तुम सौंदर्य की मल्लिका हो
कुमार महेंद्रनयन तुम्हारे नीलकमल से,
अधर अरुण पारिजात।
मलय-पवन सी मंद सलोनी,
ज्यों मधुमास की मूक रात।
इस हृदय-पटल पर अंकित तुम,
प्रणय-भाव की वर्णिका हो।
तुम सौंदर्य की मल्लिका हो।।
अलकें जैसे सघन घटाएँ,
भृकुटि नव संध्या का चाप।
क्षणभर में हर लेती तम को,
कंचन-तन का दिव्य प्रताप।
मंजुल मुखमंडल की आभा,
शरद-निशा की कुमुद कलिका हो।
तुम सौंदर्य की मल्लिका हो।।
कण-कण विस्मित रह जाता है,
सुनकर पदचाप तुम्हारी।
नूपुर की रुनझुन में गूँजे,
वीणा-स्वर की तान पियारी।
तुम रागिनी मेरे जीवन की,
प्रेम-सरोज की कर्णिका हो।
तुम सौंदर्य की मल्लिका हो।।
चंदन-सी शीतल छुअन तुम्हारी,
साँसों में कस्तूरी-गंध।
मेरे प्रत्येक शब्द में बसता,
तुमसे उपजा प्रेम-अनंत।
इस मौन समर्पण की साक्षी,
ब्रह्मांड-हृदय की तृष्णिका हो।
तुम सौंदर्य की मल्लिका हो।।
तुमसे ही आलोकित प्राणों में,
सपनों का मधुमय संसार।
तुमसे ही स्पंदित है मन,
तुमसे जीवन का विस्तार।
मेरे समस्त भावों की तुम,
अमर प्रेरणा-दीपिका हो।
तुम सौंदर्य की मल्लिका हो।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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