तुमसे ही मेरी हर धड़कन, तू मेरी साँसों की डोर
कुमार महेंद्रयह जीवन था सूना उपवन,
तुम आए, महकी हर भोर।
मन के नीरव अंबर पर,
तुम बरसे बन सावन-घनघोर।
पाकर तुम्हारा मृदुल स्पर्श,
हर पल हुआ प्रणय सराबोर।
तुमसे ही मेरी हर धड़कन,तू मेरी साँसों की डोर।।
मौन अधर अब गाते गीत,
जब से मिली तुम्हारी प्रीत।
नयनों में बस छवि तुम्हारी,
फीकी लगने लगी जग-रीत।
खिंचा चला आता हूँ तुम तक,
ज्यों चंदा पर मुग्ध चकोर।
तुमसे ही मेरी हर धड़कन,तू मेरी साँसों की डोर।।
सुख-दुख की हर एक डगर में,
हाथ रहे तेरा मेरे हाथ।
संग तुम्हारे बीते यह जीवन,
यही प्रार्थना दिन और रात।
तुम बिन सूना हर उत्सव है,
तुमसे ही जीवन का ठौर।
तुमसे ही मेरी हर धड़कन,तू मेरी साँसों की डोर।।
जब से तुमको अपना माना,
हर बंधन स्वतः बिखरने लगा।
तेरे प्रेम के पावन रंग में,
मेरा रोम-रोम निखरने लगा।
तुम ही आदि, तुम ही अनंत हो,
ज्यों नदियाँ चलीं सिंधु की ओर।
तुमसे ही मेरी हर धड़कन,तू मेरी साँसों की डोर।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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