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"पर्याप्तता का बोध"

"पर्याप्तता का बोध"

पंकज शर्मा
प्रिय मित्रों प्रकृति ने मनुष्य के लिए जीवन की आवश्यकताओं को अत्यंत सरल एवं सीमित रखा है। एक मुट्ठी अन्न, तन ढकने भर वस्त्र एवं आश्रय का एक कोना—इनसे जीवन का आधार निर्मित हो जाता है। किंतु जब मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के स्थान पर अहंकार एवं प्रदर्शन को प्रतिष्ठित कर देता है, तब उसकी इच्छाएँ क्षितिज की भाँति दूर एवं अप्राप्य हो जाती हैं। संतोष वह दीप है जो अल्प साधनों में भी जीवन को प्रकाशमान कर देता है।


वास्तविक समृद्धि संग्रह में नहीं, अपितु आत्मतृप्ति में निहित है। जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं एवं लालसाओं के बीच का अंतर समझ लेता है, वह बाह्य वैभव का दास नहीं रहता। दंभजनित अभिलाषाएँ मन को निरंतर अभाव का अनुभव कराती हैं, जबकि विवेक उसे पूर्णता का बोध कराता है। अतः सुख का मार्ग अधिक पाने में नहीं, बल्कि कम में भी पर्याप्तता का अनुभव करने में है; यही जीवन का गूढ़ दार्शनिक सत्य है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार) 
 पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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