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"विनय का वैभव"

"विनय का वैभव"

पंकज शर्मा
महानता का वास्तविक स्वरूप बाह्य प्रदर्शन में नहीं, बल्कि विनम्रता की सहज आभा में प्रकट होता है। जैसे फल से लदा वृक्ष स्वाभाविक रूप से झुक जाता है, वैसे ही ज्ञान, अनुभव एवं चरित्र से समृद्ध व्यक्ति अहंकार से दूर रहता है। उसे स्वयं को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसका आचरण ही उसके व्यक्तित्व का परिचय बन जाता है।

इसके विपरीत, क्षुद्रता प्रायः आत्ममुग्धता का आवरण ओढ़े रहती है। जो भीतर से रिक्त होता है, वही अपने महत्व का निरंतर उद्घोष करता है। जीवन का यह शाश्वत सत्य है कि ऊँचाई का माप गर्दन उठाने से नहीं, बल्कि हृदय के विस्तार से होता है। अतः यदि महान बनना है, तो सम्मान पाने का प्रयास नहीं, बल्कि विनय, सदाचार एवं आत्मविकास का साधन करना चाहिए; क्योंकि झुकना ही वह कला है जो मनुष्य को वास्तव में ऊँचा बनाती है।
"सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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