प्रकृति का संतुलन आवश्यक क्यों है ?
अरुण दिव्यांश
किसी भी वस्तु को निरंतर चलायमान रखने के लिए संतुलन का होना अनिवार्य हो जाता है , क्योंकि संतुलन खोने का तात्पर्य होता है गति रुकना या घटना दुर्घटना घटित होना । इसके लिए हमें या प्रकृति को भी काफी सावधान रहना पड़ता है ताकि संतुलन नहीं बिगड़े । यत्र तत्र बोर्ड पर लिखा भी मिलता है कि सावधानी हटी , दुर्घटना घटी ।
संतुलन का पर्याय होता है : सम् + तुलन अर्थात् दोनों तरफ भार का बराबर होना । खेल दिखानेवाला भी हाथ में एक बाॅंस लेकर बड़ी सरलता के साथ एक छोर से दूसरे छोर तक चलकर पहुॅंच जाता है ।
परिवार में भी व्यय अधिक हो और आय कम हो तो घर में कलह आरंभ हो जाता है । सड़कों पर भी अधिकतर संतुलन बिगड़ने के कारण ही घटना या दुर्घटना घटित होती हैं ।
ठीक वैसे ही प्रकृति के संतुलन का होना भी अनिवार्य होता है । प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में हमारी भी सहभागिता अनिवार्य होती है , क्योंकि प्रकृति के संतुलन बिगड़ने से फसलों पर प्रभाव पड़ता है और फसलें प्रभावित होने से हमारा जन जीवन भी बुरी तरह से प्रभावित होता है । हमें यदि अपने जीवन को स्वस्थ और दीर्घायु रखना रखना है तो हमें प्रकृति के संतुलन को निरंतर कायम रखना होगा अर्थात् प्रकृति का संतुलन कायम रखने के लिए हमें वृक्षारोपण , वृक्ष संरक्षण , जल संरक्षण , ध्वनि और धुऍं से संरक्षण अनिवार्य है ।
अतः सृष्टि को निरंतर चलाने और आबाद रखने के लिए , जन जीव जीवन सुरक्षित रखने के लिए प्रकृति का संतुलन आवश्यक है ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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