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जब पसीने से तर ब तर हो लूँ

जब पसीने से तर ब तर हो लूँ

डा रामकृष्ण
जब पसीने से तर ब तर हो लूँ
चुपके से ऐ हवा आया न कर।
यह समय मेरा जरा मँहगा तो‌ है
अकारण तू भी इसे जाया न कर। ।


हर तरफ हो रही अंधी रेलियाँ
किस अँधैरे में बजेगी घंटियाँ।
बादलों को कहाँ फुरसत है अभी
उसके बदले राग अपनाया न कर।।


आँसुओं से भींगते से पेड़ ये
मुह चिढ़ातेे‌ सूखते से मेड़ ये
किसी जीवन की व्यथा कहते नहीं
उलझशों को और उलझाया न कर।।


कहाँ सागर अकारण है खौलता
षहाडों में कौन है जो बोलता
आदमी के शोर मेे लगता‌ नहींं
सुनेगा संगीत मन गाया न कर।।


छू रहे अट्टालिकाओं के शिखर
गगन,क्षत विक्षत हुए मानव विखर
वेदनाएँ प्राण भेदी हो रहीं
दोमुहे संज्ञान हकलाया न कर।। ३५



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