"क्षणिक छाँव, शाश्वत प्रकाश"
पंकज शर्मा
यथार्थ प्रायः मनुष्य के सम्मुख अपने समस्त भार और कठोरता के साथ उपस्थित होता है। वह न कल्पनाओं की तरह सांत्वना देता है, न इच्छाओं के अनुरूप स्वयं को परिवर्तित करता है। इसी कारण अनेक लोग सत्य का सामना करने के स्थान पर भ्रमों की छाँव में आश्रय खोज लेते हैं और क्षणिक सुख को ही स्थायी प्रसन्नता समझ बैठते हैं। किंतु भ्रम का प्रकाश उधार का होता है; वह कुछ समय के लिए आँखों को तो चकाचौंध कर सकता है, जीवन को आलोकित नहीं कर सकता।
वास्तविक संतोष तभी जन्म लेता है जब मनुष्य यथार्थ से विमुख होने के बजाय उसे स्वीकार करने का साहस अर्जित करे। सत्य कभी-कभी पीड़ादायक अवश्य होता है, पर वही आत्मबोध और परिपक्वता का द्वार भी खोलता है। जो व्यक्ति भ्रमों के सहारे नहीं, बल्कि यथार्थ की भूमि पर खड़ा होना सीख लेता है, उसके लिए प्रसन्नता कोई किराये की अनुभूति नहीं रहती, बल्कि उसके स्वयं के अंतर्मन से प्रस्फुटित होने वाला स्थायी प्रकाश बन जाती है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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