भारत भूषण तिवारी हत्याकांड और न्यायिक जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न
रमेश कुमार चौबे, महासचिव, नागरिक अधिकार मंच
भारत भूषण तिवारी फर्जी इनकाउंटर बल्कि हत्याकांड की जाँच के लिए जो न्यायायिक जाँच आयोग बना है उसके न्यायाधीश हीं जब इस हत्याकांड में संलिप्त के साथ मृतक के गाँव लेकर गए उस जाँच आयोग पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता l
इस न्यायायिक जाँच आयोग की भूमिका अब तो प्रारंभ से हीं बिलकुल हीं संदिग्ध दिखाई दे रहा है तो ऐसे में पीड़ित परिवार को समग्र न्याय मिलना नामुमकिन लगता है l
माननीय उच्च न्यायालय पटना के सेवानिवृत न्यायाधीश और बिहार विधि आयोग के वर्त्तमान अध्यक्ष जो इसके पहले मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष थे अध्यक्ष रहते इनके कार्यकाल के तमाम शिकायतो की संख्या देखा जाय एवं इनके द्वारा दिए गए फैसले को गहराई एवं गंभीरता से देखा जाय तथा पीड़ित शिकायतकर्ताओं का साक्षात्कार लिया जाय तो इनकी पारदर्शिता का असली हकीकत पता चलेगा l
यह जाँच आयोग लीपापोती करने के लिए बनाया गया है इसकी जाँच की विश्वासनीयता संदिग्ध है क्योंकि हत्या कराने में संलिप्त के साथ इनका बेलौटी गाँव जाना इसके जाँच को संदेह के घेरे में ला दिया है l
यह भी आवश्यक है कि आयोग के अध्यक्ष के पूर्व कार्यकालों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में प्राप्त शिकायतों, उनके निस्तारण और शिकायतकर्ताओं के अनुभवों का गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए। यदि पीड़ित पक्षों और शिकायतकर्ताओं के साक्षात्कार लिए जाएं तथा उनके मामलों का विश्लेषण किया जाए, तो पारदर्शिता और निष्पक्षता की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
आज जो परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं, उनसे यह आशंका प्रबल होती जा रही है कि कहीं यह जांच आयोग केवल मामले की लीपापोती करने का माध्यम तो नहीं बन रहा है। हत्या के आरोपों से जुड़े लोगों के साथ आयोग के प्रतिनिधियों का गांव जाना जांच को संदेह के घेरे में ला चुका है। ऐसी स्थिति में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए व्यापक जन निगरानी और न्यायिक पारदर्शिता की आवश्यकता है।
भारत भूषण तिवारी कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता थे, जिन्होंने अपने निजी हितों के लिए नहीं, बल्कि दलितों, पिछड़ों, वंचितों और सर्वसमाज के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। वे जनहित के मुद्दों को निर्भीकता से उठाते थे और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करते थे।
भोजपुर जिले के जमइनिया गांव में विकास योजनाओं के नाम पर पिछले दो-तीन वर्षों में जो सरकारी राशि खर्च की गई, उसमें बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए। ग्रामीणों के अनुसार, जिन कार्यों के लिए धन स्वीकृत हुआ, उनमें से अनेक कार्य धरातल पर दिखाई ही नहीं देते। इस पूरे मामले में संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में रही है।
भारत भूषण तिवारी ने इन कथित घोटालों के विरुद्ध लगातार आवाज उठाई। उनके पास कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और प्रमाण मौजूद थे, जिनके आधार पर भ्रष्टाचार में संलिप्त लोगों की जवाबदेही तय हो सकती थी। यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि इन्हीं कारणों से वे प्रभावशाली तत्वों के निशाने पर आ गए और एक सुनियोजित साजिश के तहत उनकी हत्या कर दी गई।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण की जांच किसी पूर्णतः स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय एजेंसी से कराई जाए, ताकि सच्चाई देश और समाज के सामने आ सके। यदि जांच प्रक्रिया पर ही प्रश्न उठने लगें, तो न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होता है। इसलिए यह केवल भारत भूषण तिवारी के परिवार का मामला नहीं है, बल्कि न्याय, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा का भी प्रश्न है।
सरकार, न्यायपालिका और संबंधित संस्थाओं को चाहिए कि वे इस मामले में पूर्ण पारदर्शिता बरतें, सभी तथ्यों को सार्वजनिक करें और दोषियों को कानून के अनुसार कठोर दंड दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। तभी भारत भूषण तिवारी को वास्तविक श्रद्धांजलि और उनके संघर्षों का सम्मान माना जाएगा।
लेखक रमेश कुमार चौबे, नागरिक अधिकार मंच महासचिव,

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