचार्य डॉ. धर्मेंद्र द्वारा पारंपरिक वैदिक रीति और दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। जैसे ही दीपशिखा प्रज्वलित हुई, पूरा सभागार वैचारिक चेतना और करतल ध्वनि से गुंजायमान हो उठा । अपने मुख्य उद्घाटन भाषण में डॉ. धर्मेंद्र ने आचार्यकुल की स्थापना के मूल उद्देश्यों और आज के समय में इसकी अपरिहार्यता पर अत्यंत गंभीर प्रकाश डाला। उन्होंने जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा: "आज के इस संक्रमण काल में जब संपूर्ण मानव समाज नैतिक और चारित्रिक संकट के दौर से जूझ रहा है, तब आचार्यकुल की जिम्मेदारी और जवाबदेही पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। 'आचार्य' शब्द केवल अक्षर ज्ञान देने वाले या जीविकोपार्जन के लिए अध्यापन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है। आचार्य वह है जिसका आचरण अनुकरणीय हो, जो समाज का चरित्र निर्माता हो और जो सत्ता व स्वार्थ से परे हटकर समाज को सत्य का मार्ग दिखाए।" उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान समय की विसंगतियों को केवल कानून या तकनीक के बल पर दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें परम पूज्य संत विनोबा भावे और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी विचारों को पुनः आत्मसात करना होगा। उनके सिद्धांतों पर चलकर ही हम एक समतामूलक, शोषणमुक्त, भयमुक्त और प्रेम पर आधारित समाज की परिकल्पना को धरातल पर साकार कर सकते हैं। उद्घाटन सत्र के दौरान मुख्य मंच से राष्ट्र निर्माण में बौद्धिक वर्ग की सहभागिता को बढ़ाने का पुरजोर आह्वान किया गया, जिसने वहाँ उपस्थित प्रत्येक प्रतिनिधि को झकझोर कर रख दिया।
इस उद्घाटन सत्र को और अधिक गरिमामय, ऊर्जावान और भावपूर्ण बनाने में स्वर्णिम कला केंद्र के कलाकारों ने एक अनुकरणीय और अविस्मरणीय भूमिका निभाई। कलाकारों द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के सामूहिक और सुमधुर गायन ने संपूर्ण सभागार में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का एक अद्भुत ज्वार ला दिया। उपस्थित जनसमूह राष्ट्र के सम्मान में उठ खड़ा हुआ। इसके तुरंत बाद, कलाकारों ने आचार्य विनोबा भावे के वैश्विक बंधुत्व और सार्वभौमिक कल्याण के संदेश को प्रतिध्वनित करते हुए 'जय जगत' गीत की अत्यंत मनमोहक, सुरीली और प्रेरणाप्रद प्रस्तुति दी। इस सांस्कृतिक प्रस्तुति ने वहाँ उपस्थित प्रतिनिधियों के अंतर्मन को छू लिया और यह संदेश स्पष्ट रूप से प्रसारित किया कि आचार्यकुल की वैचारिक यात्रा केवल राष्ट्र की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवाद से शुरू होकर संपूर्ण विश्व के कल्याण यानी 'वसुधैव कुटुंबकम्' की महान सनातन अवधारणा तक जाती है।
सांगठनिक मजबूती, स्वागत और वार्षिक प्रतिवेदन का लेखा-जोखा में सम्मेलन के प्रथम सत्र की अध्यक्षता और स्वागत की कड़ियों ने संगठन के अनुशासन, आंतरिक मजबूती और उसकी दूरगामी दृष्टि को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया। बिहार राज्य आचार्यकुल की उपाध्यक्ष डॉ. संगीता सागर ने अपने स्वागत भाषण में देश के विभिन्न हिस्सों और मुख्य रूप से तीन राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड) से आए सभी शीर्ष पदाधिकारियों, बुद्धिजीवियों, प्राध्यापकों और प्रतिनिधियों का मुजफ्फरपुर की इस पावन, ऐतिहासिक और क्रांतिकारी धरती पर अत्यंत आत्मीय अभिनंदन किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में सम्मेलन की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की और मुजफ्फरपुर में इसके आयोजन के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह भूमि सदैव से ही बड़े वैचारिक आंदोलनों की गवाह रही है और यहाँ से उठी आवाज पूरे देश को प्रभावित करेगी।
बिहार राज्य आचार्यकुल की अध्यक्षा डॉ. ऊषा श्रीवास्तव ने पिछले सांगठनिक कार्यकाल का विस्तृत, प्रामाणिक और सिलसिलेवार वार्षिक प्रतिवेदन सदन के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने प्रतिवेदन में बिहार के विभिन्न जिलों में संगठन द्वारा जमीनी स्तर पर किए गए रचनात्मक कार्यों, बाल कुपोषण के खिलाफ अभियान, समाज सुधार के विविध कार्यक्रमों, नशामुक्ति के प्रयासों और ग्रामीण अंचलों में शैक्षणिक व नैतिक चेतना के प्रसार के लिए किए गए भगीरथ प्रयासों का पूरा ब्यौरा दिया। उन्होंने भविष्य की महत्वाकांक्षी कार्ययोजनाओं को साझा करते हुए संगठन के विस्तार की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। डॉ. श्रीवास्तव ने आह्वान किया कि संगठन को अब पंचायत और ग्राम स्तर तक ले जाने का समय आ गया है, ताकि समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति तक सर्वोदय का संदेश पहुँचाया जा सके।
इस दो दिवसीय सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक और अंतर्राज्यीय स्वरूप था। इसमें मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के आचार्यकुल तथा भूदान यज्ञ आंदोलन से जुड़े प्रख्यात प्रतिनिधियों, शीर्ष नीति-निर्धारकों, कुलपतियों और वरिष्ठ विचारकों ने हिस्सा लिया। मंच पर उपस्थित प्रमुख विभूतियों ने विभिन्न सत्रों में अपनी बात रखी और समाज को सुधारने के लिए अपने व्यावहारिक सुझाव दिए।
मंच पर उपस्थित विचारकों के वैचारिक योगदान को हम निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझ सकते हैं:
डॉ. जंगबहादुर पांडे राज्याध्यक्ष, झारखंड आचार्यकुल (पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विश्वविद्यालय, रांची) उन्होंने झारखंड में आचार्यकुल के सांगठनिक विस्तार और सबसे महत्वपूर्ण रूप से भूदान आंदोलन के तहत मिली जमीनों के संरक्षण, उन पर भू-माफियाओं के अवैध कब्जों को हटाने और उस भूमि को जन-कल्याणकारी कार्यों में लगाने पर विस्तृत नीतिगत विचार रखे। सत्येन्द्र कुमार पाठक राष्ट्रीय प्रवक्ता, आचार्यकुल उन्होंने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में संगठन की नीतियों, दर्शन और भावी दिशा का प्रकटीकरण किया। साथ ही उन्होंने मगध क्षेत्र और संपूर्ण बिहार की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए आचार्यों को अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करने का आह्वान किया। मुक्तिनाथ त्रिपाठी वरिष्ठ प्रतिनिधि (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश) उन्होंने उत्तर प्रदेश में सर्वोदय आंदोलन की वर्तमान स्थिति और आचार्यकुल की गतिविधियों के बीच एक मजबूत समन्वय स्थापित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के राज्यों को मिलकर काम करना होगा।
कुलपति यति कुलपति, थावे विद्यापीठ उन्होंने भारत की 'नई शिक्षा नीति' (NEP) के आलोक में नैतिक मूल्यों, व्यावहारिक शिक्षा और आचार्यों के वास्तविक दायित्वों पर एक अत्यंत सारगर्भित, दार्शनिक और व्यावहारिक व्याख्यान दिया। डॉ. अनमोल कुमार प्रभारी, पत्रकार प्रकोष्ठ (गया) उन्होंने समकालीन पत्रकारिता की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए समाज में 'सकारात्मक और विकासोन्मुखी पत्रकारिता' की तात्कालिक आवश्यकता और मीडिया के नैतिक उत्तरदायित्वों पर अपनी बात रखी। राकेश दत्त मिश्र संपादक, 'दिव्य रश्मि' (पटना) उन्होंने वैचारिक और साहित्यिक पत्रिकाओं की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में भी वैचारिक पत्रिकाओं के माध्यम से ही समाज में दीर्घकालिक बौद्धिक चेतना जगाई जा सकती है।
जी एन भट्ट संपादक, 'निर्माण भारती' (हिंदी पाक्षिक) उन्होंने दृढ़ संकल्प व्यक्त किया कि पत्र-पत्रिकाओं और प्रिंट मीडिया के माध्यम से आचार्यकुल के मूल सिद्धांतों (सत्य, अहिंसा, सर्वोदय) को जन-जन तक और हर घर तक पहुँचाना हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। इन सभी मूर्धन्य वक्ताओं ने अलग-अलग सत्रों में अपने विचार रखते हुए इस बात पर गहरी सामूहिक चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में भूदान आंदोलन की जमीनों की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने सर्वसम्मति से कहा कि इन जमीनों का सदुपयोग पूर्णतः लोक-कल्याण, चिकित्सा और शिक्षा के कार्यों में होना चाहिए और इसके लिए देश के आचार्यों को एक होकर एक सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभानी होगी।
दो दिनों तक चले इस गहन वैचारिक महाकुंभ में विभिन्न विषयों पर कई समानांतर और मुख्य सत्र आयोजित किए गए। देश भर से आए प्रतिनिधियों के बीच व्यापक विचार-विमर्श, तर्क-वितर्क और गहन मंथन के बाद निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर पूर्ण सहमति बनी और दूरगामी प्रभाव वाले चार प्रमुख प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए: सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अत्यधिक व्यावसायिक और केवल रोजगारोन्मुखी हो चुकी है, जिससे मानवीय संवेदनाएं समाप्त हो रही हैं। अतः शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर उसमें चरित्र-निर्माण, नैतिक मूल्यों, देशप्रेम और स्वावलंबन (महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा) पर आधारित पाठ्यक्रम को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल उपाधि बांटना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए
संत विनोबा भावे द्वारा शुरू किए गए ऐतिहासिक भूदान आंदोलन के तहत मिली लाखों एकड़ जमीनों के वर्तमान रख-रखाव पर चिंता जताई गई। प्रस्ताव पारित किया गया कि सरकार के साथ मिलकर एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स या ठोस नीति बनाने की मांग की जाए, ताकि इन जमीनों का वास्तविक वितरण गरीबों में हो सके और शेष बची जमीनों पर ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थानों, पुस्तकालयों, कृषि अनुसंधान केंद्रों और सामाजिक कल्याण संस्थानों का विकास किया जा सके।
सर्वोदय के सिद्धांतों के अंतर्गत प्रकृति के संरक्षण को सर्वोपरि माना गया। सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि आचार्यकुल के सदस्य ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर जाकर स्थानीय नदियों, पारंपरिक जलस्रोतों, तालाबों की रक्षा और वृक्षारोपण के लिए एक व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाएंगे। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में आचार्यों का यह कर्तव्य है कि वे समाज को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीना सिखाएं।
आज के दौर में पीत पत्रकारिता सनसनीखेज खबरों और सोशल मीडिया पर फैलती भ्रामक जानकारियों पर गहरा विमर्श हुआ। प्रस्ताव लिया गया कि समाजोन्मुखी, सत्यनिष्ठ, निर्भीक और मूल्य-आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए पत्रकारों का एक राष्ट्रव्यापी मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। मीडिया को पुनः समाज के दर्पण और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी खोई हुई साख वापस लानी होगी।
सम्मेलन का सबसे भावुक, प्रेरणाप्रद और गौरवशाली क्षण वह था, जब समाज के विभिन्न क्षेत्रों में बिना किसी प्रचार के, मूकनायक की तरह निस्वार्थ भाव से काम करने वाले कर्मयोगियों को सम्मानित किया गया। आचार्यकुल के राष्ट्रीय एवं प्रांतीय नेतृत्व द्वारा देश के कोने-कोने से चुनकर आए 100 उत्कृष्ट आचार्यकुल प्रतिनिधियों, मूर्धन्य साहित्यकारों, निष्पक्ष पत्रकारों और समर्पित समाजसेवियों को मंच पर आमंत्रित कर सम्मानित किया गया।
यह सम्मान समारोह पूरी तरह से भारतीय सनातन परंपरा और मर्यादा के अनुकूल था। सभी सम्मानित विभूतियों को मंच से: सम्मान पत्र (प्रशस्ति पत्र): प्रदान किया गया, जिसमें उनके द्वारा समाज के लिए किए गए उत्कृष्ट और अनुकरणीय कार्यों की सराहना की गई थी। स्मृति चिह्न: भेंट कर इस ऐतिहासिक और युगांतरकारी सम्मेलन की मधुर यादों को उनके हृदयों में संजोया गया। अंगवस्त्र: ओढ़ाकर और तिलक लगाकर भारतीय संस्कृति के अनुसार उनका आदरपूर्वक सत्कार किया गया। इस गरिमामय सम्मान समारोह ने न केवल समाज के वरिष्ठ विचारकों और कर्मयोगियों का हौसला बढ़ाया, बल्कि सभागार में उपस्थित युवा पीढ़ी और छात्रों को भी अपने जीवन में समाज सेवा, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण के पथ पर अडिग रहने के लिए गहराई से प्रेरित किया।
अधिवेशन के उत्तरार्ध में आयोजित कवि सम्मेलन, विशिष्ट व्याख्यान और विमर्श सत्रों ने पूरे माहौल को और भी अधिक साहित्यिक, रसमय और जीवंत बना दिया। इस सत्र में देश की जानी-मानी विदुषियों और कवयित्रियों ने हिस्सा लिया, जिनमें नीता सहाय, डॉ. सुधा सिंह, 'जीवन धारा नमामि गंगे' की राष्ट्रीय चीफ सेक्रेटरी दिव्या स्मृति, आशा रघुदेव और प्रो. डॉ. पुष्पा गुप्ता प्रमुख थीं। इन सभी ने अपने ओजस्वी व्याख्यानों और राष्ट्रभक्ति तथा सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करती अपनी मर्मस्पर्शी कविताओं से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सम्मेलन को वैचारिक रूप से समृद्ध करने में देश भर से आए विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और विभिन्न सत्रों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित विभूतियाँ शामिल थीं: धार्मिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व: गया से आए पीठाधीश्वर डॉ. श्याम नाथ सिंह (पटना) और मुजफ्फरपुर नगर निगम की लोकप्रिय उप महापौर मोनालिशॉ।, वरिष्ठ पत्रकार, अधिवक्ता एवं प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग: अवधेश कुमार शर्मा (बेतिया), डॉ. भोला प्रसाद (वरिष्ठ अधिवक्ता, पटना), डॉ. रमेश चौबे (पटना), डॉ. राजेश कुमार झा (पटना), पवन कुमार (बेतिया), डॉ. (प्रो०) अरबिंद नाथ तिवारी (बगहा), अंकेश कुमार (पटना), श्री त्रिवेदी जी (पटना), मंजर लाल सत्यम् (बेतिया), राजेश पाण्डेय, सतीश मिश्रा (मुजफ्फरपुर), राहुल कुमार छोटन (मुजफ्फरपुर, झंझट टाइम्स), आदर्श निर्मल (संपादक, सत्याकलन), संतोष तिवारी (मुजफ्फरपुर, शंखनाद)। उत्तर प्रदेश और झारखंड से आए वरिष्ठ प्रतिनिधि व शिक्षाविद्: उत्तर प्रदेश के देवरिया से विशेष रूप से पधारे सौदागर सिंह, रमेश सिंह दीपक, कौशल किशोर मणि, छेदी प्रसाद गुप्त; गोरखपुर से डॉ. नरेंद्र राय, डॉ. ओमप्रकाश मिश्र, नंदलाल मणि त्रिपाठी पीतांबर; और कुशीनगर से डॉ. ओमप्रकाश द्विवेदी (पूर्व प्राचार्य, पड़ौना)। झारखंड के शीर्ष प्रतिनिधि: देवघर से पधारे कुमार रंजन (राष्ट्रीय प्रभारी, युवा नेतृत्व प्रशिक्षण कार्यक्रम, आचार्यकुल), रांची से डॉ. वासुदेव प्रसाद (पूर्व प्राचार्य), डॉ. ओमप्रकाश (प्राध्यापक, शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, रांची), सुबोध दुबे (रांची कॉलेज), वाई.बी.एन. यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष डॉ. रामजी भाई और उत्तर प्रदेश आचार्यकुल के सम्मानित ट्रस्टी अभय जिज्ञासु। इन सभी वक्ताओं ने आचार्यकुल के सिद्धांतों, विनोबा जी के विचारों और आज के समय में आचार्यों के सामाजिक उत्तरदायित्वों पर अपने अत्यंत शोधपरक और मूल्यवान व्याख्यान दिए ।
मुजफ्फरपुर के ऐतिहासिक नवयुवक समिति ट्रस्ट के सभागार में संपन्न हुआ यह द्विदिवसीय बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन केवल एक औपचारिक वार्षिक आयोजन या बौद्धिक विलासिता का मंच नहीं था, बल्कि यह वास्तव में टूटते हुए सामाजिक मूल्यों को बचाने और समाज को एक नई प्रगतिशील दिशा देने वाला वैचारिक महाकुंभ साबित हुआ। दो दिनों तक चले इस मंथन से जो वैचारिक अमृत निकला, वह आने वाले समय में समाज का मार्गदर्शन करेगा। सम्मेलन के समापन सत्र में आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता सत्येन्द्र कुमार पाठक और संपूर्ण प्रांतीय नेतृत्व ने देश के कोने-कोने से आए सभी आगंतुकों, प्रतिनिधियों, कलाकारों और मीडिया कर्मियों के प्रति सहृदय आभार और धन्यवाद व्यक्त किया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन से संपूर्ण देश के लिए एक बहुत ही स्पष्ट, सशक्त और कड़ा संदेश निकला: "जब तक देश का बुद्धिजीवी, साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षक (आचार्य) जागृत रहेगा, अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझता रहेगा और सत्ता के सम्मुख सत्य बोलने का साहस रखेगा, तब तक इस महान राष्ट्र की प्रगति, अखंडता और नैतिक उत्थान को दुनिया की कोई भी ताकत रोक नहीं सकती।" संपूर्ण सभागार में उपस्थित सैकड़ों लोगों द्वारा किए गए 'जय जगत' के सामूहिक, गगनभेदी और ओजस्वी महाउद्घोष के साथ इस ऐतिहासिक सम्मेलन का समापन हुआ। सभी प्रतिनिधि अपने-अपने राज्यों, जिलों और कार्यक्षेत्रों में आचार्यकुल की इस नैतिक और वैचारिक मशाल को और अधिक तेज करने, सर्वोदय के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने और एक बेहतर समाज के निर्माण के पवित्र संकल्प के साथ अपने घरों को विदा हुए। यह सम्मेलन आने वाले कई दशकों तक अपनी वैचारिक ऊर्जा के लिए याद किया जाएगा ।
जहानाबाद , बिहार


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