जीवन एक पहेली
संजय जैनजीवन बन गई एक पहेली
जिसको समझना मुश्किल है।
मानव द्वारा रचित समाज का
विघटन एक दिन निश्चित है।।
जब-जब अवसर खोजोगे तो
कमियाँ दिखेंगी तुमको सिर्फ।
उन कमियों पर बार करके
जंग को तुम जीत लोगे।।
घर का भेदी घर को खाता
और मरवता घर वालों को।
गैरो में कहाँ इतनी दम है
जो जीत सके जंग हमसे।।
अपने स्वार्थ के कारण ही
अपने बनते अपनों के दुश्मन।
बंदिश पाबंदी नही चाहिए
अपने ऊपर किसी की भी।।
खुली आज़ादी चाहिए सबको
खुले विचारो के संग जो।
पर इसका मतलब ये नही होता
की भूल जायेंगे संस्कारो को।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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